जीव विज्ञान की उपशाखाएँ
- एग्रोस्टोलॉजी (Agrostology) घासों (Poaceae परिवार) का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें उनकी प्रजातियों की पहचान, वर्गीकरण, आनुवंशिकी और कृषि में उपयोग (चारागाह, लॉन, अनाज - गेहूं, चावल, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा, गन्ना, बांस) शामिल हैं। यह चारा फसलों के प्रबंधन और घास के मैदानों के पारिस्थितिकी अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। यह कृषि विज्ञान (एग्रोनॉमी) की एक महत्वपूर्ण शाखा है।
- एंथोलॉजी (Anthology) फूलों की संरचना (पुष्प भागों - बाह्यदल, दलपुंज, पुंकेसर, स्त्रीकेसर), वर्गीकरण (पुष्पक्रम के प्रकार - गुच्छक, शीर्षस्थ, मंजरी), विकास और सजावटी उपयोग का अध्ययन करने वाली वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) की शाखा है। यह फूलों की आकृति विज्ञान (फ्लोरल मॉर्फोलॉजी) और परागण जीवविज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका व्यावहारिक उपयोग पुष्प सज्जा (फ्लोरिकल्चर), फूलों की खेती और बागवानी में होता है।
- एपीकल्चर (Apiculture) मधुमक्खी पालन का विज्ञान और कला है, जिसमें मधुमक्खियों (एपिस सेराना, एपिस मेलिफेरा, एपिस डोरसेटा, एपिस फ्लोरिया) का पालन शहद, मोम, पराग, रॉयल जेली, प्रोपोलिस और मधुमक्खी विष के उत्पादन के लिए किया जाता है। यह फसलों के परागण में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे कृषि उत्पादन (फल, सब्जियाँ, बीज) बढ़ता है। मधुमक्खियों के व्यवहार, रोग नियंत्रण और छत्ते के प्रबंधन का अध्ययन भी एपीकल्चर के अंतर्गत आता है।
- बैक्टीरियोलॉजी (Bacteriology) जीवाणुओं (प्रोकैरियोटिक सूक्ष्मजीव) का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें उनकी संरचना (कोशिका भित्ति, झिल्ली, राइबोसोम, प्लास्मिड), वर्गीकरण (ग्राम पॉजिटिव, ग्राम नेगेटिव, आकार - गोल, छड़, सर्पिल), चयापचय, आनुवंशिकी और पारिस्थितिकी में भूमिका शामिल है। यह मानव, पशु और पादप रोगों (क्षय रोग, टाइफाइड, निमोनिया, एंथ्रेक्स, प्लेग, हैजा) के अध्ययन और निदान के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, जीवाणुओं का उपयोग जैव प्रौद्योगिकी (प्रतिजैविक उत्पादन, जैव उर्वरक, जैव निम्नीकरण, दही, पनीर) में भी किया जाता है।
- बायोनिक्स (Bionics) जैविक प्रणालियों की संरचना, कार्यप्रणाली और अनुकूलन (जैसे पक्षियों का उड़ान, चमगादड़ की इकोलोकेशन, गेको का चिपकना, मछलियों का तैरना, ऑक्टोपस का सक्शन, मानव मस्तिष्क की न्यूरल नेटवर्क) का अध्ययन करके उन्हें इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी में लागू करना है। इसका लक्ष्य कुशल मशीनें, रोबोट, सेंसर, कृत्रिम अंग, स्मार्ट सामग्री और उन्नत प्रणालियाँ (जैसे सोनार, रडार, वेल्क्रो, हवाई जहाज, रडार एंटेना, कृत्रिम त्वचा, स्व-उपचार सामग्री) डिजाइन करना है। यह जीव विज्ञान और इंजीनियरिंग का एक अंतःविषयी (इंटरडिसिप्लिनरी) क्षेत्र है।
- बायोनोमिक्स / बायोनोमी (Bionomics / Bionomy) जीवों (व्यक्ति, प्रजाति, समुदाय) और उनके पर्यावरण (जलवायु, मृदा, अन्य जीव) के बीच अंतर्संबंधों, जीवन नियमों, अनुकूलन (प्रजनन, आहार, आवास, प्रवास, शीतनिद्रा, सहजीवन, परजीवीवाद), और पारिस्थितिकीय नियमों (जनसंख्या गतिशीलता, खाद्य श्रृंखला, ऊर्जा प्रवाह, पोषक चक्र) का अध्ययन है। यह पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) का एक पर्याय है, जो जीवों के प्राकृतिक इतिहास और पर्यावरण के साथ उनके तंत्र को समझने पर केंद्रित है। इसका उपयोग प्रजातियों के संरक्षण, कीट प्रबंधन और पारिस्थितिकीय मॉडलिंग में किया जाता है।
- बायोमीट्री (Biometry) जैविक आंकड़ों (जैसे जनसंख्या भिन्नता, वृद्धि दर, रोग प्रसार, प्रजनन क्षमता, आनुवंशिक विविधता, पारिस्थितिकीय सर्वेक्षण) के विश्लेषण के लिए गणितीय (कलन, बीजगणित) और सांख्यिकीय (प्रतिगमन, सहसंबंध, प्रसरण, अवकल समीकरण) तकनीकों का उपयोग है। यह जैविक प्रयोगों के डिजाइन, डेटा संग्रह, व्याख्या और पूर्वानुमान में मदद करता है, जिससे वैज्ञानिक निष्कर्षों को मात्रात्मक रूप से सत्यापित किया जा सकता है। बायोमीट्री जनसंख्या आनुवंशिकी, महामारी विज्ञान, कृषि अनुसंधान और संरक्षण जीवविज्ञान में एक अनिवार्य उपकरण है।
- बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) जीवों (सूक्ष्मजीवों, पादपों, जंतुओं) या उनके घटकों (एंजाइम, जीन, कोशिकाएँ) का उपयोग करके उपयोगी उत्पाद (प्रतिजैविक, वैक्सीन, हार्मोन, एंजाइम, जैव ईंधन, जैव प्लास्टिक), प्रक्रियाएँ (किण्वन, जैव उपचार, जैव खनन, अपशिष्ट उपचार) और सेवाएँ (जीन थेरेपी, आनुवंशिक परीक्षण) बनाने का विज्ञान है। इसमें आनुवंशिक अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) द्वारा जीवों के डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) में संशोधन कर ट्रांसजेनिक फसलें (जीएम फसलें - बीटी कपास, गोल्डन राइस, हर्बिसाइड-प्रतिरोधी सोयाबीन), क्लोनिंग, और जीन थेरेपी शामिल हैं। इसके अनुप्रयोग चिकित्सा (दवाएँ, वैक्सीन), कृषि (जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक), उद्योग (बायोरिएक्टर) और पर्यावरण (जैव निम्नीकरण, बायोमाइनिंग) में होते हैं।
- बॉटनी / वनस्पति विज्ञान (Botany) पादपों (पौधों) का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें उनकी संरचना (शरीररचना, आकृति विज्ञान), वृद्धि (प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, पोषण), प्रजनन (पुष्पन, परागण, बीज निर्माण), चयापचय (प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, वाष्पोत्सर्जन), विकास (पादप विकास का इतिहास), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी - परिवार, जाति, प्रजाति), पारिस्थितिकी और आर्थिक महत्व (खाद्य पदार्थ, लकड़ी, दवाएँ, रेशे, रबर, तेल, मसाले) शामिल हैं। यह जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी) का पादप-समकक्ष है और इसमें शैवाल (अल्गी), कवक (फंजाई), लाइकेन, ब्रायोफाइट्स (मॉस, लिवरवॉर्ट्स), टेरिडोफाइट्स (फर्न), जिम्नोस्पर्म (कोनिफर) और एंजियोस्पर्म (फूल वाले पौधे) सभी शामिल हैं। वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र कृषि, बागवानी, वानिकी, फार्मेसी और पारिस्थितिकी के लिए मौलिक हैं।
