कार्बनिक रसायन, हाइड्रोकार्बन, एल्कोहल
- कार्बनिक रसायन (ऑर्गेनिक केमिस्ट्री) कार्बन (C) यौगिकों का
अध्ययन है जिसमें कार्बन के साथ हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन आदि भी जुड़े
होते हैं। यह रसायन की सबसे बड़ी शाखा है। हीरे, ग्रेफाइट, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बोनेट्स (CaCO₃),
साइनाइड्स (NaCN) आदि को छोड़कर लगभग सभी कार्बन यौगिक कार्बनिक रसायन के अंतर्गत आते हैं।
- हाइड्रोकार्बन (हाइड्रोकार्बन) केवल कार्बन (C) और हाइड्रोजन
(H) परमाणुओं से बने कार्बनिक यौगिक होते हैं ये प्राकृतिक स्रोतों (पेट्रोलियम, प्राकृतिक
गैस, कोयला) से प्राप्त होते हैं। ये ऊर्जा, प्लास्टिक, रबर, फाइबर, दवाएँ, रंग, डिटर्जेंट, उर्वरक, कीटनाशक
एवं लाखों अन्य उत्पादों के आधार हैं। मीथेन (CH₄) सबसे सरल हाइड्रोकार्बन है।
- एल्कोहल (अल्कोहल) में एक या अधिक हाइड्रॉक्सिल (-OH,
हाइड्रॉक्सिल) समूह कार्बन परमाणु से जुड़ा होता है उदाहरण: मेथेनॉल (CH₃OH), इथेनॉल (C₂H₅OH),
प्रोपेनॉल (C₃H₇OH), ग्लिसरॉल (C₃H₅(OH)₃)। ये प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°), तृतीयक (3°) तथा
बहुहाइड्रिक्सी (ग्लाइकोल) में वर्गीकृत होते हैं। ये उत्तम विलायक, ईंधन, कीटाणुनाशक एवं औद्योगिक रसायन
हैं।
- मेथेन (मीथेन) का अणुसूत्र CH₄ है, जो सबसे सरल एल्केन (संतृप्त
हाइड्रोकार्बन) है यह रंगहीन, गंधहीन एवं अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, जो प्राकृतिक गैस का मुख्य
घटक (85-90%) है। इसका गलनांक -182.5°C तथा क्वथनांक -161.5°C होता है। यह एक प्रबल ग्रीनहाउस गैस (GWP ~28)
है। इसका उपयोग ईंधन (CNG), अमोनिया, मेथनॉल, हाइड्रोजन, कार्बन ब्लैक, क्लोरोफॉर्म एवं कार्बन डाइसल्फाइड
(CS₂) बनाने में होता है।
- इथेनॉल (एथिल अल्कोहल) का अणुसूत्र C₂H₅OH या CH₃-CH₂-OH
है यह एक प्राथमिक एल्कोहल है, जो किण्वन (खमीर द्वारा शर्करा के अपघटन) या एथिलीन के
हाइड्रेशन से बनता है। इसका क्वथनांक 78.37°C होता है। यह पेय (मदिरा), ईंधन (गैसोहोल, E10, E85), विलायक,
कीटाणुनाशक (हैंड सैनिटाइज़र - 70% v/v), एंटीफ्रीज, सर्जरी (एनेस्थेटिक), इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, एवं
एसीटिक अम्ल, डाइएथिल ईथर, क्लोरोफॉर्म, एथिल एसीटेट के उत्पादन में होता है।
- बेंजीन (बेंजीन) का अणुसूत्र C₆H₆ है, जो एक सुगंधित (एरोमैटिक)
हाइड्रोकार्बन है इसकी संरचना छह कार्बन परमाणुओं का षट्कोणीय वलय है जिसमें तीन वैकल्पिक
द्विबंध (अनुनाद) होते हैं। इसका क्वथनांक 80.1°C है। यह एक रंगहीन, अत्यधिक ज्वलनशील द्रव है, जो
कार्सिनोजेन (कैंसरकारी) है। इसका उपयोग विलायक, रासायनिक मध्यवर्ती (स्टाइरीन, फिनॉल, एनीलिन,
नाइट्रोबेंजीन, क्यूमीन, डिटर्जेंट), रबर, प्लास्टिक, रंग, दवाएँ, कीटनाशक एवं विस्फोटक (TNT, DDT -
ऐतिहासिक) बनाने में होता है।
- एल्केनों (पैराफिन) का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ है, जहाँ n =
1,2,3,... ये संतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें केवल एकल (सिग्मा, C-C) सहसंयोजक बंध होते
हैं। ये रासायनिक रूप से कम अभिक्रियाशील होते हैं। उदाहरण: मीथेन (CH₄), ईथेन (C₂H₆), प्रोपेन (C₃H₈),
ब्यूटेन (C₄H₁₀), पेंटेन (C₅H₁₂)। इनका उपयोग ईंधन (प्राकृतिक गैस, LPG, पेट्रोल, केरोसीन, डीजल), मोमबत्ती
(पैराफिन मोम), स्नेहक, पेट्रोलियम जेली (वैसलीन), प्लास्टिक (पॉलिथीन), रबर, डिटर्जेंट एवं रासायनिक
फीडस्टॉक के रूप में होता है।
- एल्कीनों (ओलेफिन) का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ है, जहाँ n ≥
2 ये असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें कम से कम एक कार्बन-कार्बन द्विबंध (C=C) होता है।
उदाहरण: एथिलीन (C₂H₄), प्रोपीलीन (C₃H₆), ब्यूटिलीन (C₄H₈)। ये एल्केनों से अधिक अभिक्रियाशील होते हैं तथा
योगात्मक (एडिशन) पॉलिमरीकरण में भाग लेते हैं। इनका उपयोग प्लास्टिक (पॉलिथीन, PVC, PP), रबर (ब्यूटाडाइन,
नियोप्रीन), एंटीफ्रीज (एथिलीन ग्लाइकॉल), फल पकाने (एथिलीन हार्मोन), एल्कोहल (इथेनॉल), और स्टाइरीन बनाने
में होता है।
- एल्काइनों (अल्काइन) का सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ है, जहाँ n ≥
2 ये असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं, जिनमें कम से कम एक कार्बन-कार्बन त्रिबंध (C≡C) होता है।
उदाहरण: एसिटिलीन (C₂H₂), प्रोपाइन (C₃H₄), ब्यूटाइन (C₄H₆)। ये अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं। एसिटिलीन
(C₂H₂) सबसे सरल एल्काइन है, जो कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂) के जल अपघटन से बनता है। इसका उपयोग
ऑक्सी-एसिटिलीन वेल्डिंग (ताप ~3500°C), कटिंग, विलायक, प्लास्टिक (PVC, पॉलिएस्टर, पॉलीअसिटिलीन), रबर
(नियोप्रीन), दवाएँ, विटामिन ए, विस्फोटक (विनाइल एसीटेट, एक्रिलोनाइट्राइल) तथा रासायनिक संश्लेषण में
मध्यवर्ती के रूप में होता है।
- एल्कोहल (सरल एल्कोहल - मेथेनॉल, इथेनॉल, प्रोपेनॉल) जल में
विलेय (मिसिबल) होते हैं क्योंकि उनका हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह जल के अणुओं के साथ हाइड्रोजन
बंध बनाता है। जैसे-जैसे कार्बन श्रृंखला लंबी होती है (ब्यूटेनॉल, पेंटेनॉल...), जल में विलेयता घटती जाती
है क्योंकि हाइड्रोफोबिक (जल-विरोधी) एल्किल भाग बढ़ता है। यह गुण एल्कोहल को उत्तम सार्वत्रिक (पानी एवं
ग्रीस दोनों में घुलने वाला) विलायक बनाता है, जिससे इत्र, दवाइयाँ, टिंचर एवं पेंट थिनर बनते हैं।
- एल्कोहल (विशेषतः इथेनॉल, मेथेनॉल, ब्यूटेनॉल) का उपयोग ईंधन के
रूप में किया जाता है इथेनॉल पेट्रोल में 10-85% (E10, E85) मिलाकर गैसोहोल बनाया जाता है, जो
नवीकरणीय (जैव-ईंधन) है तथा CO उत्सर्जन कम करता है। मेथेनॉल का उपयोग रेसिंग कारों, रॉकेट ईंधन में होता
है। ब्यूटेनॉल उच्च ऊर्जा घनत्व वाला अग्रणी बायोब्यूटानॉल ईंधन है। एल्कोहल ईंधन सेल में भी प्रयुक्त होते
हैं। ब्राज़ील में गन्ना-आधारित इथेनॉल वाहन ईंधन के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।
- हाइड्रोकार्बन पेट्रोलियम (कच्चा तेल) एवं प्राकृतिक गैस के
मुख्य घटक हैं पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन का एक जटिल मिश्रण है, जिसे प्रभाजी आसवन (फ्रैक्शनल
डिस्टिलेशन) द्वारा विभिन्न अंशों (फ्रैक्शन) में अलग किया जाता है: पेट्रोलियम ईथर (C₅-C₆), पेट्रोल
(C₇-C₁₂), केरोसीन (C₁₂-C₁₆), डीजल (C₁₅-C₂₀), ईंधन तेल (C₂₀-C₃₀), लुब्रिकेंट (C₃₀-C₅₀), बिटुमेन
(C₅₀-C₇₀)। प्राकृतिक गैस में मुख्यतः मीथेन (85-90%), ईथेन (5-10%), प्रोपेन (2-4%) तथा ब्यूटेन (1-2%)
होते हैं। कोयला भी हाइड्रोकार्बन एवं अन्य कार्बनिक यौगिकों से बना होता है।
- मेथेनॉल (मिथाइल एल्कोहल, CH₃OH) विषैला (टॉक्सिक) होता
है यह एक अत्यधिक जहरीला एल्कोहल है, जिसके सेवन से मेटाबोलिक एसिडोसिस, अंधापन (10 ml),
मृत्यु (30-100 ml) हो सकती है क्योंकि शरीर यकृत में इसे फॉर्मल्डिहाइड एवं फॉर्मिक अम्ल में ऑक्सीकृत करता
है। इसका उपयोग औद्योगिक विलायक, एंटीफ्रीज, रेसिंग ईंधन, फॉर्मल्डिहाइड (HCHO), एसीटिक अम्ल (CH₃COOH), DME
(डाइमेथिल ईथर), MTBE (मिथाइल टर्शरी-ब्यूटिल ईथर) एवं फोटोकॉपी द्रव में होता है। इसका उपचार फोमेपिज़ोल या
इथेनॉल से किया जाता है।
- ईथेन (C₂H₆) का उपयोग प्रकाश एवं ईंधन के रूप में होता था
(पुराने क्रिसमस लैंप, रिफाइनरी गैस) वर्तमान में इसका उपयोग मुख्यतः एथिलीन (C₂H₄) के उत्पादन
के लिए भाप क्रैकिंग (स्टीम क्रैकिंग) में किया जाता है, जो प्लास्टिक, पॉलिथीन, PVC, एथिलीन ग्लाइकॉल,
पॉलीस्टाइरीन एवं स्टाइरीन का अग्रदूत है। ईथेन प्राकृतिक गैस का दूसरा सबसे प्रचुर घटक (5-10%) है, जिसे
रिफ्रिजरेशन एवं क्रायोजेनिक प्रभाजी आसवन द्वारा मीथेन से पृथक किया जाता है।
- प्रोपेन (C₃H₈) LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) का मुख्य घटक
(80% तक) है यह रंगहीन, गंधहीन गैस है, जिसे रिसाव का पता लगाने के लिए एथिल मर्कैप्टन (सड़े
अंडे की गंध) मिलाया जाता है। इसका उपयोग रसोई गैस, BBQ ग्रिल, कैंपिंग स्टोव, हीटर, ड्रायर, रेफ्रिजरेंट
(R-290), एरोसोल प्रणोदक एवं पेट्रोल के साथ मिश्रित ईंधन के रूप में होता है। यह प्रोपिलीन (C₃H₆) एवं
एक्रिलोनाइट्राइल (CH₂=CH-C≡N) के उत्पादन का फीडस्टॉक भी है।
- ब्यूटेन (C₄H₁₀) गैस सिलेंडर (पोर्टेबल LPG कार्ट्रिज, कैंपिंग
स्टोव, लाइटर) में होता है यह आसानी से द्रवित हो जाता है (दबाव में कमरे के ताप पर द्रव) तथा
