नाभिकीय भौतिकी (Nuclear Physics)
- नाभिक (nucleus) परमाणु का केंद्रीय भाग है जिसमें प्रोटॉन
(proton) और न्यूट्रॉन (neutron) होते हैं – नाभिक में परमाणु का लगभग समस्त द्रव्यमान (99.9%
से अधिक) केन्द्रित होता है, जबकि आयतन अत्यंत सूक्ष्म होता है। नाभिक की त्रिज्या लगभग 1.2 × 10⁻¹⁵ मीटर (1
फर्मी) होती है।
- प्रोटॉन (proton) धनात्मक आवेशित कण (+1e) है – इसका
द्रव्यमान लगभग 1.6726 × 10⁻²⁷ kg (1.007276 u) होता है। प्रोटॉन की खोज अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने 1919 में की
थी। किसी परमाणु में प्रोटॉनों की संख्या ही उसका परमाणु क्रमांक (atomic number – Z) निर्धारित करती है।
- न्यूट्रॉन (neutron) आवेश रहित (उदासीन) कण है – इसका
द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान से थोड़ा अधिक (लगभग 1.6749 × 10⁻²⁷ kg या 1.008665 u) होता है। न्यूट्रॉन
की खोज जेम्स चैडविक ने 1932 में की थी। नाभिक में न्यूट्रॉन प्रोटॉन के मध्य प्रबल नाभिकीय बल (strong
nuclear force) द्वारा बंधन बनाते हैं।
- प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को सामूहिक रूप से न्यूक्लियॉन (nucleon)
कहते हैं – किसी नाभिक में न्यूक्लियॉनों की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या (mass number – A)
कहते हैं। सूत्र: A = Z + N (जहाँ N = न्यूट्रॉनों की संख्या)।
- नाभिकीय विखंडन (nuclear fission) वह प्रक्रिया है जिसमें कोई
भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम-235) दो या अधिक छोटे नाभिकों में टूट जाता है – इस प्रक्रिया में
भारी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। इसे सबसे पहले ओटो हैन एवं फ्रिट्ज स्ट्रैसमैन ने 1938 में खोजा
था।
- नाभिकीय विखंडन में न्यूट्रॉन की बमबारी (neutron bombardment)
आवश्यक होती है – धीमे (थर्मल) न्यूट्रॉन यूरेनियम-235 नाभिक से टकराते हैं, जिससे नाभिक
अस्थिर हो जाता है और दो टुकड़ों (बेरियम एवं क्रिप्टॉन) में टूट जाता है, साथ ही 2-3 नए न्यूट्रॉन
उत्सर्जित होते हैं।
- नाभिकीय विखंडन में न्यूट्रॉन की श्रृंखला अभिक्रिया (chain
reaction) होती है – प्रत्येक विखंडन से उत्सर्जित न्यूट्रॉन अन्य नाभिकों को विखंडित करते
हैं, जिससे अभिक्रिया स्वतः बनी रहती है। अश्रृंखलित (uncontrolled) अभिक्रिया परमाणु बम में होती है, जबकि
नियंत्रित (controlled) अभिक्रिया नाभिकीय रिएक्टर में।
- नाभिकीय विखंडन में न्यूट्रॉन की संख्या बढ़ती है –
प्रारंभिक न्यूट्रॉन 1 होता है, जो विखंडन के बाद 2 या 3 न्यूट्रॉन उत्पन्न करता है। इसी कारण श्रृंखला
अभिक्रिया तीव्र गति से बढ़ती है।
- नाभिकीय विखंडन में ऊर्जा का उत्पादन द्रव्यमान हानि (mass
defect) से होता है – विखंडन के बाद बनने वाले छोटे नाभिकों का कुल द्रव्यमान मूल नाभिक के
द्रव्यमान से कम होता है। यह घटा हुआ द्रव्यमान आइंस्टीन के समीकरण E = mc² (जहाँ c = प्रकाश गति) के अनुसार
ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है।
- नाभिकीय विखंडन ऊर्जा का स्रोत परमाणु बम (atomic bomb) में