- डेमोग्राफी / जनांकिकी (Demography) मानव जनसंख्या का सांख्यिकीय (स्टैटिस्टिकल) अध्ययन है, जिसमें जनसंख्या का आकार, घनत्व, वितरण, संरचना (आयु, लिंग, जातीयता, शैक्षिक स्तर, आय), जन्म दर (नेटिविटी), मृत्यु दर (मोर्टेलिटी), विवाह दर (न्यूप्टियलिटी), प्रवास (इमिग्रेशन, एमिग्रेशन), जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी), प्रजनन दर (फर्टिलिटी) और सामाजिक-आर्थिक रुझान (शिक्षा, रोजगार, आय) शामिल हैं। यह जनसंख्या परिवर्तन के कारणों (युद्ध, महामारी, अकाल, आर्थिक नीतियाँ) और परिणामों (संसाधनों की कमी, शहरीकरण, वृद्धावस्था) का विश्लेषण करता है, जो सरकारी नीति (स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंशन, आवास, परिवार नियोजन), शहरी योजना और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
- इकोलॉजी / पारिस्थितिकी (Ecology) जीवों (व्यक्ति, जनसंख्या, समुदाय, पारिस्थितिकी तंत्र) और उनके पर्यावरण (अजैविक - जल, वायु, मृदा, तापमान, प्रकाश, पीएच; जैविक - अन्य जीव) के बीच अंतर्संबंधों, ऊर्जा प्रवाह (सौर ऊर्जा से रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण), पोषक तत्वों के चक्र (कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, जल चक्र, फॉस्फोरस चक्र) और पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता (उत्तराधिकार, जैव विविधता, स्थिरता) का अध्ययन है। यह समझने में मदद करता है कि जीव अपने पर्यावरण के प्रति कैसे अनुकूलित होते हैं, आबादी कैसे बढ़ती और नियंत्रित होती है, समुदाय कैसे संरचित होते हैं, और पारितंत्र कैसे कार्य करता है। पारिस्थितिकी संरक्षण जीवविज्ञान, जलवायु परिवर्तन अध्ययन, प्रदूषण नियंत्रण, संसाधन प्रबंधन और पारिस्थितिकीय बहाली (रीस्टोरेशन) का आधार है।
- एंटोमोलॉजी (Entomology) कीटों (इन्सेक्टा वर्ग) का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें उनकी शारीरिकी (एक्सोस्केलेटन, एंटीना, पैर, पंख, मुखांग, संवेदी अंग, श्वासनली, मालपीघी नलिकाएँ), विकास (अंडा, लार्वा, प्यूपा, इमागो - कायापलट), व्यवहार (सामाजिक संगठन - चींटी, मधुमक्खी, दीमक; संचार, प्रवास), पारिस्थितिकी (परागण, अपघटन, खाद्य श्रृंखला), वर्गीकरण (आदेश - कोलियोप्टेरा, लेपिडोप्टेरा, डिप्टेरा, हाइमेनोप्टेरा, ऑर्थोप्टेरा) और कीटों के मानव स्वास्थ्य (मलेरिया - मच्छर, डेंगू - एडीज, प्लेग - पिस्सू, चागास रोग - रेडुविड बग, नींद की बीमारी - त्सेत्से मक्खी), कृषि (फसल कीट - टिड्डा, एफिड, सफेद मक्खी, तना छेदक, लीफ माइनर, फल मक्खी, घुन), और पारिस्थितिकी तंत्र (परागण, अपघटन, मृदा वातन) में भूमिका का अध्ययन शामिल है। कीट विज्ञान कृषि कीट प्रबंधन (आईपीएम - एकीकृत कीट प्रबंधन), चिकित्सा कीट विज्ञान (रोग वाहक नियंत्रण), वानिकी, संग्रहालय संरक्षण और फोरेंसिक विज्ञान (फोरेंसिक एंटोमोलॉजी - मृत्यु का समय निर्धारण) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- एथनोग्राफी (Ethnography) किसी विशिष्ट मानव संस्कृति (जनजाति, जातीय समूह, उपसंस्कृति) का गहन, वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) और गुणात्मक (क्वालिटेटिव) अध्ययन है, जिसमें उनके रीति-रिवाजों (प्रथाएँ, संस्कार, त्योहार, पूजा, विवाह, अंतिम संस्कार), सामाजिक संरचनाओं (परिवार, रिश्तेदारी, वंश, नेतृत्व, वर्ग, लिंग भूमिकाएँ), भाषा, विश्वास प्रणाली (धर्म, जादू, पौराणिक कथाएँ, अनुष्ठान), कला (संगीत, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, आभूषण), अर्थव्यवस्था (आजीविका, शिकार, संग्रहण, कृषि, व्यापार, ऋण, विनिमय) और सामग्री संस्कृति (उपकरण, आवास, पोशाक, हथियार, बर्तन) शामिल हैं। एथनोग्राफी फील्डवर्क (प्रतिभागी अवलोकन, साक्षात्कार, वंशावली विश्लेषण) पर आधारित है और मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) की एक प्रमुख शाखा है। इसका उपयोग सांस्कृतिक विविधता को समझने, प्राचीन समाजों के पुनर्निर्माण, विकास परियोजनाओं के मूल्यांकन, और स्वास्थ्य/शिक्षा कार्यक्रमों के डिजाइन में किया जाता है।
- एथनोलॉजी (Ethnology) विभिन्न मानव संस्कृतियों, जातियों (रेस), जनजातियों और समाजों की तुलनात्मक (कम्पैरेटिव) और वैज्ञानिक (साइंटिफिक) अध्ययन है। यह एथनोग्राफी के डेटा (वर्णनात्मक अध्ययनों) का उपयोग करके संस्कृतियों के बीच समानताओं और अंतरों का विश्लेषण करता है, सांस्कृतिक प्रक्रियाओं (प्रसार - डिफ्यूजन, प्रवास - माइग्रेशन, आविष्कार - इन्वेंशन, अनुकूलन - एडेप्टेशन, उत्परिवर्तन - म्यूटेशन) और सार्वभौमिक सांस्कृतिक पैटर्न (जैसे भाषा, परिवार, विवाह, धर्म, कला, अर्थव्यवस्था, राजनीति, कानून, शिक्षा, रिश्तेदारी) की पहचान करता है। एथनोलॉजी सांस्कृतिक विकास (कल्चरल इवोल्यूशन), सामाजिक संगठन और ऐतिहासिक संबंधों (भाषाई, आनुवंशिक, पुरातात्विक) को समझने के लिए एक सैद्धांतिक ढांचा प्रदान करती है। यह मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) की एक केंद्रीय शाखा है, जो सांस्कृतिक प्रकारों (हंटर-गैदरर, देहाती, कृषक, औद्योगिक) के वर्गीकरण और तुलना पर केंद्रित है।
- इथोलॉजी (Ethology) प्राकृतिक (प्राकृतिक) या अर्ध-प्राकृतिक वातावरण में जंतुओं (मनुष्यों सहित) के व्यवहार (बिहेवियर) का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह सहज प्रवृत्तियों (इंस्टिंक्ट्स - जन्मजात, वंशानुगत व्यवहार जैसे घोंसला बनाना, चूसना, भागना, संभोग, शिकार, झुंड बनाना, प्रादेशिकता), सीखे गए व्यवहार, सामाजिक अंतःक्रियाओं (आक्रामकता, सहयोग, परोपकारिता, संचार, संकेत, प्रदर्शन, पदानुक्रम, नेतृत्व), तंत्रिका तंत्र के आधार (न्यूरोएथोलॉजी), विकासात्मक आधार (ओन्टोजेनी) और विकासवादी आधार (फाइलोजेनी) का विश्लेषण करता है। इथोलॉजी व्यवहार के अनुकूली महत्व (लाभ, फिटनेस, प्राकृतिक चयन) और विकासवादी उत्पत्ति पर जोर देता है, कोंराड लोरेंज, निको टिनबर्गेन और कार्ल वॉन फ्रिश (इथोलॉजी के जनक, 1973 का नोबेल पुरस्कार) के काम पर आधारित है। इसका उपयोग पशु कल्याण, व्यवहारिक पारिस्थितिकी, तुलनात्मक मनोविज्ञान और संरक्षण जीवविज्ञान में होता है।