इसका क्वथनांक -0.5°C होता है। इसका उपयोग हल्के लाइटर (ब्यूटेन लाइटर), पोर्टेबल बर्नर, टार्च, रिफाइनरी
एवं पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक (ब्यूटाडाइन, ब्यूटिलीन, मेथिल टर्शरी-ब्यूटिल ईथर - MTBE) बनाने में होता है।
LPG में प्रोपेन एवं ब्यूटेन का मिश्रण (लगभग 60:40 से 80:20) होता है।
- बेंजीन (C₆H₆) एक सुगंधित यौगिक है, जो असंतृप्त होते हुए भी
एल्कीनों की भाँति तीव्र योगात्मक अभिक्रियाएँ नहीं देता इसकी स्थिरता अनुनाद (रेज़ोनेंस) एवं
वलय में डिलोकलाइज्ड π-इलेक्ट्रॉनों (छह π-इलेक्ट्रॉन, हकल नियम 4n+2) के कारण होती है। इसके कारण यह
प्रतिस्थापन (इलेक्ट्रोफिलिक एरोमैटिक प्रतिस्थापन - EAS) अभिक्रियाएँ (नाइट्रेशन, हैलोजनीकरण, सल्फोनेशन,
फ्राइडल-क्राफ्ट्स एल्किलेशन/ऐसिलेशन) देता है। यह रंगहीन, अस्थिर, अत्यधिक ज्वलनशील एवं कैंसरकारी
(ल्यूकेमिया का कारण) द्रव है।
- टॉल्यूईन (मिथाइलबेंजीन, C₆H₅-CH₃) रंग (डाई) एवं विस्फोटक (TNT
- ट्राइनाइट्रोटॉल्यूनि) बनाने में उपयोगी है यह बेंजीन की तुलना में कम विषैला एवं अधिक
सुरक्षित विलायक है, जिसका उपयोग पेंट थिनर, एडहेसिव, नेल पॉलिश रिमूवर, प्रिंटिंग स्याही, रबर एवं
प्लास्टिक उद्योग में किया जाता है। टॉल्यूईन के नाइट्रेशन (नाइट्रिक अम्ल + सल्फ्यूरिक अम्ल) से TNT बनता
है, जो एक स्थिर, अपेक्षाकृत सुरक्षित विस्फोटक है जो बिना झटके के नहीं फटता, एवं गलनांक 80.8°C होता है,
जिसे भाप से पिघलाकर गोले या बम में डाला जाता है।
- एल्कोहल (प्राथमिक एल्कोहल, 1°) डिहाइड्रेशन (जल निष्कासन) से
एल्कीन बनाते हैं यह अभिक्रिया सांद्र सल्फ्यूरिक (H₂SO₄) या फॉस्फोरिक (H₃PO₄) अम्ल की
उपस्थिति में 160-180°C पर की जाती है: C₂H₅OH (इथेनॉल) → C₂H₄ (एथिलीन) + H₂O। अभिक्रिया उन्मूलन (E1 या E2
तंत्र) द्वारा होती है, तथा एल्कीन की स्थिरता (ज़ैतसेव नियम) अभिक्रिया की दिशा निर्धारित करती है। इसके
विपरीत, एल्कीन का हाइड्रेशन (जलयोजन) एल्कोहल बनाता है।
- हाइड्रोकार्बन का पूर्ण दहन (पर्याप्त ऑक्सीजन में) कार्बन
डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) उत्पन्न करता है, तथा ऊष्मा मुक्त करता है उदाहरण: CH₄ + 2O₂ →
CO₂ + 2H₂O + ऊर्जा (890 kJ/mol)। यह एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है, जो ईंधन (पेट्रोल, डीजल, LPG, CNG) का
ऊर्जा स्रोत है। अपूर्ण दहन (सीमित ऑक्सीजन) से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO, विषैली गैस), कालिख (कार्बन) एवं
अन्य प्रदूषक बनते हैं, जो वायु प्रदूषण एवं श्वसन रोगों के कारण होते हैं।
- कार्बनिक यौगिकों में कार्बन (C) की संयोजकता (वैलेंसी) 4 होती
है अर्थात एक कार्बन परमाणु अपने चारों (4) सहसंयोजक बंध बनाकर चार अन्य परमाणुओं (C, H, O, N,
S, हैलोजन, आदि) से जुड़ सकता है। यह बंध एकल (C-C, C-H, C-O, C-N), द्विबंध (C=C, C=O) या त्रिबंध (C≡C,
C≡N) हो सकते हैं। चतुःसंयोजकता का नियम सबसे पहले केकुले एवं कूपर ने प्रस्तावित किया था। यह कार्बनिक
यौगिकों के विशाल विविधता एवं असीमित आण्विक संरचनाओं (श्रृंखला, शाखित, वलय) का कारण है।
- केटेनेशन (कैटेनेशन) कार्बन की वह विशेषता है जिससे कार्बन
परमाणु आपस में सहसंयोजक बंध बनाकर लंबी श्रृंखलाएँ, शाखाएँ एवं वलय बनाते हैं यह कार्बनिक
यौगिकों की अपरिमित संख्या एवं जटिलता का आधार है। सिलिकॉन (Si) एवं सल्फर (S) भी कुछ सीमा तक केटेनेशन
प्रदर्शित करते हैं, परन्तु कार्बन सबसे अधिक प्रबल केटेनेशन क्षमता रखता है, क्योंकि C-C बंध बहुत मजबूत
(346 kJ/mol) होता है। यही कारण है कि 30 लाख से अधिक कार्बनिक यौगिक ज्ञात हैं, जबकि अकार्बनिक यौगिकों की
संख्या लगभग 1.5 लाख है।
- एल्कोहल (प्राथमिक एल्कोहल, 1°) का ऑक्सीकरण (KMnO₄, K₂Cr₂O₇/
H₂SO₄ द्वारा) पहले एल्डिहाइड बनाता है, फिर कार्बोक्सिलिक अम्ल उदाहरण: C₂H₅OH (इथेनॉल) →
CH₃CHO (एसीटैल्डिहाइड) → CH₃COOH (एसीटिक अम्ल)। द्वितीयक एल्कोहल (2°) के ऑक्सीकरण से कीटोन (C=O) बनते
हैं, जबकि तृतीयक एल्कोहल (3°) सामान्य अवस्थाओं में ऑक्सीकरण नहीं होते, बल्कि अपघटित हो जाते हैं।
एल्डिहाइड परीक्षण (टॉलेन्स, फेहलिंग, शिफ अभिकर्मक) इसी अवधारणा पर आधारित हैं।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) का उपयोग पेय (शराब, बीयर, वाइन, मदिरा) में
होता है किण्वन द्वारा उत्पादित इथेनॉल (बीयर में 4-5%, वाइन में 12-15%) को आसवन द्वारा
सांद्रित (40-50% स्पिरिट, 95% रेक्टिफाइड स्पिरिट) किया जाता है। एथेनॉल का सेवन तंत्रिका तंत्र को अवसादित
करता है। अत्यधिक सेवन से जिगर (सिरोसिस), मस्तिष्क, हृदय एवं अग्न्याशय को क्षति पहुँचती है। 100% शुद्ध
एथेनॉल (निर्जलीकृत) को एब्सोल्यूट एल्कोहल कहते हैं। पेय इथेनॉल के विपरीत, मेथेनॉल (वुड एल्कोहल) अत्यधिक
विषैला होता है।
- मेथेन (CH₄) मुख्यतः प्राकृतिक गैस, दलदली गैस (मार्श गैस) एवं
गोबर गैस (बायोगैस) के रूप में पाई जाती है इसे 'फायरफ्लाई गैस' भी कहते हैं क्योंकि दलदलों
एवं लैण्डफिल में यह स्वतः प्रज्वलित होकर विचित्र ज्वालाएँ दिखाती है। बायोगैस (60-70% मीथेन) जैविक कचरे
के अवायवीय अपघटन (एनारोबिक डाइजेशन) से बनती है। यह एक प्रबल ग्रीनहाउस गैस है जो वायुमंडलीय मीथेन का 9%
योगदान देती है। मीथेन की ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (GWP) 20 वर्ष में CO₂ की तुलना में 84 गुना अधिक है।
- एसिटिलीन (C₂H₂, एथाइन) का उपयोग ऑक्सी-एसिटिलीन वेल्डिंग
(कटिंग एवं वेल्डिंग) में किया जाता है जहाँ यह ऑक्सीजन के साथ जलकर ~3500°C की ज्वाला उत्पन्न
करता है (2C₂H₂ + 5O₂ → 4CO₂ + 2H₂O)। यह कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂) के जल अपघटन से बनता है: CaC₂ + 2H₂O →
C₂H₂ + Ca(OH)₂। एसिटिलीन अत्यधिक अस्थिर एवं विस्फोटक है, विशेष रूप से 2 atm दबाव से अधिक पर, इसलिए इसे
एसीटोन में घोलकर स्टील सिलेंडरों में संग्रहित किया जाता है। इसका उपयोग विनाइल क्लोराइड (PVC),
एक्रिलोनाइट्राइल, नियोप्रीन रबर, एसीटैल्डिहाइड, क्लोरोप्रीन, 1,4-ब्यूटेनेडिओल (BDO) एवं विटामिन ए, के
सिंथेसिस में भी होता है।
- बेंजीन (C₆H₆) का उपयोग एक उत्तम कार्बनिक विलायक (ऑर्गेनिक
सॉल्वेंट) के रूप में किया जाता है, यद्यपि इसकी विषाक्तता के कारण इसका उपयोग घट रहा है यह
ग्रीस, तेल, रबर, रेजिन, पेंट, वार्निश, चिपकने वाले पदार्थों एवं कई कार्बनिक यौगिकों को घोलता है।
प्रयोगशालाओं में इसे अब अक्सर टॉल्यूनि (कम विषैला) या अन्य सॉल्वेंट से बदला जा रहा है। हालाँकि, बड़े
पैमाने पर रासायनिक संश्लेषण में इसका उपयोग मध्यवर्ती (एनिलिन, फिनॉल, स्टाइरीन, नाइट्रोबेंजीन, डिटर्जेंट,
साइक्लोहेक्सेन) के उत्पादन हेतु होता है।
- एल्कोहल (R-OH) हैलोजन (HCl, HBr, HI, PCl₃, PCl₅, SOCl₂) से
प्रतिस्थापन अभिक्रिया देते हैं, जिससे एल्किल हैलाइड (R-X) बनते हैं उदाहरण: C₂H₅OH + HCl
(ZnCl₂ उत्प्रेरक) → C₂H₅Cl (एथिल क्लोराइड) + H₂O। अभिक्रिया की दर एल्कोहल के प्रकार पर निर्भर करती है:
तृतीयक (3°) > द्वितीयक (2°) > प्राथमिक (1°)। लुकास अभिकर्मक (ZnCl₂ + सांद्र HCl) का उपयोग एल्कोहल के
वर्गीकरण के लिए किया जाता है, क्योंकि तृतीयक एल्कोहल कमरे के ताप पर तुरंत, द्वितीयक कुछ मिनटों में, जबकि
प्राथमिक एल्कोहल गर्म करने पर अभिक्रिया करते हैं। यह अभिक्रिया न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन (SN1 या SN2)
तंत्र द्वारा होती है।
- हाइड्रोकार्बन का अधूरा दहन एवं वाष्पीकरण वायु प्रदूषण (कार्बन
मोनोऑक्साइड, कालिख, नाइट्रोजन ऑक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक) का प्रमुख कारण है ये
प्रदूषक स्मॉग (धुँआ-कोहरा), अम्ल वर्षा (सल्फ्यूरिक एवं नाइट्रिक अम्ल), ग्रीनहाउस प्रभाव (CO₂, CH₄), ओजोन
क्षरण, श्वसन रोग (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस), हृदय रोग एवं कैंसर का कारण बनते हैं। कार्बनिक यौगिकों के
फोटोकैमिकल ऑक्सीकरण से ग्राउंड-लेवल ओजोन (O₃) बनता है, जो फसलों एवं मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कैटालिटिक कन्वर्टर्स, स्क्रबर्स, बेहतर दहन तकनीक एवं इलेक्ट्रिक वाहन प्रदूषण कम कर सकते हैं।
- कार्बनिक रसायन जीवन (बायोकेमिस्ट्री) का आधार है क्योंकि सभी
जैव-अणु (प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, न्यूक्लिक अम्ल - DNA/RNA, विटामिन, एंजाइम, हार्मोन)
कार्बनिक यौगिक हैं प्रोटीन अमीनो अम्ल के पॉलिमर, कार्बोहाइड्रेट शर्करा के पॉलिमर, लिपिड वसा