है – 1945 में हिरोशिमा एवं नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम इसी सिद्धांत पर कार्य करते थे।
परमाणु बम में अश्रृंखलित (uncontrolled) विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया होती है।
- नाभिकीय विखंडन में यूरेनियम-235 (U-235) एवं प्लूटोनियम-239
(Pu-239) उपयोग होते हैं – U-235 प्राकृतिक रूप से यूरेनियम में केवल 0.7% पाया जाता है, शेष
U-238 (99.3%) होता है। Pu-239 यूरेनियम-238 पर न्यूट्रॉन बमबारी द्वारा कृत्रिम रूप से बनाया जाता है।
- नाभिकीय विखंडन में बेरियम (Ba) और क्रिप्टॉन (Kr) जैसे मध्यम
द्रव्यमान वाले तत्व बनते हैं – U-235 के विखंडन पर बनने वाले टुकड़ों के कई युग्म संभव हैं,
जैसे – बेरियम-141 एवं क्रिप्टॉन-92, अथवा ज़ेनॉन-140 एवं स्ट्रॉन्शियम-94, इत्यादि।
- नाभिकीय विखंडन में न्यूट्रॉन की बमबारी के द्वारा भारी नाभिक
को अस्थिर किया जाता है – धीमे (थर्मल) न्यूट्रॉन यूरेनियम-235 में अवशोषित होकर U-236 बनाते
हैं, जो अत्यंत अस्थिर होता है एवं तुरंत विखंडित हो जाता है।
- नाभिकीय विखंडन में भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है –
एक U-235 नाभिक के विखंडन से लगभग 200 MeV (मिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट) ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो कोयले की
समान मात्रा से प्राप्त ऊर्जा से लगभग 2-3 करोड़ गुना अधिक है।
- नाभिकीय संलयन (nuclear fusion) वह प्रक्रिया है जिसमें दो
हल्के नाभिक (जैसे हाइड्रोजन) आपस में मिलकर एक भारी नाभिक (हीलियम) बनाते हैं – इस प्रक्रिया
में भी भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। संलयन के लिए अत्यधिक उच्च तापमान (लाखों डिग्री सेल्सियस) एवं दाब
की आवश्यकता होती है।
- नाभिकीय संलयन सूर्य एवं अन्य तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत
है – सूर्य में लगभग 15 मिलियन K तापमान पर हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) हीलियम में संलयित होते
हैं, जिससे प्रति सेकंड अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा सूर्य के प्रकाश एवं ऊष्मा के रूप में
पृथ्वी तक पहुँचती है।
- नाभिकीय संलयन में उच्च तापमान (high temperature) और अत्यधिक
दाब (high pressure) आवश्यक है – क्योंकि दोनों नाभिक धनावेशित होते हैं, उनके मध्य प्रबल
कूलॉम प्रतिकर्षण (electrostatic repulsion) होता है। प्रबल प्रतिकर्षण को पार करने के लिए अत्यधिक तापमान
(गतिज ऊर्जा) की आवश्यकता होती है।
- नाभिकीय संलयन में हीलियम (He) का निर्माण होता है –
सूर्य में होने वाले प्रोटॉन-प्रोटॉन श्रृंखला अभिक्रिया के अंत में चार हाइड्रोजन नाभिक (प्रोटॉन) मिलकर एक
हीलियम नाभिक (2 प्रोटॉन + 2 न्यूट्रॉन) बनाते हैं।
- नाभिकीय संलयन में हाइड्रोजन के समस्थानिक (isotopes) –
ड्यूटेरियम (Deuterium – D) एवं ट्रिटियम (Tritium – T) उपयोग होते हैं – ड्यूटेरियम (1
प्रोटॉन + 1 न्यूट्रॉन) प्राकृतिक जल में पाया जाता है, जबकि ट्रिटियम (1 प्रोटॉन + 2 न्यूट्रॉन) कृत्रिम