- फ्लोरीकल्चर (Floriculture) सजावटी (ऑर्नामेंटल) और वाणिज्यिक (कमर्शियल) उपयोग के लिए फूलों (गुलाब, गेंदा, ग्लेडियोलस, कारनेशन, ट्यूलिप, लिली, ऑर्किड, क्राइसेंथेमम, जरबेरा, रजनीगंधा) और सजावटी पौधों (बोन्साई, टब-प्लांट, हाउसप्लांट, उद्यान पौधे) की खेती (कल्टीवेशन), प्रबंधन (सिंचाई, निषेचन, छंटाई, पिंचिंग, कीट नियंत्रण), प्रजनन (क्रॉसिंग, हाइब्रिडाइजेशन, आनुवंशिक सुधार, टिशू कल्चर) और मार्केटिंग (कट फूल, पोटेड प्लांट, बल्ब, बीज, पौध) का विज्ञान है। यह उद्यानिकी (हॉर्टीकल्चर) की एक विशेष शाखा है जो फूलों की कटाई के बाद के प्रबंधन (पोस्ट-हार्वेस्ट हैंडलिंग), फूलों की सजावट (एरेंजमेंट), गुलदस्ते (बुके) और पुष्पांजलि (गारलैंड) के निर्माण पर भी केंद्रित है। फ्लोरिकल्चर वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण कृषि उद्योग है (नीदरलैंड, केन्या, इक्वाडोर, कोलंबिया, इथियोपिया, भारत - तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल में केंद्रित)।
- जेनेटिक्स / आनुवंशिकी (Genetics) वंशागति (हैरिटेबिलिटी), जीन (जीन - डीएनए के कार्यात्मक खंड), आनुवंशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी) और जीवों में उत्तराधिकार पैटर्न (इनहेरिटेंस पैटर्न) का अध्ययन है। यह बताती है कि लक्षण (ट्रेट्स - आंखों का रंग, ऊंचाई, रोग प्रतिरोध, उत्पादन, व्यवहार) एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कैसे संचारित होते हैं (मेंडल के नियम - प्रभाविता, अप्रभाविता, पृथक्करण, स्वतंत्र अपव्यूहन, अपूर्ण प्रभाविता, सह-प्रभाविता, बहुजीनिक वंशानुक्रम, बहुप्रभाविता), और कैसे जीन उत्परिवर्तन (म्यूटेशन - स्थायी डीएनए परिवर्तन), पुनर्संयोजन (रीकॉम्बिनेशन) और आनुवंशिक प्रवाह (जेनेटिक ड्रिफ्ट) से प्रजातियों में विविधता और विकास होता है। आनुवंशिकी में आणविक आनुवंशिकी (डीएनए, आरएनए, प्रोटीन संश्लेषण, जीन अभिव्यक्ति), जनसंख्या आनुवंशिकी (एलील आवृत्तियाँ, हार्डी-वेनबर्ग संतुलन), क्वांटिटेटिव आनुवंशिकी (जटिल लक्षण, बहुजीनिक वंशानुक्रम, हेरिटेबिलिटी) और साइटोजेनेटिक्स (गुणसूत्रों का अध्ययन, कैरियोटाइपिंग, एन्यूप्लोइडी, पॉलीप्लोइडी) शामिल हैं। आनुवंशिकी चिकित्सा (आनुवंशिक रोग निदान - सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल सेल एनीमिया, हंटिंगटन रोग; जीन थेरेपी; फार्माकोजेनोमिक्स), कृषि (संकरण, उन्नत फसल किस्में, पशु प्रजनन, जीएम फसलें - बीटी कॉटन, गोल्डन राइस, हर्बिसाइड-प्रतिरोधी फसलें), फोरेंसिक विज्ञान (डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, पैतृक परीक्षण), और विकासवादी जीवविज्ञान का आधार है।
- जेरोन्टोलॉजी (Gerontology) वृद्धावस्था (बुढ़ापा) की प्रक्रिया का बहु-विषयी (मल्टी-डिसिप्लिनरी) अध्ययन है, जिसमें जैविक (सेलुलर और आणविक स्तर पर उम्र बढ़ने की प्रक्रियाएँ - टेलोमेयर छोटा होना, ऑक्सीडेटिव तनाव, माइटोकॉन्ड्रियल डिसफंक्शन, उम्र बढ़ने के जीन, मुक्त मूलक सिद्धांत, प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना), मनोवैज्ञानिक (बुद्धि, स्मृति, सीखने की क्षमता, व्यक्तित्व, अवसाद, चिंता, मनोभ्रंश, अल्जाइमर, पार्किंसंस रोग, संज्ञानात्मक गिरावट) और सामाजिक पहलू (सेवानिवृत्ति, आय, आवास, सामाजिक अलगाव, देखभाल, सामाजिक सहायता, स्वास्थ्य सेवा की पहुँच, आयुवाद, अंतर-पीढ़ीगत संबंध, दीर्घकालिक देखभाल, पेंशन, कानूनी मुद्दे) शामिल हैं। जेरोन्टोलॉजी बुढ़ापे से संबंधित बीमारियों (हृदय रोग, गठिया, ऑस्टियोपोरोसिस, मधुमेह, कैंसर, मोतियाबिंद, मैक्युलर डीजेनेरेशन, फ्रैक्चर) और स्वास्थ्य नीतियों (स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, वृद्धावस्था आय, घरेलू देखभाल, नर्सिंग होम, कानूनी सुरक्षा) का अध्ययन करता है। जीरियाट्रिक्स (Geriatrics) जेरोन्टोलॉजी का चिकित्सीय उप-क्षेत्र है जो वृद्धों के स्वास्थ्य, रोगों के निदान और उपचार पर केंद्रित है।
- हर्पेटोलॉजी (Herpetology) सरीसृपों (स्नेक्स - साँप, लिज़र्ड्स - छिपकली, टर्टल्स - कछुए, क्रोकोडाइल्स - मगरमच्छ, घड़ियाल, अलिगेटर) और उभयचरों (फ्रॉग्स - मेंढक, टॉड्स - भेंक, सैलामैंडर्स - सैलामैंडर, न्यूट्स - न्यूट्स, सीसीलियन्स) की शारीरिकी, शारीरिक क्रिया (फिजियोलॉजी), पारिस्थितिकी, वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी), वितरण (बायोग्राफी), व्यवहार (आहार, प्रजनन, शीतनिद्रा, ग्रीष्मनिद्रा, रक्षा तंत्र - छलावरण, विष, सजगता मृतकता) और विकास का अध्ययन करने वाली जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी) की शाखा है। सरीसृप ठंडे खून वाले (एक्टोथर्मिक), एमनियोट, शल्की (एपिडर्मल स्केल), फेफड़ों से सांस लेने वाले कशेरुकी हैं। उभयचर भी ठंडे खून वाले (एक्टोथर्मिक), एनामनियोट, नम, चिकनी त्वचा वाले (जो गैस विनिमय में सहायक होती है), मेटामोर्फोसिस (कायापलट) से गुजरने वाले (जल में अंडे, लार्वा - टैडपोल, वयस्क - फेफड़े/त्वचा से सांस) कशेरुकी हैं। हर्पेटोलॉजी विष विज्ञान (विषैले साँप - कोबरा, करैत, वाइपर, रसेल वाइपर, सॉ-स्केल्ड वाइपर, सी स्नेक; एंटीवेनम उत्पादन), संरक्षण जीवविज्ञान (निवास स्थान का विनाश, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अतिदोहन, आक्रामक प्रजातियाँ, मेंढकों की गिरती आबादी - छत्रीय प्रजातियाँ) और पारिस्थितिकीय निगरानी (उभयचर पर्यावरणीय स्वास्थ्य के संकेतक के रूप में - उनकी पारगम्य त्वचा के कारण) के लिए महत्वपूर्ण है।
- हॉर्टीकल्चर / उद्यानिकी (Horticulture) फल, सब्जी, फूल और सजावटी पौधों (उद्यान पौधे, लॉन घास, झाड़ियाँ, पेड़, जड़ी-बूटियाँ, मसाले, औषधीय पौधे, नर्सरी पौधे) की खेती, सुधार, प्रबंधन और व्यावसायिक उत्पादन का विज्ञान है। यह कृषि विज्ञान की एक शाखा है जो बड़े पैमाने पर अनाज की खेती (एग्रोनॉमी) से भिन्न है, और इसमें पोमोलॉजी (फल विज्ञान), ओलरीकल्चर (सब्जी विज्ञान), फ्लोरीकल्चर (फूल विज्ञान), लैंडस्केप हॉर्टीकल्चर (उद्यान डिजाइन, पार्क प्रबंधन, लॉन देखभाल), पोस्ट-हार्वेस्ट टेक्नोलॉजी (कटाई के बाद प्रबंधन, भंडारण, प्रशीतन, पैकेजिंग), प्लांट प्रोपेगेशन (बीज, कलम, ग्राफ्टिंग, बडिंग, लेयरिंग, टिशू कल्चर), ग्रीनहाउस प्रबंधन, सिंचाई प्रणाली (ड्रिप, स्प्रिंकलर) और सॉइल मैनेजमेंट शामिल हैं। उद्यानिकी फसलों की उच्च उपज, बेहतर गुणवत्ता (रंग, आकार, स्वाद, पोषण मूल्य), रोग प्रतिरोध, परिवहन क्षमता और लंबी भंडारण अवधि के लिए प्रजनन तकनीकों (संकरण, उत्परिवर्तन प्रजनन, पॉलीप्लोइडी, जीएम प्रौद्योगिकी) का उपयोग करती है।
- हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) मृदा के उपयोग के बिना, खनिज पोषक तत्वों (नाइट्रोजन - N, फास्फोरस - P, पोटैशियम - K, कैल्शियम - Ca, मैग्नीशियम - Mg, सल्फर - S, आयरन - Fe, मैंगनीज - Mn, बोरॉन - B, जिंक - Zn, कॉपर - Cu, मोलिब्डेनम - Mo, क्लोरीन - Cl) के जलीय विलयन (पानी) में पौधों को उगाने की विधि है। पौधों की जड़ें सीधे पोषक विलयन में डूबी रहती हैं या निष्क्रिय सब्सट्रेट (पेर्लाइट, वर्मीक्यूलाइट, रॉकवूल, नारियल का कोइर, बजरी, रेत, प्यूमिस) में सहारा दी जाती हैं, जबकि पोषक विलयन को पंप (पंप) के द्वारा रिसर्कुलेट (पुनःचक्रण) किया जाता है। हाइड्रोपोनिक्स के प्रकारों में NFT (न्यूट्रिएंट फिल्म टेक्नीक - पोषक विलयन की पतली फिल्म), डीप वाटर कल्चर (जड़ें पोषक विलयन में डूबी), एकोपोनिक्स (मछली और पौधों का सह-पालन), एरोपोनिक्स (जड़ें हवा में लटकी, पोषक विलयन का धुंध/कोहरा छिड़काव) और विकलांग (जल में उगाना, स्थिर विलयन) शामिल हैं। इस विधि के लाभों में उच्च उपज, तीव्र वृद्धि, कम पानी की खपत (मृदा की तुलना में 90% तक कम), कम कीट और रोग की समस्या, स्थान दक्षता (ऊर्ध्वाधर खेती), मौसम और मृदा की सीमाओं (बंजर, रेगिस्तानी, शहरी, छतों पर) से स्वतंत्रता शामिल हैं। हाइड्रोपोनिक्स का उपयोग सलाद, टमाटर, खीरा, स्ट्रॉबेरी, शिमला मिर्च, पालक, जड़ी-बूटियाँ, औषधीय पौधे, और संवेदनशील फसलों के बीज उत्पादन के लिए किया जाता है।
- इक्थियोलॉजी (Ichthyology) मछलियों (जबड़ेदार कशेरुकी, जल में रहने वाले, गलफड़ों से सांस लेने वाले, पंखों वाले) की संरचना (एनाटॉमी - पंखों के प्रकार, तराजू - साइक्लोइड, स्टेनोइड, गैनोइड, प्लाकोइड, प्लेट, बिना तराजू; गलफड़े, पार्श्व रेखा प्रणाली, तैरने वाला मूत्राशय, आंतरिक कंकाल), व्यवहार (प्रवास - साल्मन, ईल; स्कूली व्यवहार; आहार; प्रजनन - अंडे देना, जीवित बच्चा जनना), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी - आदेश, परिवार, जीनस, प्रजाति; कार्टिलाजिनस मछलियाँ - शार्क, रे, स्केट, काइमेरा; बोनी मछलियाँ - सैकड़ों परिवार, जैसे साइप्रिनिडे - कार्प, रोहू, कतला; सिल्युरिडे - मछली; साल्मोनिडे - सैल्मन; स्कॉम्ब्रिडे - टूना, मैकेरल; साइप्रिनोडोन्टिफोर्मेस - गप्पी, मॉस्किटोफिश) और आवास (मीठा जल, खारा जल, समुद्री जल, एनाड्रोमस - समुद्र से मीठे जल में प्रवास, कटाड्रोमस - मीठे जल से समुद्र में प्रवास, ज्वारीय) का अध्ययन करने वाली जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी) की शाखा है। इक्थियोलॉजी मत्स्य पालन (फिशरीज) प्रबंधन (मछली स्टॉक का मूल्यांकन, नियमन, संरक्षण), जलीय कृषि (एक्वाकल्चर - मछली पालन, रोग नियंत्रण, प्रजनन, पोषण), जल प्रदूषण निगरानी (जैव संकेतक), पारिस्थितिकी तंत्र अध्ययन (खाद्य जाल, जल चक्र) और विकासवादी जीवविज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है।
- लेक्सिकोग्राफी (Lexicography) भाषा के शब्दकोषों (डिक्शनरीज़) के डिज़ाइन, संयोजन (संकलन, संपादन), और मूल्यांकन का अध्ययन है; जैविक संदर्भ में, यह वनस्पति विज्ञान (बॉटनी), जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी), चिकित्सा (मेडिसिन), और अन्य जैविक विज्ञानों (बायोलॉजिकल साइंसेज) में उपयोग की जाने वाली शब्दावली (टर्मिनोलॉजी) के व्यवस्थितकरण, नामकरण (नॉमेनक्लेचर), मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) और प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) से संबंधित है। यह सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक नाम (बाइनॉमियल नामकरण - लिनिअस प्रणाली: जीनस और प्रजाति) और तकनीकी शब्द सटीक, अद्वितीय और सार्वभौमिक रूप से समझे जाने योग्य हों, जिससे अंतर्राष्ट्रीय संचार और डेटा विनिमय (जैसे डीएनए डेटाबेस जैसे जेनबैंक, टैक्सोनोमिक डेटाबेस जैसे आईटीआईएस, डब्ल्यूओआरएमएस) सुगम होता है। जैविक लेक्सिकोग्राफी में अंतर्राष्ट्रीय कोड ऑफ जूलॉजिकल नॉमेनक्लेचर (आईसीजेडएन) और अंतर्राष्ट्रीय कोड ऑफ नॉमेनक्लेचर फॉर अल्गी, फंजाई, एंड प्लांट्स (आईसीएन) का पालन किया जाता है।
- लिथोट्रिप्सी (Lithotripsy) गुर्दे (किडनी), पित्ताशय (गॉलब्लैडर) या मूत्राशय (यूरिनरी ब्लैडर) में बनी पथरी (कैलकुली - कैल्शियम ऑक्सालेट, कैल्शियम फॉस्फेट, यूरिक एसिड, सिस्टीन, स्ट्रुवाइट - मैग्नीशियम अमोनियम फॉस्फेट) को शरीर के बाहर (एक्स्ट्राकोर्पोरियल) या अंदर (इंट्राकोर्पोरियल) उत्पन्न सदमे तरंगों (शॉक वेव्स), लेजर (लेज़र), अल्ट्रासाउंड (अल्ट्रासाउंड), या यांत्रिक (मैकेनिकल) ऊर्जा का उपयोग करके छोटे टुकड़ों में तोड़ने (टूटना, फ्रैक्चर) की चिकित्सीय (मेडिकल) प्रक्रिया है, ताकि वे मूत्र या पित्त के माध्यम से प्राकृतिक रूप से बाहर निकल सकें। सबसे सामान्य प्रकार एक्स्ट्राकोर्पोरियल शॉक वेव लिथोट्रिप्सी (ईएसडब्ल्यूएल) है, जो एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड मार्गदर्शन (गाइडेंस) के तहत उच्च-ऊर्जा ध्वनि तरंगों (साउंड वेव्स) का उपयोग करता है। लिथोट्रिप्सी की तुलना में पारंपरिक पथरी हटाने की सर्जरी (यूरेटेरोस्कोपी, पर्क्यूटेनियस नेफ्रोलिथोटॉमी - पीसीएनएल, ओपन सर्जरी) अधिक आक्रामक होती है।
- मैलेकोलॉजी (Malacology) मोलस्क (मोलस्का फाइलम) - अकशेरुकी जीव (इनवर्टिब्रेट्स) जैसे घोंघे (स्नेल्स), स्लग्स (स्लग्स), सीप (ऑयस्टर), क्लैम्स (क्लैम्स), मसल्स (मसल्स), स्क्विड्स (स्क्विड), ऑक्टोपस (ऑक्टोपस), कटलफिश (कटलफिश) और नॉटिलस (नॉटिलस) की शारीरिकी (एनाटॉमी - सिर, स्नायु-पाद, आवरण, खोल, किडनी, हृदय), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी - गैस्ट्रोपोडा, बाइवाल्विया, सेफलोपोडा, पॉलीप्लाकोफोरा, मोनोप्लाकोफोरा, स्कैफोपोडा), वितरण (बायोग्राफी - समुद्री, मीठा जल, स्थलीय - फेफड़े वाले घोंघे), पारिस्थितिकी (भोजन, प्रजनन, शिकार, सहजीवन, परजीवीवाद), व्यवहार (सेफलोपोड का बुद्धिमान व्यवहार, रंग बदलना, स्याही छोड़ना, तंत्रिका तंत्र) और खोलों (शैल) के अध्ययन का विज्ञान है। मोलस्क के खोलों का अध्ययन करने वाली उपशाखा को कॉन्कोलॉजी (Conchology) कहते हैं। मैलेकोलॉजी समुद्री पारिस्थितिकी (कोरल रीफ्स में प्रवाल भक्षण, समुद्री घास के मैदानों में घास हटाना, जल निस्पंदन - मसल्स, सीप), मत्स्य पालन (व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियाँ - स्क्विड, ऑक्टोपस, सीप, मसल्स, क्लैम, स्कैलप्स, एबालोन) और चिकित्सा (कुछ घोंघे मध्यस्थ के रूप में परजीवी रोग - शिस्टोसोमियासिस, फैसिओलियासिस) के लिए महत्वपूर्ण है।