एवं तेल, न्यूक्लिक अम्ल जीवन की आनुवंशिक सामग्री हैं। प्रकाश संश्लेषण (CO₂ + H₂O → C₆H₁₂O₆ + O₂)
कार्बनिक यौगिकों का जैव-उत्पादन है। खाद्य (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा), ऊर्जा (ATP), दवाएँ,
एंटीबायोटिक्स, विटामिन, पौधों के रंग (क्लोरोफिल, कैरोटीनॉयड), एंजाइम, हीमोग्लोबिन आदि सभी कार्बनिक रसायन
पर आधारित हैं।
- एल्केन (पैराफिन) को 'पैराफिन' इसलिए कहते हैं क्योंकि लैटिन
में 'पैरम एफिनिस' का अर्थ है 'कम आत्मीयता' - अर्थात ये रासायनिक रूप से कम अभिक्रियाशील होते
हैं ये अप्रतिक्रियाशील होते हैं क्योंकि इनमें केवल मजबूत सिग्मा (σ) C-C एवं C-H बंध होते
हैं, एवं कोई π-बंध नहीं होता। ये सामान्य ताप पर अम्ल, क्षार, ऑक्सीकारक (KMnO₄), अपचायक (H₂) से अभिक्रिया
नहीं करते। ये केवल उच्च ताप (दहन) एवं पराबैंगनी (UV) प्रकाश की उपस्थिति में मुक्त मूलक (फ्री रेडिकल)
हैलोजनीकरण (क्लोरीनीकरण, ब्रोमीनीकरण) में भाग लेते हैं। उदाहरण: CH₄ + Cl₂ (UV) → CH₃Cl (मिथाइल क्लोराइड)
+ HCl।
- एल्कीन (ओलेफिन) को 'ओलेफिन' (तेल बनाने वाला) इसलिए कहते हैं
क्योंकि एथिलीन (C₂H₄) एवं क्लोरीन की अभिक्रिया से एथिलीन डाइक्लोराइड (C₂H₄Cl₂, एक तैलीय द्रव) बनता
था एल्कीन योगात्मक (एडिशन) अभिक्रियाओं के प्रति अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं, क्योंकि
द्विबंध (C=C) में एक सिग्मा (σ) एवं एक पाई (π) बंध होता है, जो आसानी से टूट जाता है। वे H₂
(हाइड्रोजनीकरण), Br₂ (ब्रोमीनीकरण - ब्रोमीन जल का रंगहीन होना), HCl, H₂O (हाइड्रेशन - एल्कोहल बनाना),
पॉलिमराइजेशन (पॉलिथीन बनाना) आदि अभिक्रियाएँ देते हैं।
- एल्काइन (एसिटिलीन श्रेणी) में त्रिबंध (C≡C) के कारण टर्मिनल
एल्काइन (R-C≡C-H) का हाइड्रोजन अम्लीय (सोडियम एमाइड, NaNH₂, से अभिक्रिया) होता है pKa ~25,
जो एल्केन (~50) या एल्कीन (~44) से अधिक अम्लीय है। यह सोडियम धातु (Na) से अभिक्रिया कर सोडियम एसिटिलाइड
(R-C≡C⁻Na⁺) बनाता है, जो एक न्यूक्लियोफाइल है एवं एल्किल हैलाइड के साथ अभिक्रिया कर श्रृंखला बढ़ाता है
(कोर-हाउस संश्लेषण)। टर्मिनल एल्काइन अमोनियाकल सिल्वर नाइट्रेट (AgNO₃/NH₄OH) या अमोनियाकल क्यूप्रस
क्लोराइड (CuCl/NH₄OH) से क्रमशः सफेद (AgC≡CR) या लाल (CuC≡CR) अवक्षेप देते हैं, जो एल्काइन की पहचान है।
- एल्कोहल में हाइड्रॉक्सिल (-OH) क्रियात्मक समूह होता है, जो
उनके अधिकांश गुणों (जल में विलेयता, उच्च क्वथनांक, अम्लता/क्षारीयता, अभिक्रियाशीलता) के लिए
उत्तरदायी है -OH समूह हाइड्रोजन बंध बनाता है, जिसके कारण एल्कोहल के क्वथनांक उनके संगत
एल्केन या एल्कीन से बहुत अधिक होते हैं (उदाहरण: C₂H₅OH, b.p. 78°C; एथिलीन b.p. -103.7°C)। यह एल्कोहल को
प्रोटिक (प्रोटॉन दान करने वाला) विलायक बनाता है। -OH समूह ध्रुवीय है, जिससे एल्कोहल प्रतिस्थापन, उन्मूलन
एवं ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं में भाग लेता है।
- हाइड्रोकार्बन दो प्रकार के होते हैं: संतृप्त (सभी C-C एकल
बंध) - एल्केन, साइक्लोएल्केन; एवं असंतृप्त (कम से कम एक C=C या C≡C) - एल्कीन, एल्काइन, एरोमैटिक
(बेंजीन व्युत्पन्न) संतृप्त हाइड्रोकार्बन अधिक स्थिर एवं कम अभिक्रियाशील होते हैं, जबकि
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन अधिक अभिक्रियाशील होते हैं, जो योगात्मक, ऑक्सीकरण एवं पॉलिमराइजेशन अभिक्रियाएँ
देते हैं। संतृप्ति की डिग्री जितनी अधिक होगी (एल्केन < एल्कीन < एल्काइन), अभिक्रियाशीलता उतनी ही अधिक
होगी।
- कार्बनिक यौगिकों का उपयोग दवाओं (फार्मास्यूटिकल्स) के निर्माण
में व्यापक रूप से होता है एस्पिरिन (एसिटाइलसैलिसिलिक अम्ल), पैरासिटामोल (एसिटामिनोफेन),
इबुप्रोफेन, एंटीबायोटिक्स (पेनिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन), एंटीवायरल (एसाइक्लोविर,
रेमडेसिविर), एनेस्थेटिक्स (लिडोकेन, प्रोपोफोल), एंटीहिस्टामाइन (सेटिरिज़िन), एंटीडिप्रेसेंट
(फ्लुओक्सेटीन - प्रोज़ैक), एंटीकैंसर (पैक्लिटैक्सेल - टैक्सोल), स्टैटिन (कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली) आदि
सभी कार्बनिक यौगिक हैं। कार्बनिक रसायन ही नई दवाओं का डिज़ाइन, संश्लेषण एवं परीक्षण करता है।
- मेथेन (CH₄) एक प्रबल ग्रीनहाउस गैस है, जो वायुमंडल में CO₂ की
तुलना में अधिक प्रभावी रूप से ऊष्मा रोकती है इसका वैश्विक तापन क्षमता (GWP) 20 वर्ष में CO₂
का 84 गुना एवं 100 वर्ष में 28 गुना होता है। मीथेन मुख्यतः दलदल, चावल के खेत, लैण्डफिल (कचरा डंप),
पेट्रोलियम/प्राकृतिक गैस रिसाव, कोयला खदानें, पशुधन (गाय- भैंस का पाचन - एंटेरिक किण्वन, गोबर) तथा
जीवाश्म ईंधन के दहन से उत्सर्जित होती है। मीथेन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए बायोगैस संयंत्र, लैण्डफिल
गैस कैप्चर, रिसाव नियंत्रण, आहार में परिवर्तन (पशुओं में) एवं जैव-डाइजेस्टर अपनाए जाते हैं।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) एक बायोफ्यूल (जैव-ईंधन) है, जो नवीकरणीय
स्रोतों (गन्ना, मक्का, गेहूँ, ज्वार, सोयाबीन, सेल्यूलोसिक बायोमास) के किण्वन से प्राप्त होता
है यह एक जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल) की तुलना में स्वच्छ जलता है, कम कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एवं
कण उत्सर्जित करता है, लेकिन उच्च ऑक्टेन संख्या (~108) रखता है। गैसोहोल (पेट्रोल में 10-22% इथेनॉल) का
उपयोग संयुक्त राज्य (E10, E85), ब्राज़ील (E27-E100), भारत (E10 - 2023, लक्ष्य E20 - 2025) में होता है।
जीवाश्म ईंधन के विपरीत, जैव-इथेनॉल कार्बन-तटस्थ (पौधे CO₂ अवशोषित करते हैं) होता है।
- बेंजीन (C₆H₆) को अंतर्राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC)
द्वारा समूह 1 (मानव कार्सिनोजेन - कैंसरजनक) में वर्गीकृत किया गया है यह अस्थि मज्जा पर
प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जिससे ल्यूकेमिया (एक्यूट माइलॉयड ल्यूकेमिया - AML, एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक
ल्यूकेमिया - ALL) तथा अन्य रक्त विकार (अप्लास्टिक एनीमिया) होते हैं। इसका लंबे समय तक संपर्क में रहना
(साँस द्वारा) अस्थि मज्जा को नुकसान पहुँचाता है, लाल एवं श्वेत रक्त कोशिकाओं एवु प्लेटलेट्स की संख्या कम
करता है। इसके कारण कई देशों में गैसोलीन (पेट्रोल) में बेंजीन की मात्रा 1% से कम रखी गई है। औद्योगिक
उपयोग में सुरक्षित प्रतिस्थापन (टॉल्यूनि) एवं सख्त सुरक्षा उपाय किए जाते हैं।
- एल्कोहल (इथेनॉल, आइसोप्रोपेनॉल) का उपयोग एक सामान्य घरेलू एवं
अस्पतालीय कीटाणुनाशक (डिसइन्फेक्टेंट) के रूप में होता है 70% v/v इथेनॉल या 60-90%
आइसोप्रोपेनॉल का जलीय विलयन बैक्टीरिया, विषाणु (कोरोनावायरस, इन्फ्लुएंजा, एचआईवी, एचएसवी, हेपेटाइटिस
बी), कवक एवं प्रोटोजोआ को मारता है (सेलुलर निर्जलीकरण, कोगुलेशन एवु सेल झिल्ली विघटन)। 70% सांद्रता 95%
से अधिक प्रभावी होती है क्योंकि जल प्रोटीन के जमाव (कोएगुलेशन) के लिए आवश्यक होता है। यह हैंड
सैनिटाइज़र, शराब से साफ करना, इंजेक्शन से पहले त्वचा की सफाई एवं सर्जिकल उपकरणों के स्टरलाइजेशन में
प्रयुक्त होता है।
- हाइड्रोकार्बन (जैसे एथिलीन, प्रोपिलीन, स्टाइरीन, विनाइल
क्लोराइड, टेरेफ्थैलिक अम्ल) पॉलिमर (प्लास्टिक, रबर, फाइबर, रेजिन, एडहेसिव) बनाने के मोनोमर (एकल
इकाई) होते हैं एथिलीन → पॉलिथीन (LDPE, HDPE) - प्लास्टिक बैग, बोतलें; प्रोपिलीन →
पॉलीप्रोपिलीन (PP) - कार बम्पर, रस्सी; स्टाइरीन → पॉलीस्टाइरीन (PS) - फोम कप, पैकेजिंग; विनाइल क्लोराइड
→ पॉलिविनाइल क्लोराइड (PVC) - पाइप, केबल; टेरेफ्थैलिक अम्ल + एथिलीन ग्लाइकॉल → पॉलिएस्टर (PET) - पेट की
बोतलें, कपड़े; एथिलीन + प्रोपिलीन → EPDM रबर। ये पॉलिमर ऑटोमोबाइल, निर्माण, चिकित्सा, इलेक्ट्रॉनिक्स,
कृषि, खिलौने आदि क्षेत्रों में उपयोग होते हैं।
- आधुनिक कार्बनिक रसायन की नींव फ्रेडरिक वोलर (Friedrich
Wöhler) ने 1828 में रखी, जब उन्होंने अकार्बनिक अमोनियम साइनेट (NH₄CNO) को गर्म करके यूरिया
(NH₂-CO-NH₂) - एक कार्बनिक यौगिक - का संश्लेषण किया इस प्रयोग ने 'वीटालिस्टिक सिद्धांत' (यह
विश्वास कि कार्बनिक यौगिक केवल जीवों (वाइटल फोर्स) द्वारा ही बन सकते हैं) को अस्वीकार कर दिया। इसने
कार्बनिक रसायन को अकार्बनिक रसायन की तरह प्रयोगशाला में संश्लेषण के योग्य बनाया। इसके बाद, कार्बनिक
यौगिकों का संश्लेषण (एसीटिक अम्ल, बेंजीन, टेट्राहेड्रल कार्बन, संरचना, स्टीरियोकैमिस्ट्री) तीव्रता से
बढ़ा।
- एल्केन (पैराफिन) अप्रतिक्रियाशील (रिएक्टिव न होने वाले) होते
