विद्युत धारा एवं चालकता (Electric Current & Conductivity)
- विद्युत धारा (electric current) किसी चालक में मुक्त
इलेक्ट्रॉनों का निश्चित दिशा में प्रवाह (flow) है – इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण होते हैं, जो
विभवांतर (potential difference) के कारण उच्च विभव (positive terminal) से निम्न विभव (negative terminal)
की ओर गति करते हैं। परंपरागत धारा की दिशा धन से ऋण की ओर मानी जाती है, जो इलेक्ट्रॉनों की गति के विपरीत
होती है।
- विद्युत धारा का SI मात्रक एम्पीयर (Ampere – A) है –
1 एम्पीयर = 1 कूलॉम/सेकंड (1 C/s) । यदि किसी चालक के अनुप्रस्थ काट से 1 सेकंड में 6.25 × 10¹⁸ इलेक्ट्रॉन
गुजरें, तो धारा 1 एम्पीयर होती है। इसकी खोज के लिए एंड्रे-मैरी एम्पीयर को सम्मानित किया गया है।
- विद्युत धारा का प्रवाह हमेशा उच्च विभव (high potential) से
निम्न विभव (low potential) की ओर होता है – यह परंपरागत धारा की दिशा है। वास्तविक इलेक्ट्रॉन
प्रवाह (electron flow) निम्न विभव (ऋणात्मक) से उच्च विभव (धनात्मक) की ओर होता है, जो धारा की दिशा के
विपरीत होता है।
- विद्युत धारा का प्रवेश एक बंद परिपथ (closed circuit) में ही
संभव है – बंद परिपथ में इलेक्ट्रॉन एक पूर्ण लूप बनाते हैं, जिससे धारा निरंतर प्रवाहित होती
है। खुले परिपथ (open circuit) में स्विच खुला होता है, जिससे धारा प्रवाह रुक जाता है।
- विद्युत धारा बैटरी (battery) या सेल (cell) द्वारा उत्पन्न की
जाती है – बैटरी रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। बैटरी का धन टर्मिनल
उच्च विभव एवं ऋण टर्मिनल निम्न विभव पर होता है। वोल्टेज (विभवांतर) ही इलेक्ट्रॉनों को प्रवाहित करने का
कारण बनता है।
- विद्युत धारा का प्रवाह पारंपरिक रूप से बैटरी के धन (positive)
टर्मिनल से ऋण (negative) टर्मिनल की ओर माना जाता है – यह दिशा बेंजामिन फ्रैंकलिन द्वारा
स्थापित की गई थी, जब इलेक्ट्रॉन की खोज नहीं हुई थी। वास्तविक इलेक्ट्रॉन प्रवाह ऋण से धन की ओर होता है।
- विद्युत धारा दो प्रकार की होती है – प्रत्यक्ष धारा (DC –
Direct Current) और प्रत्यावर्ती धारा (AC – Alternating Current) – DC में धारा की दिशा नियत
रहती है (जैसे – बैटरी, सेल) , जबकि AC में धारा की दिशा समय के साथ आवर्ती रूप से बदलती है (जैसे – घरेलू
विद्युत आपूर्ति)।
- प्रत्यावर्ती धारा (AC) की आवृत्ति भारत में 50 Hz (हर्ट्ज़)
होती है – अर्थात धारा अपनी दिशा प्रति सेकंड 50 बार (100 बार शून्य से गुजरती हुई) बदलती है।
अमेरिका एवं कुछ अन्य देशों में 60 Hz का उपयोग होता है।
- विद्युत विभव (electric potential) का SI मात्रक वोल्ट (Volt –
V) है – 1 वोल्ट = 1 जूल/कूलॉम (1 J/C) । यह वह कार्य है जो 1 कूलॉम आवेश को एक बिंदु से दूसरे
बिंदु तक ले जाने में किया जाता है। इसका नाम वोल्टा के नाम पर रखा गया है।
- विभवांतर (potential difference) को वोल्टमीटर (voltmeter)
द्वारा मापा जाता है – वोल्टमीटर को हमेशा परिपथ में समानांतर (parallel) में जोड़ा जाता है,
क्योंकि यह उच्च प्रतिरोध (high resistance) का होता है, जिससे यह धारा को प्रभावित नहीं करता। वोल्टमीटर का