रूप से बनाया जाता है। D-T संलयन से सबसे अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
- हाइड्रोजन बम (hydrogen bomb) नाभिकीय संलयन पर आधारित
है – हाइड्रोजन बम को थर्मोन्यूक्लियर बम भी कहते हैं। यह पहले परमाणु बम (विखंडन) द्वारा
उत्पन्न अत्यधिक तापमान से संलयन प्रारंभ करता है, जिससे विस्फोटक ऊर्जा उत्पन्न होती है।
- नाभिकीय संलयन में हल्के नाभिकों का संयोजन (combination) होता
है – संलयन में दो हल्के नाभिक आपस में मिलकर एक अपेक्षाकृत भारी नाभिक बनाते हैं। उदाहरण –
ड्यूटेरियम + ट्रिटियम → हीलियम-4 + न्यूट्रॉन + ऊर्जा।
- नाभिकीय संलयन सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है – यह लगभग 5 अरब
वर्षों से निरंतर जारी है – सूर्य प्रति सेकंड लगभग 600 मिलियन टन हाइड्रोजन को हीलियम में
परिवर्तित करता है, जिससे 3.8 × 10²⁶ वाट ऊर्जा उत्पन्न होती है।
- रेडियोसक्रियता (radioactivity) वह प्रक्रिया है जिसमें अस्थिर
नाभिक स्वतः ही (बिना किसी बाह्य कारण) क्षय (decay) होकर विकिरण उत्सर्जित करता है – यह एक
नाभिकीय प्रक्रिया है, जो रासायनिक अभिक्रियाओं से पूर्णतः स्वतंत्र है। रेडियोसक्रियता की खोज हेनरी बेकरेल
ने 1896 में यूरेनियम नमक में की थी।
- रेडियोसक्रिय क्षय की दर (rate of decay) बाह्य कारकों –
तापमान, दाब, चुंबकीय क्षेत्र आदि से प्रभावित नहीं होती है – यह केवल नाभिक की आंतरिक संरचना
पर निर्भर करती है। रेडियोसक्रिय क्षय एक सांख्यिकीय प्रक्रिया है, जिसका अर्थ है कि किसी विशेष नाभिक के
क्षय का ठीक-ठीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।
- रेडियोसक्रिय क्षय तीन प्रकार का होता है – अल्फा (α), बीटा (β)
एवं गामा (γ) क्षय – ये तीनों विकिरण अपने आवेश, द्रव्यमान, भेदन क्षमता एवं आयनन क्षमता में
भिन्न होते हैं। α में हीलियम नाभिक, β में इलेक्ट्रॉन/पॉजिट्रॉन एवं γ में विद्युत चुंबकीय तरंगें
उत्सर्जित होती हैं।
- अल्फा कण (α-particle) हीलियम नाभिक होते हैं – 2 प्रोटॉन + 2
न्यूट्रॉन – अल्फा कण का आवेश +2e, द्रव्यमान 4 u (6.64 × 10⁻²⁷ kg) होता है। इसकी भेदन क्षमता
(penetrating power) सबसे कम होती है – यह कागज की एक पतली शीट से भी रोका जा सकता है, परंतु आयनन क्षमता
(ionizing power) सबसे अधिक होती है।
- बीटा कण (β-particle) इलेक्ट्रॉन (β⁻) या पॉजिट्रॉन (β⁺) होते
हैं – β⁻ कण का आवेश -1e, द्रव्यमान लगभग 9.11 × 10⁻³¹ kg (इलेक्ट्रॉन के बराबर) होता है। β⁺
कण (पॉजिट्रॉन) का आवेश +1e होता है। β कणों की भेदन क्षमता α से अधिक (एल्यूमीनियम की पतली शीट द्वारा रोका
जा सकता है) एवं आयनन क्षमता मध्यम होती है।
- गामा किरणें (γ-rays) उच्च ऊर्जा वाली विद्युत चुंबकीय तरंगें
हैं, जो द्रव्यमान एवं आवेश रहित होती हैं – γ किरणों की भेदन क्षमता सबसे अधिक होती है –
इन्हें रोकने के लिए मोटी सीसे (lead) या कंक्रीट की दीवार की आवश्यकता होती है। आयनन क्षमता सबसे कम होती
है। γ किरणें प्रकाश की गति (3 × 10⁸ m/s) से चलती हैं।