हैं, केवल सामान्य ताप पर अम्ल, क्षार, ऑक्सीकारकों से अभिक्रिया नहीं करते ये केवल निम्न
अभिक्रियाएँ देते हैं: (i) दहन (ऊष्मा ऊर्जा), (ii) UV प्रकाश में मुक्त मूलक हैलोजनीकरण (क्लोरीनीकरण,
ब्रोमीनीकरण), (iii) क्रैकिंग (उच्च ताप, 500-700°C, उत्प्रेरक - छोटे एल्केन एवं एल्कीन बनाने), (iv)
रिफॉर्मिंग (एरोमैटिक्स बनाने), (v) पायरोलिसिस (अति उच्च ताप पर थर्मल अपघटन)।
- एल्कीन द्विबंध (C=C) के कारण योगात्मक (एडिशन) पॉलिमराइजेशन
(धनायनिक, ऋणायनिक, मुक्त मूलक, जिग्लर-नाटा उत्प्रेरक) देते हैं उदाहरण: एथिलीन (C₂H₄) का
पॉलिमराइजेशन (उच्च दबाव, 1000-3000 atm, ताप 80-300°C, ट्रेस ऑक्सीजन उत्प्रेरक) से निम्न-घनत्व पॉलिथीन
(LDPE) बनता है; जिग्लर-नाटा उत्प्रेरक (TiCl₄ + Al(C₂H₅)₃) से उच्च-घनत्व पॉलिथीन (HDPE) बनता है।
पॉलिमराइजेशन एक श्रृंखला अभिक्रिया है जो लंबी पॉलिमर श्रृंखलाएँ बनाती है। इसी प्रकार प्रोपिलीन →
पॉलीप्रोपिलीन (PP), स्टाइरीन → पॉलीस्टाइरीन (PS), विनाइल क्लोराइड → पॉलिविनाइल क्लोराइड (PVC) बनता है।
- एल्काइन (टर्मिनल एल्काइन, R-C≡C-H) अम्लीय होते हैं, क्योंकि
एस्पी (स्प) संकरित कार्बन में इलेक्ट्रॉन-आकर्षी प्रकृति के कारण C-H बंद ध्रुवीकृत होता है
टर्मिनल एल्काइन का pKa ~25 (जल में 50% आयनन नहीं, लेकिन OH⁻ जैसे दुर्बल क्षार से भी अभिक्रिया), जबकि
एल्कीन का pKa ~44 और एल्केन का pKa ~50 होता है। यह अम्लीय H⁺ सोडियम (Na) या सोडियम एमाइड (NaNH₂) जैसे
प्रबल क्षार से अभिक्रिया कर एसिटिलाइड आयन (C≡C⁻) बनाता है। एसिटिलाइड एक शक्तिशाली न्यूक्लियोफाइल है, जो
एल्किल हैलाइड से अभिक्रिया कर बड़े एल्काइन बनाता है (कोर-हाउस संश्लेषण)।
- एल्कोहल (विशेषकर इथेनॉल) आयोडोफॉर्म टेस्ट देता है, जो
CH₃-CH(OH)- समूह (मिथाइल कार्बिनॉल) या CH₃-CO- (मिथाइल कीटोन) वाले यौगिकों की पहचान है
इथेनॉल को आयोडीन (I₂) एवं सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के साथ गर्म करने पर पीले रंग का आयोडोफॉर्म (CHI₃,
ट्राईआयोडोमीथेन) क्रिस्टल अवक्षेपित होता है, जिसमें विशिष्ट कपूर जैसी गंध होती है। आयोडोफॉर्म टेस्ट
एसीटैल्डिहाइड (CH₃CHO), मेथिल कीटोन (R-CO-CH₃), एवं ऐसे एल्कोहल जो ऑक्सीकरण पर ये समूह बनाते हैं, के लिए
भी सकारात्मक होता है। हालाँकि अब अधिक सटीक स्पेक्ट्रोस्कोपिक विधियाँ उपलब्ध हैं, फिर भी यह प्रयोगशाला
में एक गुणात्मक परीक्षण है।
- हाइड्रोकार्बन (विशेषतः एल्केन) मुक्त मूलक (फ्री रेडिकल)
हैलोजनीकरण (प्रतिस्थापन) अभिक्रियाएँ देते हैं, जो UV प्रकाश या उच्च ताप पर आरंभ होती हैं
अभिक्रिया तीन चरणों में होती है: (i) दीक्षा (इनिशिएशन) - Cl₂ प्रकाश/ताप से 2Cl• (क्लोरीन मूलक) में टूटता
है; (ii) प्रसार (प्रोपेगेशन) - Cl• + CH₄ → HCl + CH₃•, फिर CH₃• + Cl₂ → CH₃Cl + Cl• (श्रृंखला जारी);
(iii) समापन (टर्मिनेशन) - दो मूलक मिलकर अक्रिय अणु बनाते हैं (Cl• + Cl• → Cl₂, CH₃• + Cl• → CH₃Cl, CH₃•
+ CH₃• → C₂H₆)। यह एक श्रृंखला अभिक्रिया है जो मोनो-, डाई-, ट्राई- एवं टेट्राक्लोरोमेथेन उत्पाद देती है।
यह अभिक्रिया गैर-चयनात्मक है एवं सभी हैलोजन (F₂ सबसे अधिक अभिक्रियाशील, I₂ अभिक्रियाशील नहीं) के लिए
लागू होती है।
- अधिकांश कार्बनिक यौगिक ध्रुवीय (पोलर) नहीं होते हैं
(गैर-ध्रुवीय, नॉनपोलर), या बहुत कम ध्रुवीय होते हैं कार्बनिक अणु मुख्यतः गैर-ध्रुवीय C-C
एवं C-H बंधों से बने होते हैं (वैद्युत ऋणात्मकता में छोटा अंतर - C=2.55, H=2.20, अंतर 0.35)। इसके कारण:
(i) ये अधिकांशतः जल (ध्रुवीय विलायक) में अघुलनशील होते हैं, लेकिन कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl₄), ईथर,
बेंजीन, हेक्सेन जैसे गैर-ध्रुवीय विलायकों में घुलनशील होते हैं; (ii) इनका गलनांक एवं क्वथनांक अपेक्षाकृत
कम होता है; (iii) ये विद्युत के कुचालक होते हैं। कार्बनिक अणुओं में ध्रुवीयता एक क्रियात्मक समूह (जैसे
-OH, -COOH, -NH₂, -CHO, -C=O, -NO₂, -Cl) की उपस्थिति में बढ़ती है, जो जल में विलेयता एवु अंतराआण्विक बल
(हाइड्रोजन बंध) को बढ़ाते हैं।
- मेथेन (CH₄) का उपयोग उर्वरक (अमोनिया, NH₃, हैबर प्रक्रम
द्वारा) बनाने में होता है मेथेन स्टीम रिफॉर्मिंग (CH₄ + H₂O → CO + 3H₂) से हाइड्रोजन (H₂)
बनाती है, जो नाइट्रोजन (N₂) के साथ अभिक्रिया कर अमोनिया (NH₃) बनाती है। अमोनिया का उपयोग प्रत्यक्ष
उर्वरक के रूप में या यूरिया (NH₂-CO-NH₂), अमोनियम नाइट्रेट (NH₄NO₃), अमोनियम सल्फेट ((NH₄)₂SO₄),
डायअमोनियम फॉस्फेट (DAP) आदि के उत्पादन में होता है। इस प्रकार मीथेन अप्रत्यक्ष रूप से विश्व की खाद्य
आपूर्ति (हरित क्रांति) का एक प्रमुख स्तंभ है।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) का उपयोग चिकित्सा (एंटीसेप्टिक, टिंचर तैयार
करना, अरक (स्पिरिट) के रूप में) एवं फार्मास्यूटिकल उद्योग (दवाओं को घोलने, निकालने, परिरक्षण) में
होता है यह दवाओं (डिजिटॉक्सिन, एट्रोपिन, मॉर्फिन, कुनैन), हर्बल अर्क (टिंचर - आयोडीन टिंचर,
बेलाडोना टिंचर), सिरप, इनहेलेंट, लिनिमेंट (मालिश द्रव), डाई, एंटीबायोटिक्स, कॉर्टिकोस्टेरॉयड, विटामिन
(विटामिन बी कॉम्प्लेक्स), एंटीहिस्टामाइन, ऐनेस्थेटिक्स (ईथर) तैयार करने में विलायक के रूप में कार्य करता
है। यह सर्जिकल स्पिरिट (95% इथेनॉल + 5% मेथेनॉल/पानी) कीटाणुनाशक का मुख्य घटक है।
- बेंजीन (C₆H₆) का उपयोग कई कीटनाशकों (पेस्टीसाइड्स) के निर्माण
में होता है, हालाँकि अब कई प्रतिबंधित हो चुके हैं ऐतिहासिक रूप से, बेंजीन का उपयोग BHC
(बेंजीन हेक्साक्लोराइड, लिंडेन - एक कीटनाशक) बनाने में होता था: C₆H₆ + 3Cl₂ → C₆H₆Cl₆। DDT
(डाइक्लोरोडाइफेनिलट्राइक्लोरोइथेन) भी बेंजीन व्युत्पन्न से बनता था। आधुनिक समय में, बेंजीन-आधारित
कीटनाशक जैसे कि क्लोरपाइरीफोस, डायज़िनॉन, प्रोपोक्सुर, कार्बोफ्यूरान, मैलाथियान, पाइरेथ्रोइड
(साइपरमेथ्रिन, डेल्टामेथ्रिन) आदि बनाए जाते हैं, हालाँकि बेंजीन रिंग की उपस्थिति के कारण ही इनमें
कीटनाशक गतिविधि होती है।
- एल्कोहल (इथेनॉल, आइसोप्रोपेनॉल, बेंज़ाइल एल्कोहल, सेटाइल
एल्कोहल) का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन (कॉस्मेटिक्स) में विलायक, पायसीकारक (इमल्सीफायर), गाढ़ा करने वाला,
परिरक्षक एवं त्वचा-देखभाल (नमी प्रदान करने वाला) के रूप में होता है इथेनॉल लोशन, टॉनिक,
इत्र, हेयर जैल, माउथवॉश, डिओडोरेंट, परफ्यूम में उपयोग होता है। आइसोप्रोपेनॉल नेल पॉलिश रिमूवर (एसीटोन के
साथ), कुछ फेस वॉश में होता है। सेटाइल एल्कोहल (C₁₆H₃₃OH) एक फैटी एल्कोहल है जो क्रीम, लोशन, कंडीशनर,
शेविंग क्रीम, लिपस्टिक में गाढ़ापन एवं स्थिरता प्रदान करता है। एल्कोहल युक्त कॉस्मेटिक्स जीवाणुरोधी,
जल्दी सूखने वाले एवं चिकनी बनावट वाले होते हैं।
- हाइड्रोकार्बन (एल्केन्स, एरोमैटिक्स) डिटर्जेंट (सर्फेक्टेंट)
बनाने के लिए आवश्यक हाइड्रोफोबिक (जल-विरोधी) भाग होते हैं एक सर्फेक्टेंट (जैसे सोडियम
डोडेसिल बेंजीन सल्फोनेट - LABS) में एक हाइड्रोफिलिक (जल-प्रेमी) सिर (सल्फोनेट, SO₃⁻) एवं एक लंबी
हाइड्रोफोबिक (जल-विरोधी) पूंछ (C₁₂H₂₅ - डोडेसिल समूह) होती है। यह पूंछ हाइड्रोकार्बन (डोडेकेन) से बनती
है। डिटर्जेंट इस द्वैध गुण (एम्फीपैथिक) के कारण तेल एवं ग्रीस को पानी में घोलने (मिसेल बनाने) में सक्षम
होते हैं। अतः हाइड्रोकार्बन वाशिंग पाउडर, लिक्विड डिटर्जेंट, डिशवॉशिंग लिक्विड, सोप, कंडीशनर, शैम्पू,
फैब्रिक सॉफ्टनर आदि का अभिन्न अंग हैं।
- कार्बनिक रसायन पेट्रोकेमिकल (पेट्रोलियम रसायन) से गहराई से
जुड़ा है, क्योंकि पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन (एल्केन, साइक्लोएल्केन, एरोमैटिक्स) का सबसे बड़ा
प्राकृतिक स्रोत है पेट्रोलियम शोधन (प्रभाजी आसवन, क्रैकिंग, रिफॉर्मिंग, एल्किलेशन,
हाइड्रोट्रीटिंग) से लाखों टन हाइड्रोकार्बन (ईथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन, पेंटेन, हेक्सेन, बेंजीन, टॉल्यूनि,
जाइलीन, एथिलीन, प्रोपिलीन, ब्यूटाडाइन, स्टाइरीन) प्राप्त होते हैं। ये हाइड्रोकार्बन आगे चलकर प्लास्टिक,
रबर, फाइबर, डिटर्जेंट, दवाएँ, विस्फोटक, रंग, उर्वरक, स्नेहक, पेंट, विलायक, कीटनाशक आदि में परिवर्तित
होते हैं। इस प्रकार पेट्रोकेमिकल उद्योग (पेट्रोलियम + रसायन) आधुनिक कार्बनिक रसायन का औद्योगिक आधार है।
- एल्केन (संतृप्त हाइड्रोकार्बन) स्पष्टता से कम अभिक्रियाशील
होते हैं क्योंकि इनमें कोई π-बंध नहीं होता, और C-C तथा C-H सिग्मा (σ) बंध बहुत मजबूत होते