प्रतिरोध अनंत (infinite) के निकट होता है।
- वोल्टता (voltage) का मापन वोल्टमीटर (voltmeter) द्वारा परिपथ
में समानांतर (parallel) क्रम में किया जाता है – समानांतर जोड़ने से वोल्टमीटर उसी विभवांतर
को मापता है जो दो बिंदुओं के बीच है। श्रेणी में जोड़ने पर वोल्टमीटर स्वयं बहुत अधिक प्रतिरोध डाल देगा।
- ओम का नियम (Ohm's Law) – V = IR के रूप में व्यक्त होता
है – जहाँ V = विभवांतर (वोल्ट में) , I = धारा (एम्पीयर में) , R = प्रतिरोध (ओम में) । यह
नियम केवल उन्हीं चालकों पर लागू होता है जिनमें प्रतिरोध तापमान स्थिर रहने पर नियत रहता है। इन्हें ओमीय
(ohmic) चालक कहते हैं।
- प्रतिरोध (resistance) का SI मात्रक ओम (Ohm – Ω) है –
1 ओम = 1 वोल्ट/एम्पीयर (1 V/A) । यदि 1 वोल्ट के विभवांतर पर 1 एम्पीयर धारा प्रवाहित होती है, तो प्रतिरोध
1 ओम होता है। प्रतिरोध चालक का वह गुण है जो धारा के प्रवाह का विरोध करता है।
- प्रतिरोध (R) चालक की लंबाई (L) के समानुपाती एवं अनुप्रस्थ काट
क्षेत्रफल (A) के व्युत्क्रमानुपाती होता है – R = ρL/A – यह सूत्र किसी चालक का प्रतिरोध उसकी
ज्यामिति एवं सामग्री के आधार पर ज्ञात करता है। लंबी तार का प्रतिरोध अधिक, मोटी तार का प्रतिरोध कम होता
है।
- प्रतिरोध (resistance) तार की लंबाई (length) के साथ बढ़ता है
और अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (area) के साथ घटता है – लंबाई दोगुनी करने पर प्रतिरोध दोगुना हो
जाता है, जबकि क्षेत्रफल दोगुना करने पर प्रतिरोध आधा हो जाता है। यही कारण है कि लंबे तारों में अधिक
प्रतिरोध होता है।
- प्रतिरोध का मान तार के व्यास (diameter) पर भी निर्भर करता
है – चूँकि क्षेत्रफल A = πr² = π(d/2)² होता है, व्यास बढ़ाने पर क्षेत्रफल बढ़ता है, अतः
प्रतिरोध घटता है। पतले तारों का प्रतिरोध अधिक होता है।
- प्रतिरोध (resistance) तार की सामग्री (material) पर निर्भर
करता है – विभिन्न सामग्रियों के परमाण्विक ढाँचे एवं मुक्त इलेक्ट्रॉन घनत्व भिन्न होते हैं,
जिससे प्रतिरोध भिन्न होता है। चाँदी (सबसे कम प्रतिरोध) , ताँबा, एल्युमीनियम, लोहा, नाइक्रोम (उच्च
प्रतिरोध) का क्रम है।
- प्रतिरोध (resistance) का मान सामग्री के विशिष्ट प्रतिरोध
(resistivity – ρ) पर निर्भर करता है – सूत्र R = ρL/A में ρ (रो) सामग्री का विशिष्ट प्रतिरोध
है। यह सामग्री का आंतरिक गुण है, जो ज्यामिति पर निर्भर नहीं करता। ताँबा का ρ ≈ 1.68 × 10⁻⁸ Ω·m एवं
नाइक्रोम का ρ ≈ 100 × 10⁻⁸ Ω·m होता है।
- विशिष्ट प्रतिरोध (resistivity – ρ) का SI मात्रक ओम-मीटर (Ω·m)
है – यह किसी सामग्री की उस विद्युत प्रतिरोधकता को दर्शाता है। अच्छे चालकों का ρ बहुत कम
(10⁻⁸ Ω·m) , रोधियों (insulators) का ρ बहुत अधिक (10¹⁰ से 10¹⁸ Ω·m) होता है।
- प्रतिरोध (resistance) तापमान बढ़ने पर सामान्यतः बढ़ता है
(धातुओं के लिए) – तापमान बढ़ने पर परमाणुओं के कंपन (thermal vibrations) बढ़ जाते हैं, जिससे
इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह अधिक बाधित होता है। इस गुण का उपयोग प्रतिरोध तापमापी (resistance thermometer) में
होता है।
- प्रतिरोध (resistance) का उपयोग परिपथ में धारा (current) को