- ओलरीकल्चर (Olericulture) सब्जियों (वेजिटेबल्स) के उत्पादन और खेती (कल्टीवेशन) का अध्ययन है, जो उद्यानिकी (हॉर्टीकल्चर) की एक विशेष शाखा है। इसमें सब्जियों की किस्मों (पत्तेदार - पालक, सलाद, केल; जड़ वाली - गाजर, मूली, चुकंदर, शलजम, शकरकंद; फल वाली - टमाटर, बैंगन, मिर्च, खीरा, तोरी, करेला, लौकी, कद्दू; फली वाली - फलियाँ, मटर, सोयाबीन; पुष्प वाली - फूलगोभी, ब्रोकोली; पत्तागोभी परिवार - पत्तागोभी, केल, ब्रसेल्स स्प्राउट्स; तना वाली - शतावरी, अजवाइन; कंद वाली - आलू, अरबी, जिमीकंद, सूरन; प्याज परिवार - प्याज, लहसुन, प्याज़, हरी प्याज) के बीज उत्पादन, पौध की तैयारी (नर्सरी), रोपण, सिंचाई (ड्रिप, फरो, स्प्रिंकलर), निषेचन (उर्वरक - नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सूक्ष्म पोषक), कीट एवं रोग नियंत्रण (एकीकृत कीट प्रबंधन), खरपतवार प्रबंधन, कटाई, पोस्ट-हार्वेस्ट हैंडलिंग (छंटाई, धुलाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रशीतन, कोल्ड स्टोरेज, मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग), और भंडारण (स्टोरेज) की तकनीकों का अध्ययन शामिल है। ओलरीकल्चर पोषण सुरक्षा (विटामिन, खनिज, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट), आर्थिक विकास और निर्यात के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- ऑर्निथोलॉजी (Ornithology) पक्षियों (एव्स क्लास) की शारीरिकी (एनाटॉमी - पंख, चोंच, पैर, कंकाल (वायु-भरी हड्डियाँ), पंख, पैर, पंजे, पाचन तंत्र (फसल, कंकड़ पेट), श्वसन तंत्र (वायु थैली, एकदिशीय वायु प्रवाह, कुशल गैस विनिमय), हृदय, मस्तिष्क), शरीर क्रिया विज्ञान (फिजियोलॉजी - होमियोथर्मिक - गर्म खून, उच्च चयापचय, गतिशील उड़ान, शीतनिद्रा, प्रवास चयापचय), प्रवास (माइग्रेशन - लंबी दूरी, छोटी दूरी, ऊर्ध्वाधर, आंशिक, विकिरण - मार्ग, मौसमी पैटर्न, नेविगेशन - सूर्य, सितारे, पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र), व्यवहार (बिहेवियर - गायन, प्रादेशिकता, घोंसला निर्माण, मैथुन प्रदर्शन, झुंड, देखभाल, आहार, शिकार, अलार्म कॉल, सामाजिक संरचना), विकास (इवोल्यूशन - डायनासोर से उत्पत्ति, आर्कियोप्टेरिक्स, उड़ान का विकास, अनुकूलन - विभिन्न आवासों के लिए चोंच, पैर, पंख, रंग, छलावरण), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी - आदेश, परिवार, जीनस, प्रजाति, उप-प्रजाति, दौड़) और वितरण (बायोग्राफी - प्रवासी, गैर-प्रवासी, स्थानिक, वैश्विक) का अध्ययन करने वाली जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी) की शाखा है। पक्षी पारिस्थितिकी (परागण, बीज फैलाव, कीट नियंत्रण, मैला ढोने वाला, शिकारी, खाद्य जाल), संरक्षण (प्रजातियों का संरक्षण - आवास विनाश, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अवैध शिकार, पवन टरबाइन, कांच की इमारतें, आक्रामक प्रजातियाँ, पक्षी उद्यान, प्रवासी पक्षी संधियाँ, पुनर्वास) और पर्यावरणीय स्वास्थ्य (जैव संकेतक - पक्षियों की गिरती संख्या पर्यावरणीय क्षरण का संकेत) के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।
- ऑस्टियोलॉजी (Osteology) कशेरुकी जीवों (वर्टेब्रेट्स - मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) की हड्डियों (बोन्स) और कंकाल प्रणाली (स्केलेटल सिस्टम) की संरचना (स्ट्रक्चर - लंबी हड्डियाँ, चपटी हड्डियाँ, अनियमित हड्डियाँ, छोटी हड्डियाँ; कॉम्पैक्ट हड्डी, स्पंजी हड्डी, अस्थि मज्जा, पेरीओस्टेम, एंडोस्टेम, कार्टिलेज), कार्य (फंक्शन - शारीरिक सहारा, सुरक्षा - कपाल, छाती, रीढ़; गति - मांसपेशियों के लिए लीवर; खनिज भंडारण - कैल्शियम, फास्फोरस; रक्त कोशिका निर्माण - हेमटोपोइजिस), विकास (ग्रोथ - अस्थिकरण, संधि विकास, कंकाल परिपक्वता), और रोगों (डिजीज - ऑस्टियोपोरोसिस, ऑस्टियोआर्थराइटिस, फ्रैक्चर, संधिवात, अस्थि कैंसर, हड्डी ट्यूमर, अस्थि संक्रमण, विटामिन डी की कमी - रिकेट्स, ऑस्टियोमलेशिया) का अध्ययन है। ऑस्टियोलॉजी शारीरिकी (एनाटॉमी), पुरातत्व (पुरातत्व - कंकाल के अवशेषों से प्राचीन आबादी के स्वास्थ्य, आहार, आयु, लिंग, आनुवंशिकी, प्रवास, रोगों, हिंसा का अध्ययन; पैलियोपैथोलॉजी, फोरेंसिक मानवविज्ञान), फोरेंसिक विज्ञान (फोरेंसिक साइंस - मृत्यु की पहचान, आयु, लिंग, ऊंचाई, आनुवंशिक प्रोफाइल), नृविज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी - मानव कंकाल संरचना का अध्ययन, विकास, मानव विविधता), चिकित्सा (ऑर्थोपेडिक्स, रुमेटोलॉजी, एंडोक्रिनोलॉजी, डेंटिस्ट्री, सर्जरी), कशेरुकी पेलियोन्टोलॉजी (जीवाश्म कंकालों से विलुप्त प्रजातियों का अध्ययन) और खेल चिकित्सा (खेल चोटें, पुनर्वास) के लिए मूलभूत है।
- पैलियोबायोलॉजी (Paleobiology) जीवाश्मों (फॉसिल्स - प्राचीन जीवों के संरक्षित अवशेष या छाप, जैसे हड्डियाँ, खोल, दाँत, पत्तियाँ, लकड़ी, पराग, बीजाणु, डीएनए, निशान, बिल, कास्ट, मोल्ड) के माध्यम से प्राचीन जीवन (प्राचीन जीवन - प्रोकैरियोट्स, यूकेरियोट्स, पौधे, जानवर, फंगी, प्रोटिस्ट) का अध्ययन है। यह प्रागैतिहासिक (प्रागैतिहासिक) पारिस्थितिकी (पारिस्थितिकी - प्राचीन आवास, जलवायु, खाद्य जाल, सहजीवन, प्रतियोगिता, शिकार, सह-विकास), विकास (विकास - जीवन का इतिहास, फ़ाइलोजेनी, अनुकूलन, विकासवादी रुझान, विविधता, विकिरण, विलुप्त होने, संक्रमणकालीन जीवाश्म, जीवाश्म रिकॉर्ड), जीवाश्मिकी (टेपोनॉमी - जीवाश्मीकरण की प्रक्रियाएँ - दफन, खनिजीकरण, क्षय, संरक्षण, संपीड़न, पेट्रीफिकेशन, पर्मिनरलाइजेशन, रिक्रिस्टलाइजेशन, कार्बोनाइजेशन, एम्बर में संरक्षण, बर्फ में संरक्षण, टार पिट्स में संरक्षण) और प्राचीन जीवों की जीवन शैली (व्यवहार, गति, पोषण, प्रजनन, शरीर विज्ञान, आकार, रूप, जीवन चक्र) का पुनर्निर्माण करता है। पैलियोबायोलॉजी जीवाश्म विज्ञान (पेलियोन्टोलॉजी) का एक व्यापक क्षेत्र है जो भूविज्ञान (भूविज्ञान - चट्टान परतें, तलछटी वातावरण, रेडियोमेट्रिक डेटिंग, स्ट्रेटीग्राफी, सेडिमेंटोलॉजी) और जीव विज्ञान (जीव विज्ञान - आनुवंशिकी, तुलनात्मक शारीरिकी, भ्रूणविज्ञान, व्यवहार, पारिस्थितिकी) को एकीकृत करता है।