हैं ये अम्ल (H₂SO₄, HCl), क्षार (NaOH), ऑक्सीकारक (KMnO₄, K₂Cr₂O₇), अपचायक (H₂/Ni) आदि के
प्रति सामान्य ताप पर निष्क्रिय होते हैं। ये केवल अत्यधिक परिस्थितियों में अभिक्रिया करते हैं: (i) दहन
(उच्च ताप); (ii) UV प्रकाश में हैलोजनीकरण (Cl₂, Br₂); (iii) 500°C+ पर क्रैकिंग; (iv) पायरोलिसिस (अति
उच्च ताप पर)। यही अप्रतिक्रियाशीलता उन्हें स्नेहक, मोम, वैसलीन, पेट्रोलियम जेली, ट्रांसफार्मर तेल, मोटर
तेल एवं अन्य निष्क्रिय अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त बनाती है।
- एल्कीन (असंतृप्त हाइड्रोकार्बन) ब्रोमीन जल (Br₂/H₂O,
भूरा-लाल) को तुरंत रंगहीन (डिकलराइज़) कर देते हैं, क्योंकि द्विबंध में योगात्मक अभिक्रिया होती है:
C=C + Br₂ → C(Br)-C(Br) (डाइब्रोमोएल्केन, रंगहीन) यह एक तीव्र एवं सरल गुणात्मक परीक्षण है,
जो एल्कीन एवु एल्काइन (C≡C भी Br₂ जोड़ता है) की पुष्टि करता है। एल्केन (संतृप्त) UV प्रकाश के बिना Br₂
के साथ अभिक्रिया नहीं करते। इसी प्रकार, एल्कीन KMnO₄ (बैंगनी) के ऑक्सीकरण से भी रंगहीन (MnO₂ का भूरा
अवक्षेप) होते हैं। यह बेयर परीक्षण (Baeyer's test) एल्कीन एवं एल्काइन की पहचान का दूसरा तरीका है।
- एल्काइन (टर्मिनल एल्काइन, R-C≡C-H) अमोनियाकल क्यूप्रस
क्लोराइड (CuCl + NH₄OH) या अमोनियाकल सिल्वर नाइट्रेट (AgNO₃ + NH₄OH) के साथ अभिक्रिया कर क्रमशः लाल
(कॉपर एसिटिलाइड, Cu-C≡C-R) या सफेद (सिल्वर एसिटिलाइड, Ag-C≡C-R) अवक्षेप देते हैं यह एक
विशिष्ट गुणात्मक परीक्षण है जो टर्मिनल एल्काइन (C≡C-H) को आंतरिक एल्काइन (R-C≡C-R', जहाँ R,R' = एल्किल
समूह) से अलग करता है। यह अभिक्रिया C≡C-H समूह की अम्लीय प्रकृति (क्योंकि Ag⁺ या Cu⁺ एक प्रोटॉन
स्वीकारकर्ता है) पर आधारित है। ये एसिटिलाइड (धातु कार्बाइड) शुष्क अवस्था में विस्फोटक होते हैं, इसलिए
इन्हें गीला ही रखा जाता है।
- एल्कोहल (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) नीले लिटमस पेपर को लाल
नहीं करते; न ही लाल लिटमस को नीला करते हैं क्योंकि एल्कोहल उदासीन (pH 7 के लगभग) होते हैं।
वे न तो H⁺ आयन (अम्ल की तरह) मुक्त करते हैं और न ही OH⁻ आयन (क्षार की तरह) मुक्त करते हैं, अल्कोहल के
आयनन (प्रोटॉन देने/लने) की प्रवृत्ति बहुत कम होती है (pKa ~16-18)। हालाँकि, एल्कोहल अत्यधिक प्रबल अम्लों
(जैसे H₂SO₄) के साथ नमक (आक्सोनियम लवण, R-OH₂⁺) बनाते हैं, और प्रबल क्षारों (जैसे NaH, NaNH₂, Na) के साथ
अभिक्रिया कर एल्कोक्साइड (R-O⁻Na⁺) बनाते हैं।
- हाइड्रोकार्बन (भारी एल्केन, C₂₀-C₅₀) का उपयोग स्नेहक
(लुब्रिकेंट) - मोटर तेल, ग्रीस, हाइड्रोलिक तेल, ट्रांसफार्मर तेल, काटने वाले तेल (कटिंग फ्लूड) के
रूप में किया जाता है ये लंबी-श्रृंखला एल्केन होते हैं, जिनमें उच्च चिपचिपापन (विस्कोसिटी)
एवं उच्च क्वथनांक होता है। ये मशीनों के चलते भागों के बीच एक फिल्म बनाते हैं, घर्षण (फ्रिक्शन) एवं
टूट-फूट (वियर) को कम करते हैं। स्नेहक में एंटीऑक्सीडेंट, विस्कोसिटी सुधारक, डिटर्जेंट, डिस्परसेंट,
एंटीफोम एजेंट, क्षरण (रस्ट) अवरोधक आदि मिलाए जाते हैं। पैराफिनिक, नैफ्थेनिक एवं एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन
विभिन्न प्रकार के स्नेहक में उपयोग होते हैं।
- कार्बनिक यौगिकों में विशिष्ट रासायनिक गुणों वाले क्रियात्मक
समूह (फंक्शनल ग्रुप) होते हैं, जैसे -OH (एल्कोहल), -CHO (एल्डिहाइड), -COOH (कार्बोक्सिलिक अम्ल),
-NH₂ (अमीन), -C=O (कीटोन), -X (हैलोजन), -NO₂ (नाइट्रो), -SO₃H (सल्फोनिक अम्ल), -O- (ईथर), -COOR
(एस्टर), -CONH₂ (एमाइड) आदि ये क्रियात्मक समूह ही कार्बनिक अणुओं की अभिक्रियाशीलता, भौतिक
गुण (गलनांक, क्वथनांक, घुलनशीलता, ध्रुवीयता), अम्लता/क्षारीयता, और जैविक गतिविधि (औषधि में) को निर्धारित
करते हैं। एक ही क्रियात्मक समूह विभिन्न यौगिकों में समान अभिक्रियाएँ देता है।
- मेथेन (CH₄) से, भाप रिफॉर्मिंग (स्टीम रिफॉर्मिंग) के द्वारा
मेथेनॉल (CH₃OH, मिथाइल एल्कोहल) बनता है, यद्यपि यह दो-चरण प्रक्रिया है: (i) CH₄ + H₂O → CO + 3H₂,
(ii) CO + 2H₂ → CH₃OH (ZnO/Cr₂O₃ उत्प्रेरक, 250-300 atm दबाव, 250-300°C ताप) यह मेथनॉल का
मुख्य औद्योगिक संश्लेषण है। मेथनॉल एक महत्वपूर्ण रासायनिक फीडस्टॉक है, जिससे फॉर्मल्डिहाइड (HCHO),
एसीटिक अम्ल (CH₃COOH), मिथाइल टर्शरी-ब्यूटिल ईथर (MTBE - ऑक्टेन बूस्टर), DME (डाइमेथिल ईथर - डीजल
विकल्प), एथिलीन ग्लाइकॉल, विटामिन, फार्मास्युटिकल्स आदि बनाए जाते हैं।
- इथेन (C₂H₆) से इथेनॉल (C₂H₅OH) सीधे नहीं बनता है; औद्योगिक
रूप से इथेनॉल बनाने के दो मुख्य मार्ग हैं: (i) एथिलीन (C₂H₄) का हाइड्रेशन (जलयोजन): C₂H₄ + H₂O →
C₂H₅OH (H₃PO₄ उत्प्रेरक, 300°C, 70 atm); (ii) किण्वन (जैविक): ग्लूकोज (C₆H₁₂O₆) → 2C₂H₅OH + 2CO₂
(खमीर, 25-35°C) एथिलीन हाइड्रेशन (पेट्रोकेमिकल मार्ग) 95%+ शुद्ध इथेनॉल देता है, जबकि
किण्वन जल-अल्कोहल मिश्रण देता है, जिसे आसवन द्वारा सांद्रित किया जाता है।
- बेंजीन (C₆H₆) से क्यूमीन प्रक्रम (क्यूमीन प्रोसेस) द्वारा
फिनॉल (C₆H₅OH) एवं एसीटोन (CH₃-CO-CH₃) बनता है चरण: (i) बेंजीन + प्रोपिलीन → क्यूमीन
(C₆H₅-CH(CH₃)₂, एल्किलेशन); (ii) क्यूमीन + O₂ → क्यूमीन हाइड्रोपेरॉक्साइड (C₆H₅-C(CH₃)₂-O-OH); (iii)
H₂SO₄ के साथ अपघटन → फिनॉल + एसीटोन। फिनॉल एक एंटीसेप्टिक, कीटाणुनाशक (लाइसोल), कीटनाशक, रेजिन
(बैकेलाइट, एपॉक्सी, पॉलीकार्बोनेट, नाइलॉन), दवाएँ (एस्पिरिन), रंग (फिनॉल्फथेलिन), प्लास्टिक, सर्फेक्टेंट
बनाने में उपयोगी है। एसीटोन एक महत्वपूर्ण विलायक (नेल पॉलिश रिमूवर, पेंट थिनर) है।
- एल्कोहल (प्राथमिक एल्कोहल) सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) के
साथ 140°C पर गर्म करने पर ईथर (R-O-R, डाइएल्किल ईथर) बनाते हैं उदाहरण: 2C₂H₅OH (इथेनॉल) →
C₂H₅-O-C₂H₅ (डाइएथिल ईथर) + H₂O। यह एक अंतराण्विक उन्मूलन (इंटरमोलेक्युलर डिहाइड्रेशन) है। डाइएथिल ईथर
(सामान्य ईथर) एक अस्थिर, अत्यधिक ज्वलनशील द्रव है, जो अतीत में सामान्य एनेस्थेटिक के रूप में उपयोग होता
था। इसका उपयोग अब भी प्रयोगशाला विलायक के रूप में होता है।
- हाइड्रोकार्बन (एल्केन, एल्कीन) हैलोहाइड्रोकार्बन (एल्किल
हैलाइड) बनाते हैं, जो महत्वपूर्ण मध्यवर्ती एवु विलायक हैं एल्केन + Cl₂/Br₂ (UV) → एल्किल
क्लोराइड/ब्रोमाइड (मुक्त मूलक प्रतिस्थापन)। एल्कीन + HBr/HCl → एल्किल ब्रोमाइड/क्लोराइड (इलेक्ट्रोफिलिक
योग - मार्कोवनिकोव नियम)। हैलोहाइड्रोकार्बन का उपयोग प्लास्टिक (PVC, PTFE), रेफ्रिजरेंट (फ्रेऑन - अब
HCFC, HFC), विलायक (कार्बन टेट्राक्लोराइड, क्लोरोफॉर्म, डाइक्लोरोमेथेन), एरोसोल प्रणोदक (पुराने स्प्रे),
अग्निशामक (हैलोन - प्रतिबंधित), कीटनाशक (BHC, DDT - प्रतिबंधित), एनेस्थेटिक (क्लोरोफॉर्म - अप्रचलित,
हेलोथेन) में होता है।
- कार्बनिक रसायन में होमोलॉगस श्रृंखला (होमोलोगस सीरीज) यौगिकों
का एक समूह है, जिनमें समान क्रियात्मक समूह एवं -CH₂- (मिथिलीन) के अंतर से एक-दूसरे से संबंधित होते
हैं उदाहरण: एल्केन (CH₄, C₂H₆, C₃H₈...), एल्कोहल (CH₃OH, C₂H₅OH, C₃H₇OH...), एल्डिहाइड
(HCHO, CH₃CHO, C₂H₅CHO...), कार्बोक्सिलिक अम्ल (HCOOH, CH₃COOH, C₂H₅COOH...)। श्रृंखला के सदस्य समान
रासायनिक गुण प्रदर्शित करते हैं, लेकिन भौतिक गुण (गलनांक, क्वथनांक, घनत्व) कार्बन परमाणुओं की संख्या
बढ़ने के साथ क्रमिक रूप से बदलते हैं। यह अवधारणा कार्बनिक रसायन के अध्ययन को व्यवस्थित बनाती है।
- एल्केन (CₙH₂ₙ₊₂) का घनत्व (डेंसिटी) पानी (1 g/mL) से कम होता
है (लगभग 0.6-0.8 g/mL), इसलिए ये पानी पर तैरते हैं जैसे-जैसे कार्बन परमाणुओं की संख्या
बढ़ती है, घनत्व बढ़ता है, लेकिन हमेशा 1 g/mL से कम रहता है। उदाहरण: हेक्सेन (C₆H₁₄) का घनत्व 0.66 g/mL,
डोडेकेन (C₁₂H₂₆) का 0.75 g/mL, पैराफिन मोम (C₂₀-C₄₀) का 0.88-0.92 g/mL। यह कम घनत्व हाइड्रोकार्बन
(पेट्रोल, केरोसीन, डीजल) को पानी पर तैरने देता है, जो समुद्र में तेल रिसाव के दौरान एक बड़ी पर्यावरणीय
समस्या है।
- एल्कीन (जैसे एथिलीन, प्रोपिलीन, ब्यूटाडाइन) का उपयोग
प्लास्टिक एवं सिंथेटिक रबर (पॉलिमर) बनाने में होता है एथिलीन (C₂H₄) → पॉलिथीन (प्लास्टिक
बैग, बोतल, खिलौने); प्रोपिलीन (C₃H₆) → पॉलीप्रोपिलीन (PP - कार बम्पर, रस्सी, कंटेनर); ब्यूटाडाइन (C₄H₆)
+ स्टाइरीन (C₆H₅-CH=CH₂) → स्टाइरीन-ब्यूटाडाइन रबर (SBR - टायर, ट्यूब); ब्यूटाडाइन + एक्रिलोनाइट्राइल
(CH₂=CH-C≡N) → ब्यूटाडाइन-एक्रिलोनाइट्राइल रबर (नाइट्राइल रबर - तेल प्रतिरोधी होज़, सीलेंट); आइसोप्रीन