नियंत्रित करने के लिए किया जाता है – उच्च प्रतिरोध लगाने से धारा कम हो जाती है (I = V/R) ।
प्रतिरोधक (resistor) इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में धारा सीमित करने, वोल्टता विभाजन (voltage divider) एवं ताप
उत्पादन के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- प्रतिरोध का मापन ओममीटर (ohmmeter) से किया जाता है –
ओममीटर परिपथ में प्रतिरोधक के सिरों के बीच जोड़ा जाता है। आधुनिक मल्टीमीटर (multimeter) वोल्टमीटर,
एममीटर एवं ओममीटर तीनों का कार्य कर सकता है।
- चालकता (conductivity – σ) प्रतिरोध (resistance) का व्युत्क्रम
(reciprocal) होती है – σ = 1/R (किसी विशिष्ट चालक के लिए नहीं, बल्कि सामग्री के लिए चालकता
= 1/ρ) । अच्छे चालकों में चालकता उच्च एवं प्रतिरोध निम्न होता है।
- चालकता (conductivity) का SI मात्रक सीमेंस प्रति मीटर (Siemens
per meter – S/m) है – 1 S/m = 1 Ω⁻¹·m⁻¹ (ओम का व्युत्क्रम) । सीमेंस (S) चालकता का मात्रक
है, जो एम्पीयर प्रति वोल्ट (A/V) के बराबर होता है।
- विद्युत चालकता (electrical conductivity) धातुओं में मुक्त
इलेक्ट्रॉनों (free electrons) के कारण होती है – धातुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रूप
से घूम सकते हैं, जिससे विद्युत धारा सरलता से प्रवाहित होती है। यही कारण है कि धातुएँ अच्छी चालक होती
हैं।
- धातुएँ (metals) अच्छे विद्युत चालक (good conductors) होती
हैं – धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की उच्च सांद्रता होती है। ताँबा (Cu) , चाँदी (Ag) ,
एल्युमीनियम (Al) , सोना (Au) प्रमुख चालक हैं। चाँदी सर्वोत्तम चालक है, परंतु व्यावहारिक रूप से ताँबा
सर्वाधिक उपयोग किया जाता है।
- चालकता (conductivity) का मान ताँबे (copper) में उच्च होता
है – ताँबा (Cu) की चालकता लगभग 5.96 × 10⁷ S/m होती है। यही कारण है कि विद्युत तार
(electrical wires) अधिकांशतः ताँबे के बनाए जाते हैं, क्योंकि यह उच्च चालकता एवं उचित लागत का संतुलन
प्रदान करता है।
- विद्युत चालकता (conductivity) का मान चाँदी (silver – Ag) में
सर्वाधिक (highest) होता है – चाँदी की चालकता लगभग 6.30 × 10⁷ S/m है, जो सभी ज्ञात धातुओं
में अधिकतम है। परंतु इसकी उच्च लागत के कारण व्यावसायिक उपयोग सीमित है।
- विद्युत चालकता (electrical conductivity) का मान तापमान बढ़ने
पर घटता है (धातुओं में) – तापमान बढ़ने से परमाणुओं के कंपन से इलेक्ट्रॉन प्रवाह में बाधा
बढ़ती है, अतः प्रतिरोध बढ़ता है एवं चालकता घटती है। यह धातुओं का सामान्य व्यवहार है।
- अर्धचालक (semiconductor) की चालकता तापमान बढ़ने पर बढ़ती
है – अर्धचालकों (जैसे – सिलिकॉन, जर्मेनियम) में तापमान बढ़ने पर अधिक इलेक्ट्रॉन संयोजी बैंड
(valence band) से चालन बैंड (conduction band) में जाते हैं, जिससे चालकता बढ़ती है। यह धातुओं के विपरीत
व्यवहार है।
- सिलिकॉन (silicon – Si) और जर्मेनियम (germanium – Ge) अर्धचालक
(semiconductors) हैं – ये चालक और रोधी के मध्य के गुण रखते हैं। सिलिकॉन आधुनिक
इलेक्ट्रॉनिक्स (डायोड, ट्रांजिस्टर, IC, माइक्रोचिप) का आधार है, क्योंकि यह प्रकृति में प्रचुर मात्रा में