- पैलियोबॉटनी (Paleobotany) पादप जीवाश्मों (प्लांट फॉसिल्स - लकड़ी, पत्तियाँ, तना, जड़ें, बीज, शंकु, फल, पराग, बीजाणु, पौधों के निशान, चारकोल, एम्बर) का अध्ययन है, जिसका उद्देश्य प्राचीन वनस्पतियों (प्राचीन वनस्पतियाँ) का पुनर्निर्माण करना और पौधों के विकास (प्लांट इवोल्यूशन) को समझना है। यह जीवाश्म पौधों (शैवाल, ब्रायोफाइट्स, टेरिडोफाइट्स, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म) की संरचना (एनाटॉमी - सेलुलर संरचना, ऊतक, रंध्र, संवहन बंडल, प्रजनन अंग, तना, जड़, पत्ती की बनावट), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी), विकासवादी इतिहास (जीवाश्म रिकॉर्ड में पहली बार प्रकट होना, विविधता, अनुकूलन, विलुप्त होना, संक्रमणकालीन जीवाश्म, जीवाश्म क्रम), प्राचीन पारिस्थितिकी (पेलियोइकोलॉजी - पुराने पर्यावरण, जलवायु - मौसम के छल्ले, वृक्ष के छल्ले, पराग रिकॉर्ड, समुदाय संरचना, सहजीवन, परागण, पौधे-शाकाहारी संबंध) और बायोग्राफी (बायोग्राफी - प्राचीन भौगोलिक वितरण, प्रवास मार्ग, महाद्वीपीय बहाव, महासागरीय बाधाएँ, द्वीप बायोग्राफी) का अध्ययन करता है। पैलियोबॉटनी के निष्कर्ष जलवायु परिवर्तन मॉडल, कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस के निर्माण, और वर्तमान पादप विविधता और वितरण को समझने में सहायक होते हैं।
- पैलिनोलॉजी (Palynology) पराग कणों (पोलन ग्रेन्स - फूलों वाले पौधों के नर युग्मक), बीजाणुओं (स्पोर्स - फर्न, मॉस, कवक, बैक्टीरिया), और अन्य सूक्ष्म पादप कणों (डाइनोफ्लैगलेट सिस्ट, एक्रिटार्क्स, चिटिनोजोअन्स, स्कोलेकोडोंट्स) का अध्ययन है। यह पिछले जलवायु (पेलियोक्लाइमेट - पराग विश्लेषण से हिमयुग, सूखा, बाढ़, तापमान, वर्षा का पुनर्निर्माण), वनस्पति (वेजिटेशन - पिछले जंगलों, घास के मैदानों, टुंड्रा, रेगिस्तान, दलदल, सवाना, मैंग्रोव, कोरल रीफ्स, एल्गल ब्लूम का पुनर्निर्माण), पारिस्थितिकी (पेलियोइकोलॉजी - आग, भूस्खलन, बाढ़, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट, उल्कापिंड प्रभाव, समुद्री स्तर में परिवर्तन), स्ट्रेटीग्राफी (निक्षेपों और तलछटी परतों की तुलनात्मक डेटिंग) और प्रागैतिहासिक कृषि (मानव निर्मित पराग परिवर्तन, कृषि की उत्पत्ति, स्थानांतरण, फसल विकास, ग्रीनहाउस प्रभाव, जलवायु परिवर्तन का मानव इतिहास पर प्रभाव) का विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। पैलिनोलॉजी जीवाश्म विज्ञान (पैलियोन्टोलॉजी) और भूविज्ञान (जियोलॉजी) का एक महत्वपूर्ण उप-क्षेत्र है, जिसका उपयोग तेल और गैस अन्वेषण, पुरातत्व (पुरातत्व), फोरेंसिक विज्ञान, एलर्जी अध्ययन (एलर्जी - पराग गणना), पुरावनस्पति विज्ञान और पुरापारिस्थितिकी में किया जाता है।
- पैरासिटोलॉजी (Parasitology) परजीवियों (पैरासाइट्स - ऐसे जीव जो दूसरे जीव (मेजबान) पर या उसके अंदर रहकर अपना पोषण प्राप्त करते हैं और मेजबान को नुकसान पहुँचाते हैं), उनके मेजबानों (होस्ट्स - अंतिम मेजबान, मध्यवर्ती मेजबान, संचयी मेजबान, पैराटेनिक मेजबान, रिजर्वायर होस्ट), जीवन चक्र (लाइफ साइकल - अंडा, लार्वा, सिस्ट, परिपक्व अवस्था, संक्रमण के मार्ग - मौखिक, त्वचीय, श्वसन, यौन, मातृ-भ्रूण), पारिस्थितिकी (परजीवी-मेजबान अंतःक्रियाएँ, सह-विकास, सहजीवन, परजीवी विविधता, जैव भूगोल, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव) और परजीवियों से होने वाली बीमारियों (प्रोटोजोआ - मलेरिया - प्लाज्मोडियम, स्लीपिंग सिकनेस - ट्रिपैनोसोमा, अमीबिक पेचिश - एंटअमीबा हिस्टोलिटिका, लीशमैनियासिस - लीशमैनिया, गिआर्डियासिस - गिआर्डिया लैम्ब्लिया, टॉक्सोप्लाज्मोसिस - टॉक्सोप्लाज्मा गोंडी; हेल्मिन्थ्स - राउंडवॉर्म्स (एस्केरिस, एंकिलोस्टोमा, नेकेटर, ट्राइक्यूरिस), टेपवॉर्म्स (टेनिया, एकाइनोकोकस), फ्लूक्स (शिस्टोसोमा, फैसिओला), पिनवॉर्म्स (एंटरोबियस वर्मीक्युलरिस); एक्टोपैरासाइट्स - टिक, पिस्सू, जूँ, घुन, माइट्स, बेड बग्स) का अध्ययन है। पैरासिटोलॉजी चिकित्सा (मानव रोग - निदान, उपचार, दवाएँ, प्रतिरक्षा, महामारी विज्ञान, रोकथाम), पशु चिकित्सा (पशुओं के रोग, संगरोध, कीटनाशक, टीके), कृषि (फसलों के कीट - नेमाटोड, स्केल, घुन, सफेद मक्खी, एफिड, लीफ माइनर; फाइटोपैरासिटिक नेमाटोड; पादप रोग - कवक, बैक्टीरिया, वायरस, नेमाटोड), वन्यजीव संरक्षण (संरक्षण जीवविज्ञान - संकटग्रस्त प्रजातियों में परजीवी, संक्रामक रोग, निवास स्थान का विनाश) और सार्वजनिक स्वास्थ्य (स्वच्छता, स्वच्छता, सुरक्षित पानी, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा) के लिए महत्वपूर्ण है।
- पैथोलॉजी (Pathology) रोगों (डिजीज) के कारणों (एटियोलॉजी - एजेंट, आनुवंशिक, पर्यावरणीय, पोषण, सूक्ष्मजीव, परजीवी, स्वप्रतिरक्षा, विष, आघात, विकिरण), प्रक्रियाओं (मैकेनिज्म - सूजन, अध: पतन, नेक्रोसिस, एपोप्टोसिस, एट्रोफी, हाइपरट्रॉफी, मेटाप्लासिया, डिसप्लासिया, नियोप्लासिया, एमिलॉयडोसिस), और जीवों पर प्रभावों (प्रभाव - लक्षण, संकेत, प्रयोगशाला निष्कर्ष, रोग का कोर्स, पूर्वानुमान, जटिलताएँ) का अध्ययन है। पैथोलॉजी में ऊतक विश्लेषण (हिस्टोपैथोलॉजी - सूक्ष्मदर्शी से ऊतक के नमूनों की जांच; बायोप्सी, ऑटोप्सी), कोशिका विश्लेषण (साइटोपैथोलॉजी - पैप स्मीयर, फाइन नीडल एस्पिरेशन), नैदानिक प्रयोगशाला परीक्षण (क्लिनिकल पैथोलॉजी - रक्त परीक्षण (हेमेटोलॉजी, कोगुलेशन, ब्लड बैंक), मूत्र परीक्षण, मल परीक्षण, थूक परीक्षण, सीरोलॉजी, प्रतिरक्षा विज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी, रसायन विज्ञान, एंजाइम, हार्मोन, चयापचय, आनुवंशिकी) और फोरेंसिक पैथोलॉजी (मृत्यु का कारण और तरीका निर्धारित करने के लिए शव परीक्षण) शामिल हैं। पैथोलॉजी चिकित्सा, दंत चिकित्सा, पशु चिकित्सा, और जैव चिकित्सा अनुसंधान का एक मूलभूत स्तंभ है, जो रोगों के निदान, उपचार, रोकथाम, प्रबंधन और पूर्वानुमान में मदद करता है।