- अल्फा कणों का द्रव्यमान सबसे अधिक (4 u) होता है –
इसी कारण α कणों की चाल सबसे कम एवं भेदन क्षमता सबसे कम होती है। α कण भारी होने के कारण अधिकतम आयनन
(ionization) उत्पन्न करते हैं।
- बीटा कणों का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के बराबर (लगभग 1/1840 u)
होता है – β⁻ क्षय में न्यूट्रॉन प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन एवं एंटीन्यूट्रिनो में परिवर्तित होता
है। β⁺ क्षय में प्रोटॉन न्यूट्रॉन, पॉजिट्रॉन एवं न्यूट्रिनो में परिवर्तित होता है।
- गामा किरणें पूर्णतः द्रव्यमान रहित (massless) होती
हैं – γ किरणें विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम का सबसे अधिक ऊर्जा वाला भाग हैं, जिनकी
तरंगदैर्घ्य 10⁻¹¹ मीटर से भी कम होती है। ये α या β क्षय के बाद नाभिक की अतिरिक्त ऊर्जा को उत्सर्जित करती
हैं।
- रेडियोसक्रियता की दर को अर्ध-आयु (half-life) से मापा जाता
है – अर्ध-आयु वह समयांतराल है जिसमें किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ की मात्रा अपने प्रारंभिक मान
की आधी (50%) हो जाती है। यह प्रत्येक रेडियोसक्रिय समस्थानिक के लिए नियत (constant) होती है।
- अर्ध-आयु (half-life) वह समय है जिसमें रेडियोसक्रिय पदार्थ का
आधा भाग क्षय करता है – उदाहरण – U-238 की अर्ध-आयु लगभग 4.5 अरब वर्ष, C-14 की अर्ध-आयु 5730
वर्ष, पोलोनियम-212 की अर्ध-आयु केवल 0.3 माइक्रोसेकंड है। अर्ध-आयु जितनी कम होगी, पदार्थ उतना ही अधिक
रेडियोसक्रिय (अस्थिर) होगा।
- रेडियोसक्रियता की इकाई बेकरेल (Bq) है – 1 Bq = 1 क्षय प्रति
सेकंड – यह SI मात्रक है। यह एक अत्यंत सूक्ष्म इकाई है। प्राचीन इकाई क्यूरी (Ci) भी उपयोग
होती है – 1 Ci = 3.7 × 10¹⁰ Bq (लगभग 1 ग्राम रेडियम की सक्रियता के बराबर)।
- क्यूरी (Ci) रेडियोसक्रियता की पुरानी (CGS) इकाई है –
इसका नाम मैरी क्यूरी एवं पियरे क्यूरी के नाम पर रखा गया है। 1 Ci = 3.7 × 10¹⁰ Bq आज भी चिकित्सा एवं
उद्योग में उपयोग की जाती है।
- नाभिकीय रिएक्टर (nuclear reactor) में नाभिकीय विखंडन की
श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित (controlled) रूप से की जाती है – रिएक्टर में उत्पन्न ऊष्मा का
उपयोग भाप बनाने के लिए किया जाता है, जो टरबाइन चलाकर विद्युत (बिजली) उत्पन्न करती है। इसे परमाणु ऊर्जा
संयंत्र (nuclear power plant) कहते हैं।
- नाभिकीय रिएक्टर में मंदक (moderator) न्यूट्रॉनों की गति
(ऊर्जा) को कम करता है – तीव्र न्यूट्रॉन (fast neutrons) U-235 के विखंडन के लिए कम प्रभावी
होते हैं। मंदक धीमे (थर्मल) न्यूट्रॉन बनाता है, जिनसे विखंडन अधिक सरलता से होता है।
- भारी जल (heavy water – D₂O) नाभिकीय रिएक्टर में मंदक
(moderator) के रूप में उपयोग होता है – भारी जल में साधारण जल (H₂O) की अपेक्षा न्यूट्रॉन
अवशोषण क्षमता कम होती है। कनाडा के CANDU रिएक्टर इसी का उपयोग करते हैं। भारी जल का रासायनिक सूत्र D₂O
है, जहाँ D (ड्यूटेरियम) हाइड्रोजन का भारी समस्थानिक है।
- ग्रेफाइट (graphite) भी नाभिकीय रिएक्टर में मंदक के रूप में