(C₅H₈) → प्राकृतिक रबर-जैसा पॉलीआइसोप्रीन (सिंथेटिक रबर)।
- एल्काइन (विशेष रूप से एसिटिलीन, C₂H₂) का उपयोग ऑक्सी-एसिटिलीन
गैस कटिंग (कटिंग) एवं वेल्डिंग (जोड़ने) में किया जाता है शुद्ध ऑक्सीजन के साथ जलाने पर यह
~3500°C (6,330°F) का ताप उत्पन्न करता है, जो अधिकांश धातुओं (स्टील, लोहा, एल्युमीनियम, कॉपर) को पिघलाने
के लिए पर्याप्त है। कटिंग: ऑक्सी-एसिटिलीन ज्वाला धातु को गर्म करती है, फिर उच्च दबाव ऑक्सीजन की धारा
धातु को ऑक्सीकृत (जला) कर हटा देती है। वेल्डिंग: पिघले हुए धातु में एसिटिलीन ज्वाला जोड़ती है, और ठंडा
होने पर दो टुकड़े जुड़ जाते हैं। इसका उपयोग अंडरवाटर वेल्डिंग, पाइपलाइन जोड़ने, मरम्मत, निर्माण,
ऑटोमोबाइल उद्योग, रेलवे, शिपबिल्डिंग, फाउंड्री में भी होता है।
- एल्कोहल (इथेनॉल, एथिलीन ग्लाइकॉल, प्रोपिलीन ग्लाइकॉल) का
उपयोग एंटीफ्रीज (ठंड से बचाने वाला) में किया जाता है शुद्ध जल 0°C पर जम जाता है, एल्कोहल
पानी में मिलाकर हिमांक बिन्दु (फ्रीज़िंग पॉइंट) को घटा देता है (हिमांक अवनमन, फ्रीज़िंग पॉइंट डिप्रेशन)।
एथिलीन ग्लाइकॉल (HO-CH₂-CH₂-OH) सबसे सामान्य ऑटोमोबाइल एंटीफ्रीज है; 50% v/v विलयन हिमांक को -37°C तक कम
कर देता है। प्रोपिलीन ग्लाइकॉल कम विषैला होता है, इसलिए इसका उपयोग खाद्य एवं दवा उद्योग (आइसक्रीम, मीट,
वाइन कूलिंग) में होता है। इथेनॉल का उपयोग कुछ ऐतिहासिक एंटीफ्रीज (विंडशील्ड वॉशर द्रव) में होता था।
- हाइड्रोकार्बन (जैसे बेंजीन, टॉल्यूनि, जाइलीन, अल्ट्रामरीन,
थायोइंडिगो, कार्बन ब्लैक) रंग (डाई) एवं रंजक (पिगमेंट) बनाने में उपयोग होते हैं बेंजीन से
एज़ो डाई (मिथाइल ऑरेंज, कांगो रेड, सुडान IV), ट्राइफिनाइलमीथेन डाई (मैलाकाइट ग्रीन, क्रिस्टल वायलेट),
एनिलिन (बैंगनी), नाइट्रो डाई (पिकरिक अम्ल - पीला), इंडिगो (नीला - जीन्स), एलिज़रीन (लाल), फ्लोरेसिन,
रोडामिन, थायोइंडिगो (लाल), फिनॉल्फथेलिन (pH संकेतक रंग), क्विनोलिन पीला, नेफ्थलीन रंग आदि बनते हैं। ये
रंग कपड़ा, चमड़ा, कागज, प्लास्टिक, स्याही, पेंट, सौंदर्य प्रसाधन, खाद्य (टार्ट्राज़िन - पीला, एरिथ्रोसिन
- लाल, इंडिगोटिन - नीला) आदि उद्योगों में उपयोग होते हैं।
- कार्बनिक यौगिक जैविक उत्पत्ति के होते हैं, अर्थात ये जीवित
(पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों) या विघटित जीवों (पेट्रोलियम, कोयला, प्राकृतिक गैस, लिग्नाइट, पीट) से
प्राप्त होते हैं पौधे प्रकाश संश्लेषण (CO₂ + H₂O → ग्लूकोज + O₂) द्वारा कार्बनिक यौगिक
बनाते हैं। जानवर पौधों को खाकर कार्बनिक यौगिक प्राप्त करते हैं। लाखों वर्षों के भूगर्भीय दबाव एवं ताप के
कारण मृत जीव पेट्रोलियम, कोयला, प्राकृतिक गैस में बदल गए। इसके विपरीत, अकार्बनिक यौगिक अजैविक उत्पत्ति
के होते हैं, जैसे खनिज, अयस्क, धातुएँ, अम्ल, क्षार, लवण, जल, अमोनिया, CO₂, कार्बोनेट, साइनाइड, ग्रेफाइट,
हीरा आदि।
- मेथेन (CH₄) से, अधूरे दहन (सीमित ऑक्सीजन) द्वारा कार्बन ब्लैक
(कार्बन ब्लैक) बनता है: CH₄ + O₂ (सीमित) → C (कालिख) + 2H₂O कार्बन ब्लैक एक महीन, काला
पाउडर है, जो 97-99% कार्बन होता है। इसका उपयोग रबर (टायरों में मजबूती एवं घिसाव प्रतिरोध के लिए भराव),
प्लास्टिक (रंग, यूवी प्रतिरोध), स्याही (प्रिंटिंग इंक, लेजर प्रिंटर टोनर, कॉपियर टोनर), पेंट, कोटिंग्स,
बैटरी इलेक्ट्रोड, कार्बन पेपर, ऑटोमोबाइल पुर्जे, मास्किंग टेप, चिपकने वाले पदार्थों में किया जाता है। यह
एक महत्वपूर्ण औद्योगिक काला रंजक (ब्लैक पिगमेंट) है।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) से, सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) के साथ
140°C पर गर्म करने से डाइएथिल ईथर (C₂H₅-O-C₂H₅, एथॉक्सीइथेन) बनता है डाइएथिल ईथर (सामान्य
ईथर) एक अत्यधिक अस्थिर, अत्यधिक ज्वलनशील द्रव है (क्वथनांक 34.6°C), जो प्रकाश एवु वायु में विस्फोटक
पेरॉक्साइड बना सकता है (इसलिए इसे BHT जैसे अवरोधक के साथ रखा जाता है)। इसका उपयोग कभी एक सामान्य
एनेस्थेटिक (संज्ञाहरण) के रूप में किया जाता था (अब यह उपयोग अप्रचलित है), और अब भी प्रयोगशाला में एक
महत्वपूर्ण गैर-ध्रुवीय विलायक (ग्रीस, तेल, वसा, रेजिन, प्राकृतिक उत्पादों के निष्कर्षण के लिए) है।
- बेंजीन (C₆H₆) से, एथिलीन (C₂H₄) के साथ एल्किलेशन
(फ्राइडल-क्राफ्ट्स एल्किलेशन) से एथिलबेंजीन (C₆H₅-CH₂CH₃) बनता है, जिसके डिहाइड्रोजनीकरण
(Dehydrogenation) से स्टाइरीन (C₆H₅-CH=CH₂) प्राप्त होता है स्टाइरीन एक मोनोमर है, जिसका
पॉलिमराइजेशन (फ्री रेडिकल या एनायनिक) होने पर पॉलीस्टाइरीन (पॉलीस्टाइरीन, PS) बनता है, जिसे थर्मोकोल
(थर्मोकोल, फोम) भी कहते हैं। पॉलीस्टाइरीन का उपयोग डिस्पोजेबल कप, प्लेट, कटलरी, खिलौने, पैकेजिंग फोम
पीनट (मूंगफली), इन्सुलेशन फोम बोर्ड (दीवार, छत), इलेक्ट्रॉनिक्स कैबिनेट, मॉडल किट्स, रूलर, बॉलपॉइंट पेन
बॉडी, योग मैट, हेलमेट लाइनर, रेफ्रिजरेटर शेल्फ, कूलर बॉक्स, सीडी/डीवीडी केस आदि में किया जाता है।
- एल्कोहल (प्राथमिक एल्कोहल) एसीटैल्डिहाइड (CH₃CHO) के साथ
हाइड्रोजन एवं एसिड क्लोराइड की उपस्थिति में एसीटल (एसिटल) बनाते हैं एसीटल सामान्यतः
(-O-CHR-O-) रचना के ईथर होते हैं। इनका उपयोग सुगंध एवं स्वाद (फ्लेवर एवं फ्रैगरेंस) उद्योग में फिक्सेटिव
(गंध बनाए रखने) और विलायक के रूप में होता है। पॉलीएसीटल (पॉलीऑक्सीमेथिलीन, POM) एक इंजीनियरिंग प्लास्टिक
है, जो फॉर्मल्डिहाइड के पॉलीमराइजेशन से बनता है, जिसका उपयोग गियर, बेयरिंग, जिपर, स्विच, टैंक, पाइप,
ऑटोमोबाइल पार्ट्स (ईंधन प्रणाली) में होता है।
- हाइड्रोकार्बन (एल्केन, एरोमैटिक्स) से नाइट्रेटिंग मिश्रण
(सान्द्र HNO₃ + सान्द्र H₂SO₄) के द्वारा नाइट्रो यौगिक (R-NO₂) बनते हैं उदाहरण: बेंजीन
(C₆H₆) → नाइट्रोबेंजीन (C₆H₅-NO₂); टॉल्यूनि (C₆H₅-CH₃) → ट्राइनाइट्रोटॉल्यूनि (TNT); फिनॉल → पिकरिक अम्ल
(2,4,6-ट्राइनाइट्रोफिनॉल)। नाइट्रो यौगिकों का उपयोग विस्फोटक (TNT, PETN, RDX, HMX, नाइट्रोग्लिसरीन,
नाइट्रोसेल्यूलोज), दवाएँ (क्लोरैम्फेनिकॉल - एंटीबायोटिक), रंग (एजो डाई, पिकरिक अम्ल - पीला रंग), विलायक
(नाइट्रोमेथेन), उर्वरक (अमोनियम नाइट्रेट, यूरिया के संश्लेषण में), रासायनिक मध्यवर्ती (एनिलिन,
हाइड्राज़ीन, हाइड्रॉक्सिलमाइन) के रूप में किया जाता है।
- कार्बनिक रसायन में स्टीरियोआइसोमरिज्म (रचना समान, परन्तु
अंतरिक्ष में परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न) होता है, जैसे एनैन्टिओमर (दर्पण प्रतिबिम्ब) एवं
डायस्टेरिओमर (गैर-दर्पण प्रतिबिम्ब) उदाहरण: लैक्टिक अम्ल (CH₃-CHOH-COOH) दो एनैन्टिओमरों
(D- और L-) में पाया जाता है। D-लैक्टिक अम्ल जीवाणु किण्वन से बनता है, जबकि L-लैक्टिक अम्ल मानव चयापचय
में बनता है। थैलिडोमाइड (एक कुख्यात दवा) का एक एनैन्टिओमर मॉर्निंग सिकनेस दूर करने वाला था, जबकि दूसरा
एनैन्टिओमर गंभीर जन्म दोष (फोकोमेलिया) का कारण बना। स्टीरियोआइसोमरिज्म एंजाइम (जैविक उत्प्रेरक) के लिए
अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि एंजाइम केवल एक विशिष्ट एनैन्टिओमर को ही पहचानते हैं।
- एल्केन (साइक्लोएल्केन) साइक्लोप्रोपेन (C₃H₆), साइक्लोब्यूटेन
(C₄H₈), साइक्लोपेंटेन (C₅H₁₀), साइक्लोहेक्सेन (C₆H₁₂) आदि बनाते हैं साइक्लोहेक्सेन (C₆H₁₂)
एक स्थिर षट्कोणीय वलय है जो दो कन्फर्मेशन (कुर्सी और नाव) में मौजूद होता है। साइक्लोप्रोपेन में कोणीय
प्रतिबल (60°) के कारण बहुत अधिक अभिक्रियाशील है, यह उच्च ताप पर खुलकर प्रोपिलीन (C₃H₆) बनाता है।
साइक्लोहेक्सेन का उपयोग नायलॉन-6,6 एवं एडिपिक अम्ल के उत्पादन में होता है।
- एल्कीन (जैसे एथिलीन, प्रोपिलीन) पॉलिओलेफिन (पॉलीथीन,
पॉलीप्रोपिलीन) बनाते हैं, जो सबसे अधिक मात्रा में उत्पादित किए जाने वाले प्लास्टिक हैं
एथिलीन (C₂H₄) का पॉलिमराइजेशन उच्च दबाव (1000-3000 atm) में निम्न-घनत्व पॉलीथीन (LDPE - कम घनत्व, लचीला,
फिल्म, बैग) देता है, जबकि ज़िग्लर-नाटा उत्प्रेरक (TiCl₄ + AlR₃) से उच्च-घनत्व पॉलीथीन (HDPE - कठोर, कप,
बोतल) बनता है। प्रोपिलीन (C₃H₆) → आइसोटैक्टिक पॉलीप्रोपिलीन (iPP, क्रिस्टलीय, मजबूत, गर्मी प्रतिरोधी)
बनाता है। ये पॉलिमर पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल, निर्माण, चिकित्सा उपकरण, खिलौने, कपड़ा (मोनोफिलामेंट), रस्सी,
पाइप, फर्नीचर, उपकरण, डिब्बे, कंटेनर, बैटरी केस, सीट बेल्ट, कार बम्पर आदि में उपयोग होते हैं।
- एल्काइन (विशेष रूप से एसिटिलीन, C₂H₂) पॉलिअसिटिलीन