- पेडोलॉजी (Pedology) मृदा (सॉइल) के निर्माण (पेडोजेनेसिस - मृदा निर्माण की प्रक्रियाएँ: अपक्षय, जैविक गतिविधियाँ, जलवायु कारक, समय, स्थलाकृति, जैविक प्रक्रियाएँ), गुणों (भौतिक - बनावट, संरचना, घनत्व, सरंध्रता, जल धारण क्षमता, वायु संचार, तापमान; रासायनिक - पीएच, कैटेशन विनिमय क्षमता, कार्बनिक पदार्थ, खनिज, पोषक तत्व; जैविक - मृदा जीव, कार्बनिक पदार्थ का अपघटन, नाइट्रोजन स्थिरीकरण, नाइट्रिफिकेशन, डिनाइट्रिफिकेशन), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी - मृदा क्षितिज: O, A, E, B, C, R; मृदा क्रम: एन्टिसॉल्स, इन्सेप्टिसॉल्स, अल्फिसॉल्स, एंडिसॉल्स, एरिडिसॉल्स, हिस्टोसॉल्स, जेलिसॉल्स, मॉलिसॉल्स, ऑक्सिसॉल्स, स्पोडोसॉल्स, उल्टीसॉल्स, वर्टिसॉल्स) और वितरण (जियोग्राफी - मृदा मानचित्रण, मृदा संसाधन आकलन) का वैज्ञानिक अध्ययन है। पेडोलॉजी पारिस्थितिकी (इकोलॉजी), कृषि (एग्रीकल्चर - मृदा उर्वरता, फसल उत्पादन, मृदा प्रबंधन, जल संरक्षण, अपरदन नियंत्रण), वानिकी (फॉरेस्ट्री), भूविज्ञान (जियोलॉजी), इंजीनियरिंग (सिविल इंजीनियरिंग, फाउंडेशन डिजाइन) और पर्यावरण विज्ञान (पर्यावरणीय प्रदूषण, मृदा उपचार, भूमि पुनर्वास, अपशिष्ट प्रबंधन) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- फिलोलॉजी (Philology) भाषाओं की संरचना (व्याकरण, वाक्यविन्यास, ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, अर्थ विज्ञान, शब्दकोश), ऐतिहासिक विकास (तुलनात्मक भाषा विज्ञान - भाषा परिवार: इंडो-यूरोपीय, सेमिटिक, द्रविड़ियन, सिनो-तिब्बती; भाषा परिवर्तन: ध्वनि परिवर्तन, अर्थ परिवर्तन, पुनर्निर्माण), और संबंधों (भाषा संपर्क, ऋणशब्द, प्रादेशिक भाषाएँ) का तुलनात्मक (कम्पैरेटिव) अध्ययन है। हालाँकि फिलोलॉजी स्वयं जैविक नहीं है, यह जैविक संदर्भ में उपयोग की जाने वाली शब्दावली, नामकरण (जैविक नामकरण - लिनिअन प्रणाली), वैज्ञानिक लैटिन और वनस्पति/जंतु वर्णन के ऐतिहासिक ग्रंथों की समझ के लिए अंतःविषयी (इंटरडिसिप्लिनरी) है। यह ऐतिहासिक भाषा विज्ञान, साहित्यिक आलोचना, पाठ्यालोचना (ग्रंथों के आलोचनात्मक संस्करण), कोडिकोलॉजी (पांडुलिपियों का अध्ययन) और पुरालेख विज्ञान के करीब है।
- फिजियोलॉजी (Physiology) जीवों (जीवों) और उनके अंगों (अंगों - हृदय, फेफड़े, गुर्दे, यकृत, मस्तिष्क, त्वचा, पाचन तंत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली, अंतःस्रावी तंत्र, तंत्रिका तंत्र, मांसपेशी तंत्र, कंकाल तंत्र, प्रजनन प्रणाली) की कार्यप्रणाली (फंक्शनिंग), तंत्र (मैकेनिज्म - जैव रासायनिक पथ, परिवहन प्रक्रियाएँ, संकेतन मार्ग, जीन अभिव्यक्ति, चयापचय, नियंत्रण प्रणालियाँ) और महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं (प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, पाचन, परिसंचरण, उत्सर्जन, न्यूरोट्रांसमिशन, हार्मोनल विनियमन, थर्मोरेग्यूलेशन, ऑस्मोरेग्यूलेशन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, प्रजनन, विकास, होमियोस्टेसिस) का अध्ययन है। फिजियोलॉजी यह समझने की कोशिश करती है कि जीव के भीतर अणु, कोशिकाएँ, ऊतक और अंग कैसे सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य करते हैं ताकि जीवन को बनाए रखा जा सके। यह शारीरिकी (एनाटॉमी - संरचना का अध्ययन) से निकटता से संबंधित है, क्योंकि संरचना कार्य को निर्धारित करती है। फिजियोलॉजी के उप-क्षेत्रों में सेल फिजियोलॉजी, प्लांट फिजियोलॉजी, एनिमल फिजियोलॉजी, कम्पेरेटिव फिजियोलॉजी, एक्सरसाइज फिजियोलॉजी, कार्डियोवैस्कुलर फिजियोलॉजी, न्यूरोफिजियोलॉजी, एंडोक्राइनोलॉजी, रीनल फिजियोलॉजी, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल फिजियोलॉजी, रेस्पिरेटरी फिजियोलॉजी, रिप्रोडक्टिव फिजियोलॉजी, और इम्यूनोफिजियोलॉजी शामिल हैं।
- पोमोलॉजी (Pomology) फल वृक्षों (फ्रूट ट्रीज़ - सेब, नाशपाती, आड़ू, बेर, आम, अंगूर, केला, पपीता, अमरूद, अनार, लीची, जामुन, स्ट्रॉबेरी, रसभरी, ब्लूबेरी) की खेती (कल्टीवेशन), प्रजनन (ब्रीडिंग - संकरण, हाइब्रिड, आनुवंशिक सुधार, शाखा-प्ररोह (बड) उत्परिवर्तन, टिशू कल्चर), कटाई (हार्वेस्टिंग - समय, विधि, ग्रेडिंग, सॉर्टिंग, पैकिंग), भंडारण (स्टोरेज - प्रशीतन, कोल्ड स्टोरेज, कंट्रोल्ड एटमॉस्फियर स्टोरेज, मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग), कीट और रोग प्रबंधन, पोषण (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, बोरॉन, कॉपर) और आर्थिक पहलुओं (एकॉनॉमिक्स - बाजार, मूल्य निर्धारण, निर्यात, आयात, वैश्विक व्यापार) का उद्यानिकी (हॉर्टीकल्चर) अध्ययन है। पोमोलॉजी फलों के पेड़ों की छंटाई (प्रूनिंग) (आर्किटेक्चर, फल कलियों का विकास, विकास नियंत्रण), सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर, फरो), परागण (परागणकर्ता - मधुमक्खियाँ, भौंरे, हवा), और पोस्ट-हार्वेस्ट फिजियोलॉजी (फल पकने का जैव रसायन, एथिलीन उत्पादन, श्वसन, पानी का नुकसान, ठंड की चोट, विघटन) पर केंद्रित है।
- सेरीकल्चर (Sericulture) रेशम कीट (बॉम्बिक्स मोरी - शहतूत रेशम कीट) का पालन रेशम (सिल्क) के उत्पादन के लिए करना है, जिसमें शहतूत (मोरस अल्बा) के पेड़ की खेती (शहतूत के पत्ते, रेशम के कीड़ों का एकमात्र भोजन), रेशम कीटों के अंडों (ग्रेन) का ऊष्मायन, लार्वा (कीड़े) का पालन (अलग-अलग उम्र के लिए अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियाँ - तापमान, आर्द्रता, प्रकाश, वेंटिलेशन), कृमियों को शहतूत के पत्ते खिलाना (5 अवस्थाएँ, 25-30 दिन), कूड़ा (पत्ते, गोबर) निपटान, रोग नियंत्रण (प्रोटोजोआ, वायरल, बैक्टीरियल, फंगल रोग, पेब्रिन रोग), कोकून (ककून - रेशमी कोश) का संग्रह, कोकून का वर्गीकरण (रंग, आकार, वजन, गुणवत्ता, बनावट, घनत्व), रेशम के धागे (सिल्क थ्रेड) को निकालने के लिए कोकून को गर्म पानी (रेलिंग) में डुबाना, एक साथ कई कोकून के तंतुओं को मिलाकर रेशम का धागा (सिल्क यार्न) बनाना, और रेशम के कपड़े (फैब्रिक) बुनने (वीविंग) या बिना बुने अन्य उत्पादों (नॉनवोवेन) में बदलने की प्रक्रियाएँ शामिल