उपलब्ध है।
- काँच (glass) और प्लास्टिक (plastic) विद्युत रोधी (electrical
insulators) होते हैं – इनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन लगभग न के बराबर होते हैं, अतः ये धारा को
प्रवाहित नहीं होने देते। रोधियों का प्रतिरोध अत्यधिक उच्च (10¹² Ω से अधिक) होता है।
- ताँबा (copper) और चाँदी (silver) उत्कृष्ट विद्युत चालक
(excellent conductors) हैं – दोनों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों का घनत्व बहुत अधिक होता है। ताँबा
का उपयोग बिजली के तारों, केबिलों, मोटरों एवं जनित्रों में सर्वाधिक होता है।
- प्रतिरोधक श्रेणी (series) परिपथ में धारा (current) का मान सभी
प्रतिरोधकों में समान (same) रहता है – I = I₁ = I₂ = I₃ … । श्रेणी परिपथ में धारा विभाजित
नहीं होती, बल्कि एक ही पथ से प्रवाहित होती है। कुल वोल्टता सभी प्रतिरोधकों पर विभाजित हो जाती है।
- श्रेणी (series) परिपथ में कुल प्रतिरोध (total resistance) R =
R₁ + R₂ + R₃ … होता है – अर्थात सभी प्रतिरोधों का योग (sum) होता है। प्रतिरोध बढ़ने से
परिपथ में धारा कम हो जाती है। उदाहरण – क्रिसमस की पुरानी लड़ियों में एक बल्ब खराब होने पर सभी बल्ब बुझ
जाते हैं।
- श्रेणी (series) परिपथ में कुल वोल्टता (total voltage) V = V₁
+ V₂ + V₃ … होती है – बैटरी का कुल विभवांतर सभी प्रतिरोधकों के विभवांतरों के योग के बराबर
होता है। अलग-अलग प्रतिरोधकों पर वोल्टता प्रतिरोध के समानुपाती होती है।
- श्रेणी (series) परिपथ में धारा विभाजित (divided) नहीं होती
है – चूँकि सभी प्रतिरोधक एक ही पथ में जुड़े होते हैं, सभी में समान धारा प्रवाहित होती है।
यही कारण है कि श्रेणी परिपथ में एक स्थान पर खराबी पूरे परिपथ को बंद कर देती है।
- समानांतर (parallel) परिपथ में वोल्टता (voltage) का मान सभी
प्रतिरोधकों में समान (same) रहता है – V = V₁ = V₂ = V₃ … । सभी प्रतिरोधकों के सिरे बैटरी के
समान टर्मिनलों से जुड़े होते हैं, अतः प्रत्येक पर वोल्टता समान होती है।
- समानांतर (parallel) परिपथ में कुल प्रतिरोध (total resistance)
का सूत्र 1/R = 1/R₁ + 1/R₂ + 1/R₃ … है – कुल प्रतिरोध व्यक्तिगत प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों
के योग का व्युत्क्रम होता है। समानांतर जोड़ने पर कुल प्रतिरोध हमेशा सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम हो जाता
है।
- समानांतर (parallel) परिपथ में कुल धारा (total current) I = I₁
+ I₂ + I₃ … होती है – बैटरी द्वारा प्रदान की गई कुल धारा सभी शाखाओं में विभाजित (divided)
हो जाती है। प्रत्येक शाखा में धारा उस शाखा के प्रतिरोध के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
- समानांतर (parallel) परिपथ में धारा विभाजित (divided) होती
है – धारा कम प्रतिरोध वाली शाखा में अधिक तथा अधिक प्रतिरोध वाली शाखा में कम प्रवाहित होती
है। घरेलू विद्युत वायरिंग समानांतर परिपथ में की जाती है, ताकि एक उपकरण बंद होने पर दूसरे कार्य करते
रहें।
- विद्युत शक्ति (electric power) का सूत्र P = VI (वोल्टता ×
धारा) होता है – यह सूत्र सभी प्रकार के परिपथों (DC एवं AC) पर लागू होता है। शक्ति कार्य