(पॉलीएसिटिलीन) बनाता है, जो एक विद्युत-चालक पॉलिमर (कंडक्टिंग पॉलिमर) है पॉलिअसिटिलीन
(-CH=CH-)ₙ एक असंतृप्त पॉलिमर है, जिसे डोपिंग (I₂, AsF₅) करने पर धातु के समान विद्युत चालकता (10⁴ S/cm)
प्राप्त हो जाती है। इस खोज ने 2000 में हीगर, मैकडायरमिड, शिरकावा को रसायन का नोबेल पुरस्कार दिलाया।
पॉलिअसिटिलीन कम स्थिरता के कारण व्यावहारिक रूप से सीमित उपयोग में है, लेकिन इसने कंडक्टिंग पॉलिमर
(पॉलीएनिलिन, पॉलीपाइरोल, PEDOT, पॉलीथायोफीन) के क्षेत्र को जन्म दिया, जिनका उपयोग ऑर्गेनिक एलईडी (OLED),
सुपरकैपेसिटर, बैटरी, संवेदक (सेंसर), कोरोसिन प्रतिरोधी कोटिंग्स, एंटीस्टैटिक पैकेजिंग, फ्लेक्सिबल
डिस्प्ले, स्मार्ट विंडो, इलेक्ट्रोक्रोमिक डिवाइस में किया जाता है।
- एल्कोहल (द्वितीयक एल्कोहल, 2°) के ऑक्सीकरण से कीटोन (C=O)
बनते हैं, न कि एल्डिहाइड उदाहरण: प्रोपेन-2-ऑल (आइसोप्रोपिल एल्कोहल, CH₃-CHOH-CH₃) →
प्रोपेनोन (एसीटोन, CH₃-CO-CH₃)। कीटोन कार्बोक्सिलिक अम्ल में आगे ऑक्सीकरण नहीं होते, क्योंकि C=O के साथ
कोई H नहीं होता। एसीटोन एक महत्वपूर्ण विलायक (नेल पॉलिश रिमूवर, पेंट थिनर, प्लास्टिक सीमेंट, फाइबरग्लास
राल, सुपरग्लू रिमूवर) है।
- हाइड्रोकार्बन से अमीन (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) बनते हैं -
जो नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक यौगिक हैं अमीन बनाने के मार्ग: (i) हैलोहाइड्रोकार्बन (R-X) +
NH₃ (अमोनिया) → R-NH₂ (प्राथमिक अमीन) + HX; (ii) नाइट्रो यौगिकों (R-NO₂) का H₂/Pd या Sn/HCl के साथ
अपचयन; (iii) एल्डिहाइड/कीटोन + NH₃ + H₂ (निर्माणी अपचयन - रिडक्टिव अमीनेशन)। अमीन का उपयोग दवाएँ
(एम्फ़ेटामिन, एंटीहिस्टामाइन, सल्फा दवाएँ), रंग (एज़ो डाई, मेथिलीन ब्लू), पॉलिमर (नायलॉन-6,6,
यूरिया-फॉर्मल्डिहाइड रेजिन), विस्फोटक (RDX, HMX), विलायक (एथेनॉलमाइन), कीटनाशक, इपोक्सी क्योरिंग एजेंट
(उपचारक), गैस शोधन (अमीन गैस ट्रीटमेंट - H₂S/CO₂ हटाना), औद्योगिक क्लीनर, कॉस्मेटिक्स में होता है।
- कार्बनिक यौगिकों (जैसे कीटनाशक, उर्वरक, विकास नियामक,
फेरोमोन, बीज उपचार) का उपयोग कृषि (एग्रीकल्चर) में फसल उत्पादन बढ़ाने, कीटों एवं रोगों को नियंत्रित
करने, खरपतवारों को हटाने, एवं शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए किया जाता है कीटनाशक (पेस्टीसाइड) -
कीटनाशक (इन्सेक्टिसाइड, जैसे क्लोरपाइरीफोस, डेल्टामेथ्रिन), कवकनाशक (फफूंदनाशक, जैसे मैन्कोज़ेब,
टेबुकोनाज़ोल), खरपतवारनाशक (हर्बीसाइड, जैसे ग्लाइफोसेट, एट्राज़ीन, 2,4-D); उर्वरक (फर्टिलाइज़र) - यूरिया
(कार्बनिक), DAP, MOP; विकास नियामक (प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर) - जिब्बरेलिक अम्ल, एथिलीन (फल पकाना), ऑक्सिन,
साइटोकाइनिन; फेरोमोन (कीट यौन आकर्षक)। इनके अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक
प्रभाव हो सकते हैं।
- मेथेन (CH₄) का उपयोग रासायनिक वाष्प जमाव (सीवीडी) प्रक्रम के
माध्यम से सिंथेटिक डायमंड बनाने में होता है मीथेन को उच्च ताप (800-1000°C) पर हाइड्रोजन के
साथ ग्राफाइट सब्सट्रेट पर प्रवाहित किया जाता है, जहाँ यह विघटित होकर डायमंड (डायमंड) फिल्म (पतली परत)
जमा करता है (CVD डायमंड)। सिंथेटिक डायमंड का उपयोग काटने के औजार (ड्रिल बिट, आरी ब्लेड), घिसाई प्रतिरोधी
कोटिंग्स, ऑप्टिकल विंडो, हीट सिंक, स्पीकर डायाफ्राम, क्वांटम कंप्यूटिंग, एवं आभूषणों में किया जाता है।
प्राकृतिक डायमंड की तुलना में CVD डायमंड सस्ता एवं अधिक शुद्ध होता है।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) का उपयोग आंतरिक दहन इंजन (पेट्रोल इंजन) में
ऑक्टेन बूस्टर एवं अंतर्दहन ईंधन के रूप में किया जाता है इथेनॉल में उच्च ऑक्टेन संख्या
(~108) होती है, जो इंजन में नॉकिंग (खटखटाहट) कम करती है। E10 (पेट्रोल में 10% इथेनॉल) सबसे सामान्य
गैसोहोल है। E85 (85% इथेनॉल, 15% पेट्रोल) फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFV) में प्रयुक्त होता है। इथेनॉल के
उपयोग से CO, HC, NOₓ उत्सर्जन कम होता है, लेकिन एल्डिहाइड (एसीटैल्डिहाइड) उत्सर्जन बढ़ सकता है। ब्राज़ील
में E100 (शुद्ध इथेनॉल) भी उपयोग होता है।
- बेंजीन (C₆H₆) का उपयोग रबर (सिंथेटिक रबर -
स्टाइरीन-ब्यूटाडाइन रबर, SBR; नाइट्राइल रबर, NBR; ब्यूटाइल रबर, IIR; नियोप्रीन, CR) बनाने में मोनोमर
(स्टाइरीन, एनिलिन, क्लोरोप्रीन, आइसोब्यूटिलीन) के अग्रदूत के रूप में होता है SBR (स्टाइरीन
+ ब्यूटाडाइन) सबसे अधिक उत्पादित सिंथेटिक रबर है, जिसका उपयोग टायर, ट्यूब, फुटवियर सोल, कन्वेयर बेल्ट,
गैस्केट, होज़, केबल इन्सुलेशन, चिपकने वाले पदार्थ, सीलेंट में किया जाता है। नाइट्राइल रबर
(एक्रिलोनाइट्राइल + ब्यूटाडाइन) तेल प्रतिरोधी है, जिसका उपयोग ऑटोमोबाइल में ईंधन होज़, सील, गैस्केट,
ईंधन पंप डायाफ्राम में किया जाता है। बेंजीन के बिना अधिकांश सिंथेटिक रबर का संश्लेषण संभव नहीं है।
- एल्कोहल (इथेनॉल, आइसोप्रोपेनॉल) का उपयोग शल्य चिकित्सा
(सर्जरी) में एक एंटीसेप्टिक (त्वचा साफ करने, घाव धोने, इंजेक्शन से पहले कीटाणुरहित करने) और एक सतही
कीटाणुनाशक के रूप में किया जाता है 70% v/v इथेनॉल या 60-90% आइसोप्रोपेनॉल (रगड़ना अल्कोहल)
अधिकांश बैक्टीरिया (स्टैफ, स्ट्रेप, ई. कोली), एनवेलप्ड वायरस (फ्लू, कोरोना, हर्पीस, एचआईवी, हेपेटाइटिस
बी, सी, ईबोला), कवक और प्रोटोजोआ को कुछ ही सेकंड में मार देता है। ये एल्कोहल सेल झिल्ली को विघटित (लीपिड
विघटन) करते हैं और प्रोटीन को विकृत (डिनेचर) करते हैं। यह सर्जिकल टूल्स (डोनबीच किया गया) के लिए
स्टेरिलाइज़र के रूप में भी प्रयोग होता है।
- हाइड्रोकार्बन (फोमयुक्त प्लास्टिक - पॉलीस्टाइरीन फोम,
पॉलीयूरेथेन फोम, फिनोलिक फोम) का उपयोग थर्मल इंसुलेशन (ऊष्मा रोधक) एवं ध्वनि इंसुलेशन (ध्वनि रोधक)
में किया जाता है फोम में बड़ी संख्या में गैस से भरे कोशिकाएँ होती हैं, जो ऊष्मा के संवहन
(संवहन) को रोकती हैं। पॉलीस्टाइरीन (एक्सपांडेड पॉलीस्टाइरीन, ईपीएस - थर्मोकोल, बेड़ा, पैकेजिंग,
इन्सुलेशन बोर्ड), एक्सट्रूडेड पॉलीस्टाइरीन (एक्सपीएस) का उपयोग दीवारों, छतों, फर्शों, नींवों, पाइपों,
शीत भंडारण कक्षों, रेफ्रिजरेटर, ट्रक ट्रेलरों, बिल्डिंग इन्सुलेशन (हरित भवन) में किया जाता है।
पॉलीयूरेथेन फोम फर्नीचर, कुशन, स्पंज, पेंट, कोटिंग्स, एडहेसिव, सीलेंट, इन्सुलेशन फोम (स्प्रे फोम) में
होता है।
- कार्बनिक रसायन पर्यावरण (पर्यावरण) से संबंधित है, क्योंकि
अनेक कार्बनिक प्रदूषक (हाइड्रोकार्बन, कीटनाशक, डाइऑक्सिन, पीसीबी, पीएएच, वीओसी) पारिस्थितिकी तंत्र,
जलवायु, मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं हाइड्रोकार्बन (पेट्रोल, डीजल) अधूरे दहन से
CO, NOₓ, SO₂, कालिख (PM2.5), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी) उत्सर्जित करते हैं, जो स्मॉग, अम्ल वर्षा,
ग्रीनहाउस प्रभाव (CO₂, CH₄, N₂O), ओजोन क्षय (CFC), जल एवं मृदा प्रदूषण (तेल रिसाव), जैव आवर्धन (डीडीटी,
मिथाइल पारा) का कारण बनते हैं। हरित रसायन (ग्रीन केमिस्ट्री) के 12 सिद्धांत पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित,
नवीकरणीय, बायोडिग्रेडेबल, और अधिक कुशल कार्बनिक संश्लेषण विधियों पर बल देते हैं।
- एल्केन (उच्च-आणविक भार, C₂₀-C₄₀) का उपयोग मोम (पैराफिन मोम)
बनाने में किया जाता है, जिसका उपयोग मोमबत्ती, मोम पेपर, कॉस्मेटिक्स (लिप बाम, क्रीम, लोशन), पॉलिश
(शू पॉलिश, फर्नीचर पॉलिश, फ्लोर पॉलिश), कोटिंग्स (पेपर, कार्डबोर्ड, चीज़, फल), चिपकने वाले पदार्थ,
सीलेंट, इन्सुलेशन (विद्युत), केबल फिलर, पैराफिन थेरेपी (त्वचा उपचार), एवं प्लास्टिक स्नेहक में होता
है पैराफिन मोम पेट्रोलियम (कच्चा तेल) के प्रभाजी आसवन से प्राप्त होता है, यह एक रंगहीन,
गंधहीन, स्वादहीन, अक्रिय, ठोस पदार्थ है जो 37°C से 70°C के बीच पिघलता है।
- एल्कीन (एथिलीन, C₂H₄) का उपयोग फलों को पकाने (फल पकाने) के
लिए एक पादप हार्मोन (प्लांट हार्मोन) के रूप में किया जाता है एथिलीन एक गैसीय पादप हार्मोन
है जो फलों के पकने (रंग बदलना, नरम होना, मीठा होना) को तेज करता है। व्यावसायिक रूप से, केले, सेब, टमाटर,
एवोकाडो, नाशपाती, खरबूजे, आम, जामुन, कीवी, प्लम, आड़ू, नीबू, अनानास, अमरूद, पपीता, आदि को उनके गोदामों
में कृत्रिम रूप से एथिलीन गैस (100-150 ppm) देकर पकाया जाता है। इससे फलों की शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है एवं