हैं। सेरीकल्चर एक श्रम-गहन उद्योग है जो कृषि-आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं (चीन, भारत, ब्राजील, उज़्बेकिस्तान, थाईलैंड, वियतनाम) में रोजगार और आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- सेरोलॉजी (Serology) रक्त सीरम (ब्लड सीरम - रक्त का वह भाग जो थक्का बनने के बाद बचता है; प्लाज्मा से फाइब्रिनोजेन और थक्के कारकों को हटाने के बाद प्राप्त तरल) और इसकी प्रतिरक्षी गुणों (इम्यूनोलॉजिकल प्रॉपर्टीज़) का अध्ययन है, जिसमें एंटीबॉडी (एंटीबॉडीज - प्रतिरक्षी प्रोटीन जो विशिष्ट एंटीजन को पहचानते और बांधते हैं), एंटीजन (एंटीजन्स - सतह के अणु जो प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करते हैं) और नैदानिक परीक्षणों (डायग्नोस्टिक टेस्ट्स - रक्त प्रकारण (ब्लड टाइपिंग) - एबीओ और आरएच सिस्टम, क्रॉस-मैचिंग, संक्रामक रोगों (एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी, सिफलिस, मलेरिया, डेंगू, लाइम रोग, कोविड-19) के लिए सीरोलॉजिकल टेस्ट, एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनोसॉर्बेंट परख (एलिसा), वेस्टर्न ब्लॉट, इम्यूनोफ्लोरेसेंस, कॉम्प्लीमेंट फिक्सेशन, रक्त के थक्के परीक्षण, ऑटोइम्यून बीमारियों (रूमेटाइड फैक्टर, एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी) और गर्भावस्था परीक्षण (मानव कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन - एचसीजी) का अध्ययन शामिल है। सेरोलॉजी चिकित्सा (रोग निदान, रक्त आधान, प्रतिरक्षण, एलर्जी परीक्षण, ऑटोइम्यूनिटी, कैंसर बायोमार्कर), फोरेंसिक विज्ञान (अपराध स्थल पर रक्त के नमूनों की पहचान, पितृत्व परीक्षण, डीएनए प्रोफाइलिंग) और पशु चिकित्सा में महत्वपूर्ण है।
- वर्मीकल्चर (Vermiculture) केंचुओं (अर्थवर्म्स - आइसेनिया फेटिडा (रेड विग्लर), यूड्रिलस यूजिनी (अफ्रीकी नाइटक्रॉलर), पेरियोनिक्स एक्सकैवेटस (भारतीय नीला केंचुआ), लुम्ब्रिकस रूबेलस (लाल केंचुआ)) का उपयोग करके जैविक कचरे (ऑर्गेनिक वेस्ट - रसोई के छिलके (सब्जी, फल), फलों के छिलके, कॉफी के मैदान, चाय की पत्तियाँ, अंडे के छिलके, पौधों के अवशेष, कागज, गत्ता, घास, पत्तियाँ, खाद, गोबर, कीचड़, खरपतवार, शैवाल) को पोषक तत्वों से भरपूर खाद (वर्मीकम्पोस्ट) में बदलने की प्रक्रिया है। केंचुए कचरे को निगलते हैं, उसे अपने पाचन तंत्र से गुजारते हैं, और केंचुआ खाद (कास्टिंग्स) नामक समृद्ध, काली, दानेदार, गंधहीन सामग्री का उत्सर्जन करते हैं। वर्मीकम्पोस्ट में नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी), पोटैशियम (के), कैल्शियम (सीए), मैग्नीशियम (एमजी), सल्फर (एस), आयरन (फे), मैंगनीज (एमएन), जिंक (जेडएन), कॉपर (सीयू) और लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं, जो मृदा की संरचना, जल धारण क्षमता, वातन, और पौधों के पोषण में सुधार करते हैं। वर्मीकल्चर अपशिष्ट प्रबंधन (कचरे को कम करना, पुनर्चक्रण), जैविक खेती (वर्मीकम्पोस्ट एक उत्कृष्ट प्राकृतिक उर्वरक है), मृदा उपचार (बायोरेमेडिएशन - भारी धातुओं, कीटनाशकों, हाइड्रोकार्बन को कम करना) और मछली पालन (केंचुओं का उपयोग मछली के चारे के रूप में) में महत्वपूर्ण है।
- वायरोलॉजी (Virology) वायरसों (वायरस - अकोशिकीय, अनिवार्य अंतःकोशिकीय परजीवी जो केवल जीवित कोशिकाओं के अंदर ही प्रतिकृति बना सकते हैं) की संरचना (जीनोम - डीएनए या आरएनए, एकल-फंसे या दोहरे-फंसे; कैप्सिड, एनवेलप, स्पाइक प्रोटीन, पोलिमरेज़, रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज), प्रतिकृति (लाइटिक चक्र, लाइसोजेनिक चक्र, प्रतिकृति की रणनीतियाँ), वर्गीकरण (बाल्टीमोर वर्गीकरण - जीनोम प्रकार पर आधारित 7 समूह; डीएनए वायरस, आरएनए वायरस, रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज वायरस), रोग (रोग - फ्लू - इन्फ्लूएंजा, सर्दी - राइनोवायरस, कोरोनावायरस, एड्स - एचआईवी, हेपेटाइटिस - हेपेटाइटिस बी, सी, खसरा, रूबेला, चेचक, पोलियो, डेंगू, जीका, ईबोला, मारबर्ग, हर्पीस, चिकनगुनिया, एन्सेफलाइटिस), जैव प्रौद्योगिकी (वायरल वैक्टर - जीन थेरेपी, टीके, ऑन्कोलिटिक वायरस, फेज थेरेपी, वायरल नैनोकण), और उनकी मेजबान कोशिकाओं के साथ बातचीत (प्रवेश, अनकोटिंग, प्रतिलेखन, अनुवाद, असेंबली, प्रस्थान, मेजबान प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, एंटीवायरल दवाएँ, प्रतिरोध, लंबे समय तक संक्रमण, ट्यूमरजेनेसिस) का अध्ययन है। वायरोलॉजी चिकित्सा (रोगों का निदान, रोकथाम, उपचार - टीके, एंटीवायरल दवाएँ, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, इंटरफेरॉन), पशु चिकित्सा, कृषि (पौधों के वायरल रोग), पारिस्थितिकी (वायरल पारिस्थितिकी - समुद्री, मृदा, वायु, जल, चरम वातावरण में वायरस, वायरल जीनोमिक्स, पैलियोविरोलॉजी) और जैव प्रौद्योगिकी (फेज थेरेपी, वैक्सीन विकास, वायरल वैक्टर - एडेनोवायरस, एएवी, लेंटीवायरस, रेट्रोवायरस) में महत्वपूर्ण है।
- जूलॉजी / जंतु विज्ञान (Zoology) जीवित और विलुप्त जंतुओं (एनिमल्स - प्रोटोजोआ, पोरिफेरा, नाइडेरिया, प्लैटिहेल्मिन्थेस, नेमाटोडा, एनेलिडा, मोलस्का, आर्थ्रोपोडा, इकिनोडर्मेटा, हेमीकोर्डेटा, कोर्डेटा - मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिसमें उनकी संरचना (शरीररचना - एनाटॉमी), व्यवहार (इथोलॉजी), विकास (भ्रूणविज्ञान), वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी), वितरण (बायोग्राफी), विकास (इवोल्यूशनरी बायोलॉजी - फाइलोजेनी, प्राकृतिक चयन, अनुकूलन, विलुप्ति), पारिस्थितिकी (एनिमल इकोलॉजी - आबादी गतिशीलता, समुदाय संरचना, खाद्य जाल, परभक्षण, परजीवीवाद, सहजीवन, मैला ढोने वाला, प्रतिस्पर्धा), और शरीर क्रिया विज्ञान (फिजियोलॉजी) शामिल हैं। जंतु विज्ञान (ज़ूलॉजी) वनस्पति विज्ञान (बॉटनी) के समकक्ष है, और इसके कई उप-विषय हैं: एंटोमोलॉजी (कीट), इक्थियोलॉजी (मछलियाँ), हर्पेटोलॉजी (सरीसृप और उभयचर), ऑर्निथोलॉजी (पक्षी), मैमोलॉजी (स्तनधारी), प्रोटोजूलॉजी (प्रोटोजोआ), पैरासिटोलॉजी (परजीवी), मरीन बायोलॉजी, पेलियोज़ूलॉजी (जीवाश्म जंतु)। जंतु विज्ञान के जनक अरस्तू (अरस्तू - 384-322 ईसा पूर्व) को माना जाता है, जिन्होंने लगभग 500 प्रजातियों का वर्गीकरण किया।