करने की दर (rate of doing work) है। 1 वाट = 1 वोल्ट × 1 एम्पीयर।
- विद्युत शक्ति (power) का SI मात्रक वाट (Watt – W) है
– 1 वाट = 1 जूल/सेकंड (1 J/s) । 1000 वाट = 1 किलोवाट (kW) । इसका नाम जेम्स वाट (भाप इंजन के विकासक) के
नाम पर रखा गया है।
- विद्युत शक्ति (P) को P = I²R (धारा के वर्ग × प्रतिरोध) के रूप
में भी व्यक्त किया जा सकता है – यह सूत्र ओम के नियम (V = IR) को P = VI में प्रतिस्थापित
करने से प्राप्त होता है। यह सूत्र विशेष रूप से जूल तापन प्रभाव एवं प्रतिरोधकों में शक्ति क्षय (power
loss) ज्ञात करने में उपयोगी है।
- विद्युत शक्ति (P) को P = V²/R (वोल्टता के वर्ग/प्रतिरोध) के
रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है – यह सूत्र I = V/R को P = VI में प्रतिस्थापित करने से
प्राप्त होता है। यह तब उपयोगी होता है जब धारा अज्ञात हो परंतु वोल्टता एवं प्रतिरोध ज्ञात हों।
- विद्युत शक्ति (electric power) का उपयोग हीटर (heater), बल्ब
(bulb), मोटर (motor) एवं पंखे (fan) जैसे उपकरणों में होता है – हीटर और बल्ब शक्ति को ऊष्मा
एवं प्रकाश में, मोटर एवं पंखे यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। प्रत्येक उपकरण पर उसकी शक्ति (वाट
में) अंकित होती है।
- विद्युत ऊर्जा (electrical energy) का SI मात्रक जूल (Joule –
J) है – 1 जूल = 1 वाट × 1 सेकंड = 1 वोल्ट × 1 कूलॉम । यह कार्य करने की क्षमता है। 1
किलोवाट-घंटा (kWh) = 3.6 × 10⁶ जूल होता है।
- किलोवाट-घंटा (kilowatt-hour – kWh) विद्युत ऊर्जा की
व्यावसायिक (commercial) इकाई है – इसी इकाई में घरेलू एवं औद्योगिक बिजली बिल बनता है। 1 kWh
= 1000 वाट × 3600 सेकंड = 3.6 × 10⁶ जूल (3.6 मिलियन जूल) । इसे “यूनिट” (unit) भी कहते हैं।
- विद्युत ऊर्जा (electrical energy) का व्यावसायिक मापन
किलोवाट-घंटा (kWh) में किया जाता है – बिजली मीटर (energy meter) इसी इकाई में उपभोग की गई
विद्युत ऊर्जा को मापता है। 1 यूनिट = 1 kWh = 1000 वाट का उपकरण 1 घंटे चलने पर खपत होने वाली ऊर्जा।
- विद्युत ऊर्जा (electrical energy) का मापन जूल (Joule) एवं kWh
दोनों में होता है – वैज्ञानिक कार्यों में जूल का प्रयोग होता है, जबकि व्यावहारिक
(वाणिज्यिक) मापन में kWh का। 1 kWh = 3.6 × 10⁶ J (बिल्कुल सटीक मान)।
- जूल तापन प्रभाव (Joule heating effect) – H = I²Rt (ऊष्मा ∝
धारा का वर्ग × प्रतिरोध × समय) होता है – जब विद्युत धारा किसी प्रतिरोधक से प्रवाहित होती
है, तो ऊष्मा उत्पन्न होती है। यही सिद्धांत हीटर, टोस्टर, इस्तरी, फ्यूज, इन्कैंडेसेंट बल्ब में कार्य करता
है।
- जूल तापन प्रभाव (Joule heating) विद्युत धारा के वर्ग (I²) के
समानुपाती होता है – धारा दोगुनी करने पर ऊष्मा चार गुना हो जाती है। यही कारण है कि उच्च धारा
लेने वाले उपकरणों में अधिक ताप उत्पन्न होता है।
- जूल तापन (Joule heating) विद्युत धारा के समय (time – t) के भी
समानुपाती होता है – उपकरण जितनी देर चलेगा, उतनी अधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी। यही कारण है कि
बिजली बिल में उपयोग समय (hours) का गुणा किया जाता है।
- जूल तापन प्रभाव (Joule heating effect) हीटर (heater) एवं अन्य