परिवहन के दौरान खराब होने से बचते हैं। एथिलीन एब्सिसिक (पत्ती/फल गिराने), पुष्पन, अंकुरण, और वृद्धि को
भी नियंत्रित करता है।
- एल्काइन (एसिटिलीन, C₂H₂) का उपयोग कार्बाइड लैंप (केप लैंप,
खनन लैंप) में प्रकाश स्रोत के रूप में किया जाता था, जो 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में एक
महत्वपूर्ण प्रकाश तकनीक थी कैल्शियम कार्बाइड (CaC₂) पर जल टपकाने से एसिटिलीन गैस बनती है:
CaC₂ + 2H₂O → C₂H₂ + Ca(OH)₂। एसिटिलीन को एक जेट से बाहर निकालकर जलाया जाता था, जो एक चमकीली पीली ज्वाला
उत्पन्न करती थी। इन लैंपों का उपयोग 1900-1920 के दशक में खनिकों (हेडलैंप), साइकिल (बाइक लैंप), ऑटोमोबाइल
(हेडलाइट्स - 1904 तक), लाइटहाउस, सड़कों (स्ट्रीट लाइटिंग) और ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता था, जब तक
कि विद्युत प्रकाश व्यवस्था ने इसे प्रतिस्थापित नहीं कर दिया। अब भी कुछ स्पेलोलॉजी (गुफा अन्वेषण) लैंप,
कैम्पिंग लैंप, पुरानी कारों में उपयोग होते हैं।
- एल्कोहल (मेथेनॉल, CH₃OH) का उपयोग कभी-कभी थर्मामीटर
(थर्मामीटर) में पारा (Hg) के स्थान पर किया जाता है, क्योंकि मेथेनॉल कम विषैला होता है (पारा की तुलना
में) मेथेनॉल थर्मामीटर का परास -97°C से 65°C तक होता है। इथेनॉल थर्मामीटर -115°C से 78°C तक
काम करता है। एल्कोहल थर्मामीटर पारा थर्मामीटर की तुलना में कम सटीक (नॉन-लीनियर स्केल, छोटा परास) होते
हैं, लेकिन ये गैर-विषैले होते हैं। लाल एल्कोहल थर्मामीटर में डाई मिली होती है। पारा थर्मामीटर उच्च ताप
(356°C तक) के लिए उपयुक्त होते हैं।
- हाइड्रोकार्बन (पॉलिएस्टर, नायलॉन, एक्रिलिक, पॉलीप्रोपिलीन,
स्पैन्डेक्स) कृत्रिम फाइबर (सिंथेटिक फाइबर) बनाने के लिए मोनोमर होते हैं पॉलिएस्टर (पीईटी -
पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट) - कपड़े (शर्ट, पैंट, साड़ी), बोतल, फिल्म; नायलॉन (नायलॉन-6,6, नायलॉन-6) - मोजे,
टायर कॉर्ड, पैराशूट, दांत का ब्रश; एक्रिलिक - स्वेटर, कंबल, विग; पॉलीप्रोपिलीन (पीपी) - असबाब, कालीन,
रस्सी, डायपर; स्पैन्डेक्स (इलास्टेन) - लोचदार कपड़े (स्पोर्ट्सवियर, अंडरगारमेंट)। ये फाइबर टिकाऊ, मजबूत,
हल्के, सिकुड़न प्रतिरोधी, शिकन प्रतिरोधी, कीट प्रतिरोधी, और अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं, लेकिन प्राकृतिक
फाइबर (कपास, ऊन) की तुलना में कम सांस लेने योग्य होते हैं।
- कार्बनिक यौगिकों (हाइड्रोकार्बन, एल्कोहल, बायोडीजल, मेथेनॉल,
एथेनॉल, ब्यूटेनॉल) का उपयोग ऊर्जा स्रोत (ईंधन) के रूप में किया जाता है, जो जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल,
डीजल, केरोसीन, LPG, CNG) और नवीकरणीय ईंधन (बायोएथेनॉल, बायोडीजल, बायोगैस, जैव-ब्यूटेनॉल, मेथेनॉल)
दोनों को शामिल करता है ये ईंधन ऑक्सीजन के साथ दहन अभिक्रिया (पूर्ण दहन → CO₂ + H₂O + ऊर्जा)
द्वारा ऊष्मा, यांत्रिक ऊर्जा (इंजन), या विद्युत ऊर्जा (ईंधन सेल) प्रदान करते हैं। दुनिया की लगभग 80%
ऊर्जा (परिवहन, बिजली, हीटिंग, उद्योग) जीवाश्म ईंधन (कार्बनिक यौगिक) से प्राप्त होती है। जैविक ईंधन
(कार्बन-तटस्थ) जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए विकसित किए
जा रहे हैं।
- मेथेन (CH₄) का उपयोग ईंधन सेल (फ्यूल सेल) में हाइड्रोजन के
विकल्प के रूप में किया जा सकता है, हालाँकि यह प्रत्यक्ष मेथेन ईंधन सेल में सीधे ऑक्सीकृत होता है:
CH₄ + 2O₂ → CO₂ + 2H₂O + विद्युत मेथेन ठोस ऑक्साइड ईंधन सेल (SOFC) में 1000°C पर प्रयुक्त
होता है। इसका लाभ यह है कि मेथेन (प्राकृतिक गैस) में हाइड्रोजन की तुलना में उच्च ऊर्जा घनत्व, आसान
भंडारण एवं परिवहन होता है। हालाँकि, उच्च ताप पर संचालन, उत्प्रेरक विषाक्तता (सल्फर, क्लोरीन) और CO₂
उत्सर्जन (हालाँकि यह कुशल है) चुनौतियाँ हैं। स्टीम रिफॉर्मिंग द्वारा मीथेन से H₂ बनाकर प्रोटॉन एक्सचेंज
मेम्ब्रेन (PEM) ईंधन सेल में प्रयोग अधिक सामान्य है।
- इथेनॉल (C₂H₅OH) का उपयोग जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के रूप में किया
जाता है, विशेष रूप से ब्राज़ील और संयुक्त राज्य अमेरिका में, जहाँ इसे मक्का (यूएस) और गन्ना
(ब्राज़ील) से किण्वन द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जाता है ब्राज़ील के वाहन
फ्लेक्स-फ्यूल इंजन में E20 से E100 (शुद्ध इथेनॉल) का उपयोग करते हैं, जो 1970 के दशक के तेल संकट के बाद
शुरू हुआ था। यूएस में E10 सबसे सामान्य है। भारत सरकार E20 लक्ष्य (20% एथेनॉल मिश्रण) 2025 तक प्राप्त
करने का प्रयास कर रहा है, जिसके लिए चीनी उद्योग के सह-उत्पाद (गुड़, बायोमास) से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाया जा
रहा है। एथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल की खपत, आयात लागत, वायु प्रदूषण (CO, HC) में कमी आती है।
- बेंजीन (C₆H₆) का उपयोग डाई (डाई) उद्योग में रंग बनाने के लिए
व्यापक रूप से किया जाता है बेंजीन से एनिलिन (C₆H₅-NH₂) बनता है (नाइट्रोबेंजीन के अपचयन से),
एनिलिन से एज़ो डाई (NH₂-C₆H₅-N=N-C₆H₅-COOH, कांगो रेड, मिथाइल ऑरेंज, बिस्मार्क ब्राउन, ट्राइफिनाइलमीथेन
डाई (मैलाकाइट ग्रीन, क्रिस्टल वायलेट, ब्रिलियंट ग्रीन), इंडिगो (C₁₆H₁₀N₂O₂, नीला - जीन्स), एलिज़रीन (लाल
- मुंडू, फेजली), नाइट्रो डाई (पिकरिक अम्ल, नेफ्थॉल येलो), एनिलिन बैंगनी (पहला सिंथेटिक डाई, 1856, विलियम
पर्किन), मैजेंटा (लाल), मिथाइलीन ब्लू, थायोइंडिगो (लाल), फ्लोरेसिन (पीला-हरा प्रतिदीप्ति) आदि। ये रंग
कपड़ा, चमड़ा, कागज, प्रिंटिंग स्याही, प्लास्टिक, स्नेहक, भोजन, सौंदर्य प्रसाधन, फोटोग्राफी, मार्कर,
हाईलाइटर, कलम स्याही, लिपस्टिक, शैम्पू, साबुन में उपयोग होते हैं।
- एल्कोहल (इथेनॉल) का उपयोग एनेस्थीसिया (एनेस्थीसिया) के लिए
किया जाता था (सर्जरी के दौरान चेतना नष्ट करने), हालाँकि अब इसका उपयोग आधुनिक एनेस्थेटिक्स
(प्रोपोफोल, सेवोफ्लुरेन) के कारण बहुत कम हो गया है ऐतिहासिक रूप से, इथेनॉल (एनेस्थेटिक एथर
और क्लोरोफॉर्म से पहले) एक कमजोर एनेस्थेटिक के रूप में प्रयोग किया जाता था, लेकिन इसकी संकीर्ण चिकित्सीय
सीमा (नशा और अतिमात्रा से श्वसन अवसाद, मृत्यु), और लंबी क्रिया अवधि, अनियंत्रित गहराई, तथा त्वचा/श्वसन
पथ में जलन के कारण इसे छोड़ दिया गया। वर्तमान में, इथेनॉल का उपयोग केवल स्थानीय या त्वचीय एनेस्थीसिया के
लिए कभी-कभी इंजेक्शन (नर्व ब्लॉक) में, या सतही एनेस्थेटिक्स (लिडोकेन) के विलायक के रूप में किया जाता है।
यह अभी भी एक सामान्य एंटीसेप्टिक (हैंड सैनिटाइज़र) है।
- हाइड्रोकार्बन (जैसे सोडियम डोडेसिल सल्फेट - SDS, सोडियम
डोडेसिल बेंजीन सल्फोनेट - SDBS, एल्कोहल एथोक्सिलेट्स, एल्किल पॉलीग्लूकोसाइड्स) का उपयोग सर्फेक्टेंट
(पृष्ठ सक्रिय कारक) के रूप में डिटर्जेंट, साबुन, शैम्पू, फोमिंग एजेंट, इमल्सीफायर, वेटिंग एजेंट,
डिस्परसेंट, सॉल्युबिलाइजर में किया जाता है सर्फेक्टेंट में एक हाइड्रोफिलिक (जल-प्रेमी) सिर
(उदाहरण: -SO₃⁻, -OSO₃⁻, -COO⁻, -OH, -O- (PO₄)₂⁻) और एक हाइड्रोफोबिक (जल-विरोधी) पूंछ (लंबी एल्किल
श्रृंखला, C₁₂-C₁₈) होती है। यह पानी और तेल दोनों के साथ अंतःक्रिया करता है, जिससे गंदगी (ग्रीस, तेल) के
कण घिर जाते हैं (मिसेल बनते हैं) और पानी में बह जाते हैं। सर्फेक्टेंट का उपयोग घरेलू क्लीनर, औद्योगिक
डिटर्जेंट, फोम फायर फाइटिंग, एग्रीकल्चर (स्प्रे), पेंट, कोटिंग, चिपकने वाले पदार्थ, कॉस्मेटिक्स, शैम्पू,
कंडीशनर, लोशन, टूथपेस्ट, ड्रिलिंग मड, तेल रिकवरी में किया जाता है।
- कार्बनिक रसायन नैनोटेक्नोलॉजी (नैनोटेक्नोलॉजी) से जुड़ा है,
क्योंकि कार्बन नैनोट्यूब (सीएनटी), ग्राफीन, फुलरीन (C₆₀), डेंड्रिमर, कार्बन डॉट्स, पॉलिमर
नैनोकम्पोजिट्स, MOFs (धातु-कार्बनिक ढांचे), सुपरमॉलिक्यूलर ऐसेंबली आदि कार्बनिक या कार्बन-आधारित
नैनोमटेरियल हैं ग्राफीन (कार्बन की एक-परमाणु मोटी परत) अत्यधिक मजबूत, चालक, पारदर्शी है;
इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, बैटरी, कम्पोजिट में होता है। कार्बन नैनोट्यूब (सीएनटी) - बेलनाकार
ग्राफीन शीट - अति मजबूत (स्टील से 100x), चालक; उपयोग - ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस, खेल उपकरण, ईंधन सेल,
लिथियम-आयन बैटरी एनोड, सुपरकैपेसिटर, ड्रग डिलीवरी, बायोसेंसर, स्पेस लिफ्ट केबल (काल्पनिक)। फुलरीन (C₆₀)
- सॉकर बॉल के आकार का गोला; उपयोग - स्नेहक, एंटीऑक्सीडेंट, दवा वितरण, इलेक्ट्रॉनिक्स। MOFs - अत्यधिक
छिद्रयुक्त संरचनाएँ; उपयोग - गैस भंडारण (H₂, CH₄, CO₂), उत्प्रेरक, दवा वितरण, संवेदक।