उपयोगी है – ग्रेफाइट कार्बन का एक रूप है। इसका उपयोग प्रारंभिक रिएक्टरों (जैसे – चिकागो
पाइल-1) में किया गया था। चेरनोबिल आपदा में ग्रेफाइट मंदक का ही उपयोग किया गया था।
- नियंत्रण छड़ें (control rods) नाभिकीय रिएक्टर में अतिरिक्त
न्यूट्रॉनों को अवशोषित (absorb) करती हैं – इनका उपयोग श्रृंखला अभिक्रिया को नियंत्रित करने
एवं रिएक्टर को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। नियंत्रण छड़ों को रिएक्टर कोर में अंदर-बाहर किया जा
सकता है।
- कैडमियम (cadmium – Cd) और बोरॉन (boron – B) नियंत्रण छड़ों
(control rods) में मुख्य रूप से उपयोग होते हैं – इन तत्वों में न्यूट्रॉन अवशोषण का उच्च
क्रॉस-सेक्शन होता है। बोरॉन का उपयोग बोरिक अम्ल के रूप में भी किया जाता है। हैफ़्नियम (hafnium) एक अन्य
नियंत्रण छड़ सामग्री है।
- नाभिकीय रिएक्टर में शीतलक (coolant) ऊष्मा (heat) को रिएक्टर
कोर से बाहर निकालता है – शीतलक गर्म होकर ऊष्मा विनियामक (heat exchanger) में भाप बनाता है।
सामान्य शीतलक – पानी, भारी जल, तरल सोडियम (fast breeder reactors में) एवं हीलियम गैस।
- पानी (साधारण जल – H₂O) और भारी जल (D₂O) नाभिकीय रिएक्टर में
शीतलक (coolant) के रूप में उपयोग होते हैं – ये दोनों ऊष्मा को अवशोषित एवं संवाहित करते हैं।
इसके अतिरिक्त ये मंदक (moderator) का भी कार्य करते हैं।
- नाभिकीय रिएक्टर में उत्पन्न ऊष्मा का उपयोग विद्युत उत्पादन
(electricity generation) के लिए किया जाता है – रिएक्टर में गर्म शीतलक भाप बनाता है, भाप
टरबाइन (turbine) को घुमाती है, टरबाइन जनित्र (generator) से जुड़ा होता है, जो विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करता
है।
- नाभिकीय रिएक्टर में न्यूट्रॉनों की गति मंदक (moderator)
द्वारा नियंत्रित की जाती है – मंदक के अणु तीव्र न्यूट्रॉन से टकराकर उनकी गतिज ऊर्जा कम कर
देते हैं, जिससे धीमे (थर्मल) न्यूट्रॉन बनते हैं।
- नाभिकीय ऊर्जा (nuclear energy) आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा
समीकरण E = mc² पर आधारित है – यहाँ E = ऊर्जा (जूल में), m = द्रव्यमान हानि (kg में) , c =
प्रकाश की गति (3 × 10⁸ m/s) । यह समीकरण बताता है कि द्रव्यमान एवं ऊर्जा परस्पर परिवर्तनीय
(interconvertible) हैं।
- नाभिकीय बंधन ऊर्जा (binding energy) वह ऊर्जा है जो प्रोटॉन
एवं न्यूट्रॉन को नाभिक में एक साथ बांधे रखती है – यह प्रबल नाभिकीय बल (strong nuclear
force) के कारण उत्पन्न होती है। बंधन ऊर्जा जितनी अधिक होगी, नाभिक उतना ही अधिक स्थिर होगा। लोहा (Fe-56)
की बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन सबसे अधिक होती है, अतः यह सबसे स्थिर नाभिक है।
- नाभिकीय बंधन ऊर्जा (nuclear binding energy) द्रव्यमान हानि
(mass defect) के कारण उत्पन्न होती है – नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसके न्यूक्लियॉनों के
अलग-अलग द्रव्यमानों के योग से कम होता है। इस घटे हुए द्रव्यमान को द्रव्यमान हानि कहते हैं, जो E = mc² के