तापन उपकरणों में उपयोगी है – नाइक्रोम (निकेल + क्रोमियम) मिश्रधातु का उपयोग हीटिंग तारों
में किया जाता है, क्योंकि इसका प्रतिरोध उच्च, गलनांक उच्च एवं ऑक्सीकरण प्रतिरोध अधिक होता है।
- विद्युत धारा के कारण जूल तापन (Joule heating) प्रभाव उत्पन्न
होता है – यह एक अनिवार्य प्रभाव है जो सभी प्रतिरोधकों (resistors) में होता है। कुछ उपकरणों
में यह वांछित (हीटर) होता है, तो कुछ में अवांछित (पारेषण लाइनों में ऊर्जा हानि) होता है।
- विद्युत धारा (current) का मापन एममीटर (ammeter) द्वारा किया
जाता है – एममीटर को परिपथ में श्रेणी (series) में जोड़ा जाता है, क्योंकि इसे पूरी धारा
प्रवाहित होती है। एक आदर्श एममीटर का प्रतिरोध शून्य (zero) होता है, ताकि यह परिपथ में कोई अतिरिक्त
प्रतिरोध न डाले।
- विद्युत धारा (current) का मापन एममीटर (ammeter) द्वारा परिपथ
में श्रेणी (series) क्रम में किया जाता है – श्रेणी में जोड़ने से एममीटर से सम्पूर्ण धारा
गुजरती है। यदि इसे समानांतर में जोड़ दिया जाए, तो यह शॉर्ट सर्किट (short circuit) का कारण बन सकता है।
- वोल्टता (voltage) का मापन वोल्टमीटर (voltmeter) द्वारा परिपथ
में समानांतर (parallel) क्रम में किया जाता है – वोल्टमीटर को उन दो बिंदुओं के बीच जोड़ा
जाता है, जिनके बीच विभवांतर मापना होता है। एक आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनंत (infinite) होता है।
- प्रतिरोध (resistance) का मापन ओममीटर (ohmmeter) द्वारा किया
जाता है – ओममीटर में एक आंतरिक बैटरी होती है। प्रतिरोध मापते समय परिपथ को पूर्णतः बंद
(de-energized) कर देना चाहिए, ताकि बाहरी वोल्टता मापन को प्रभावित न करे।
- विद्युत परिपथ में फ्यूज (fuse) सुरक्षा (safety) के लिए उपयोग
होता है – फ्यूज एक कम गलनांक वाला तार (टिन, सीसा, जस्ता मिश्रधातु) होता है। अत्यधिक धारा
प्रवाहित होने पर यह पिघलकर परिपथ को तोड़ देता है, जिससे उपकरण एवं तारों को क्षति से बचाया जा सके।
- विद्युत धारा का मापन एममीटर (ammeter) से श्रेणी (series) में
होता है – एममीटर का प्रतिरोध न्यूनतम (लगभग शून्य) रखा जाता है ताकि वह परिपथ की धारा को
प्रभावित न कर सके। इसे सदैव श्रेणी में जोड़ना चाहिए।
- वोल्टता (voltage) का मापन वोल्टमीटर (voltmeter) से समानांतर
(parallel) में होता है – वोल्टमीटर का प्रतिरोध अत्यधिक उच्च (लगभग अनंत) रखा जाता है, ताकि
यह परिपथ से कोई धारा न खींचे।
- अर्धचालक (semiconductors) का उपयोग डायोड (diode), ट्रांजिस्टर
(transistor) एवं इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) में होता है – डायोड एकदिशिक धारा (one-way current)
की अनुमति देता है, जबकि ट्रांजिस्टर प्रवर्धन (amplification) एवं स्विचिंग के लिए उपयोगी है। सभी आधुनिक
इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी) अर्धचालकों पर आधारित हैं।
- अर्धचालक (semiconductors) का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों
(electronic devices) में होता है – सिलिकॉन (Si) एवं जर्मेनियम (Ge) मुख्य अर्धचालक हैं।
डोपिंग (doping) – अशुद्धियाँ मिलाने से इनकी चालकता नियंत्रित की जा सकती है, जिससे p-type एवं n-type
अर्धचालक बनते हैं।
- अति चालकता (superconductivity) शून्य प्रतिरोध (zero
resistance) की स्थिति है – कुछ पदार्थ (जैसे – पारा, सीसा, येट्रियम बेरियम कॉपर ऑक्साइड) अति
निम्न तापमान (critical temperature) पर अपना प्रतिरोध पूर्णतः खो देते हैं। इस घटना की खोज हाइके कामरलिंग
ऑन्स ने 1911 में की थी।
- अति चालक (superconductor) पदार्थ बहुत कम तापमान (क्रांतिक
तापमान – Tc) पर कार्य करते हैं – पारे (Hg) का Tc = 4.2 K (-268.95°C) , सीसे (Pb) का Tc =
7.2 K (-265.95°C) । उच्च तापमान अतिचालक (High-Tc superconductors) 77 K (-196°C) पर कार्य कर सकते हैं।
- अति चालकता (superconductivity) का उपयोग MRI मशीनों (Medical
Imaging) एवं चुंबकीय ट्रेनों (Maglev trains) में होता है – अतिचालक चुंबक अत्यधिक प्रबल एवं
स्थिर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं, बिना किसी ऊर्जा हानि के। Maglev ट्रेनें (जापान, चीन) अतिचालक
चुंबकों का उपयोग करके हवा में तैरती हैं।
- विद्युत धारा घनत्व (current density – J) = I/A होता
है – जहाँ I = धारा (एम्पीयर) , A = अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल (m²) । यह बताता है कि इकाई
क्षेत्रफल से कितनी धारा प्रवाहित हो रही है।
- विद्युत धारा घनत्व (current density) का SI मात्रक एम्पीयर
प्रति वर्ग मीटर (A/m²) होता है – पतले तारों में धारा घनत्व अधिक होता है (क्योंकि क्षेत्रफल
कम होता है) , जिससे अधिक ताप उत्पन्न हो सकता है। तार की रेटिंग (current rating) इसी पर आधारित होती है।
- ओम का नियम (Ohm's law) रैखिक चालकों (linear conductors) पर ही
पूर्णतः लागू होता है – जिन चालकों का प्रतिरोध तापमान एवं अन्य कारकों से प्रभावित नहीं होता,
उन्हें ओमीय (ohmic) चालक कहते हैं। अर्धचालक एवं डायोड ओम के नियम का पालन नहीं करते; इन्हें अरेखीय
(non-ohmic) कहते हैं।
- अर्धचालक (semiconductors) का उपयोग डायोड (diode) एवं
ट्रांजिस्टर (transistor) में होता है – डायोड p-n संधि (junction) पर कार्य करता है, जो केवल
एक दिशा में धारा प्रवाह की अनुमति देता है (दिष्टकारी – rectifier) । ट्रांजिस्टर प्रवर्धक (amplifier) एवं
स्विच (switch) के रूप में कार्य करता है।
- चालकता (conductivity) प्रतिरोध (resistance) का व्युत्क्रम
(reciprocal) होती है – उच्च चालकता का अर्थ निम्न प्रतिरोध एवं उच्च धारा प्रवाह क्षमता है।
सुपरकंडक्टर में चालकता अनंत (infinite) होती है।
- विद्युत धारा (current) इलेक्ट्रॉनों (electrons) की गति
(motion) से उत्पन्न होती है – इलेक्ट्रॉन धातु में यादृच्छिक रूप से गति करते हैं, परंतु
विभवांतर लगाने पर एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होते हैं। इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग (drift velocity) बहुत
कम (मिमी/सेकंड) होता है।
- प्रतिरोध (resistance) तार के क्षेत्रफल (area) के
व्युत्क्रमानुपाती होता है – मोटा तार = कम प्रतिरोध – क्योंकि अधिक क्षेत्रफल से अधिक
इलेक्ट्रॉन प्रवाहित हो सकते हैं। लंबे तारों में उच्च प्रतिरोध होता है, अतः विद्युत पारेषण के लिए मोटे
तारों का उपयोग किया जाता है।