अनुसार बंधन ऊर्जा में परिवर्तित होता है।
- रेडियोसक्रिय पदार्थों का उपयोग कैंसर (cancer) के उपचार
(रेडियोथेरेपी) में किया जाता है – गामा किरणें (कोबाल्ट-60, सीज़ियम-137) कैंसर कोशिकाओं को
नष्ट करने में प्रभावी होती हैं। ये स्वस्थ कोशिकाओं को कम नुकसान पहुँचाते हुए कैंसर कोशिकाओं को मारती
हैं।
- रेडियोसक्रिय पदार्थ (विशेषकर कार्बन-14) का उपयोग पुरातात्विक
एवं भूवैज्ञानिक डेटिंग (dating) में होता है – कार्बन-14 डेटिंग विधि से 50,000 वर्ष पुराने
जैविक नमूनों (लकड़ी, हड्डी, कपड़े) की आयु ज्ञात की जाती है। इसके लिए विलार्ड लिबी को नोबेल पुरस्कार मिला
था।
- कार्बन-14 (C-14) का उपयोग पुरातात्विक डेटिंग (archaeological
dating) में मुख्यतः किया जाता है – जीवित प्राणियों में C-14 की मात्रा स्थिर रहती है, मृत्यु
के बाद यह नियत दर से क्षय होता है। C-14 की अर्ध-आयु 5730 वर्ष है।
- रेडियोसक्रियता पर्यावरण के लिए हानिकारक (harmful) हो सकती
है – अत्यधिक रेडियोसक्रिय विकिरण DNA को क्षति पहुँचाकर कैंसर, आनुवंशिक उत्परिवर्तन
(mutation) एवं विकिरण विषाक्तता (radiation sickness) का कारण बन सकता है। चेरनोबिल एवं फुकुशिमा
दुर्घटनाएँ इसकी भयावहता को दर्शाती हैं।
- रेडियोसक्रिय पदार्थों का उपयोग चिकित्सा (medicine) में निदान
(PET scan, SPECT) एवं उपचार (रेडियोथेरेपी) दोनों के लिए होता है – टेक्नीशियम-99m (Tc-99m)
का उपयोग अधिकांश परमाणु चिकित्सा स्कैन में किया जाता है। आयोडीन-131 का उपयोग थायरॉइड विकारों के उपचार
में होता है।
- नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन (electricity
generation) में किया जाता है – विश्व के कई देश (फ्रांस, USA, रूस, चीन, भारत) परमाणु ऊर्जा
संयंत्रों से बिजली उत्पादन करते हैं। भारत में कलपक्कम, तारापुर, काकरापार, रावतभाटा, कैगा आदि परमाणु
ऊर्जा संयंत्र हैं।
- रेडियोसक्रियता की खोज फ्रांसीसी भौतिकविद् हेनरी बेकरेल (Henri
Becquerel) ने 1896 में की थी – उन्होंने पाया कि यूरेनियम लवण स्वतः ही एक अदृश्य विकिरण
उत्सर्जित करते हैं जो फोटोग्राफिक प्लेट पर दाग बनाता है। इस खोज के लिए उन्हें 1903 में नोबेल पुरस्कार
मिला।
- रेडियोसक्रियता की खोज 1896 में बेकरेल द्वारा की गई
थी – इसके तुरंत बाद मैरी क्यूरी एवं पियरे क्यूरी ने रेडियम (Ra) एवं पोलोनियम (Po) तत्वों की
खोज की। मैरी क्यूरी को यह कार्य के लिए दो नोबेल पुरस्कार मिले (भौतिकी 1903, रसायन 1911)।
- अल्फा कणों (α) की भेदन क्षमता सबसे कम (सबसे कम penetrating
power) होती है – इन्हें कागज या त्वचा की मृत परत द्वारा रोका जा सकता है। अल्फा उत्सर्जक
पदार्थ तभी हानिकारक होते हैं जब वे शरीर के अंदर (साँस द्वारा या भोजन के साथ) प्रवेश करें।
- गामा किरणों को रोकने के लिए मोटी सीसे (lead) या कंक्रीट
(concrete) की दीवार की आवश्यकता होती है – γ किरणों की अत्यधिक भेदन क्षमता के कारण परमाणु
रिएक्टरों एवं अस्पतालों में सीसे की दीवारें एवं सीसे से लिपटी हुई सुरक्षा (lead shielding) का उपयोग किया
जाता है।