जैव विकास
- जैव विकास (जैविक विकास) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रजातियाँ (जीवों के समूह) समय के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदलती हैं, जिससे नई प्रजातियाँ उत्पन्न होती हैं। यह परिवर्तन आनुवंशिक (डीएनए) स्तर पर उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन, आनुवंशिक बहाव और जीन प्रवाह के कारण होता है। विकास ही पृथ्वी पर जीवन की विविधता (लगभग 1 करोड़ प्रजातियाँ) का आधार है।
- चार्ल्स डार्विन (चार्ल्स डार्विन) ने 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज" (On the Origin of Species) में प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) का सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रकृति में संसाधनों (भोजन, स्थान) के लिए प्रतिस्पर्धा होती है, और जिन जीवों में पर्यावरण के अनुकूल लक्षण (अनुकूलन) होते हैं, उनके जीवित रहने और प्रजनन (प्रजनन सफलता) की संभावना अधिक होती है। ये अनुकूल लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो जाते हैं, जिससे प्रजातियों में परिवर्तन आता है।
- जीन बैप्टिस्ट लैमार्क (जीन बैप्टिस्ट लैमार्क) ने विकास का "उपयोग और अनुपयोग" (Use and Disuse) का सिद्धांत प्रस्तावित किया (1809)। उनके अनुसार, जिन अंगों का जीव अधिक उपयोग करता है, वे अधिक विकसित हो जाते हैं (उदाहरण: जिराफ की गर्दन), और ये अर्जित लक्षण (अर्जित लक्षण) अगली पीढ़ी को हस्तांतरित हो जाते हैं। यह सिद्धांत अब स्वीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि आनुवंशिक अध्ययन बताते हैं कि अर्जित लक्षण (जैसे, मांसपेशियाँ) विरासत में नहीं मिलते (वीस्मान का प्रयोग - चूहों की पूंछ काटना)।
- जीवाश्म (फॉसिल्स) प्राचीन जीवों के अवशेष (हड्डियाँ, खोल, पत्तियाँ) या उनकी छाप हैं, जो चट्टानों में संरक्षित होते हैं। ये विकास के सबसे ठोस साक्ष्य (जीवाश्म साक्ष्य) प्रदान करते हैं क्योंकि ये दिखाते हैं कि अतीत में सरल जीव रहते थे, फिर जटिल जीव विकसित हुए, और कई प्रजातियाँ (जैसे, डायनासोर, ट्रिलोबाइट्स, डोडो पक्षी) विलुप्त हो गईं। जीवाश्मों का क्रमिक स्तरों (स्ट्रेटा) में अध्ययन (पेलियोन्टोलॉजी) विकास का ऐतिहासिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करता है।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) का सार "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" (योग्यतम की उत्तरजीविता) है, जिसे हरबर्ट स्पेंसर ने प्रतिपादित किया। "योग्यतम" (फिटेस्ट) का अर्थ केवल शारीरिक रूप से मजबूत होना नहीं है, बल्कि वह जीव जो अपने पर्यावरण में सबसे अच्छी तरह से अनुकूलित हो और सबसे अधिक व्यवहार्य संतान उत्पन्न करता हो। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती है और लाखों वर्षों में प्रजातियों को बदल देती है।
- उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) डीएनए (आनुवंशिक पदार्थ) के अनुक्रम में अचानक, स्थायी और यादृच्छिक परिवर्तन हैं। ये परिवर्तन विकिरण (UV, एक्स-रे), रसायन (म्यूटाजेन) या प्रतिकृति त्रुटियों के कारण हो सकते हैं। उत्परिवर्तन आनुवंशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी) का प्राथमिक स्रोत हैं, जो प्राकृतिक चयन के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं। अधिकांश उत्परिवर्तन हानिकारक या तटस्थ होते हैं, लेकिन कुछ लाभकारी भी हो सकते हैं (जैसे, जीवाणुओं में एंटीबायोटिक प्रतिरोध)।
- होमोलॉगस अंग (समजात अंग) वे अंग हैं जिनकी संरचनात्मक योजना (हड्डियों की संरचना, मांसपेशियों की व्यवस्था) समान होती है, लेकिन उनके कार्य भिन्न होते हैं। उदाहरण: मनुष्य का हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का फ्लिपर और बिल्ली का अगला पैर। ये अंग एक सामान्य पूर्वज (कॉमन एंसेस्टर) से उत्पन्न हुए हैं और अलग-अलग वातावरण में अनुकूलन के कारण उनके कार्य अलग-अलग हो गए, जिसे "अपसारी विकास (डाइवर्जेंट इवोल्यूशन)" कहते हैं।
- एनालॉगस अंग (समरूप अंग) वे अंग हैं जिनकी उत्पत्ति (भ्रूणीय विकास या संरचना) भिन्न होती है, लेकिन वे समान कार्य (फंक्शन) करते हैं। उदाहरण: पक्षी का पंख और कीट का पंख (दोनों उड़ान के लिए, लेकिन संरचना में मूलभूत अंतर), मछली का गलफड़ा और झींगा मछली का गलफड़ा। यह "अभिसारी विकास (कन्वर्जेंट इवोल्यूशन)" का परिणाम है, जहाँ असंबंधित प्रजातियाँ समान पर्यावरणीय परिस्थितियों में समान समस्याओं का समाधान समान तरीके से करती हैं।
- डार्विन की पुस्तक का पूरा नाम "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाई मीन्स ऑफ नेचुरल सिलेक्शन" (On the Origin of Species by Means of Natural Selection) है, जो 24 नवंबर, 1859 को प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में डार्विन ने प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के साथ विकास के लिए विस्तृत साक्ष्य (जीवाश्म, भौगोलिक वितरण, तुलनात्मक शारीरिकी) प्रस्तुत किए, जिसने जीव विज्ञान में क्रांति ला दी और वैज्ञानिक सोच को मौलिक रूप से बदल दिया।
- आनुवंशिक बहाव (जेनेटिक ड्रिफ्ट) छोटी आबादी (स्मॉल पॉपुलेशन) में जीन आवृत्तियों (एलील आवृत्तियों) में यादृच्छिक (अनुमानित नहीं) परिवर्तन है, जो संयोग (चांस) के कारण होता है। यह प्राकृतिक चयन से स्वतंत्र है और इसका जीवों की अनुकूलन क्षमता से कोई संबंध नहीं है। "बॉटलनेक इफेक्ट" (जनसंख्या में अचानक कमी) और "फाउंडर इफेक्ट" (नई आबादी का कुछ व्यक्तियों द्वारा स्थापित होना) आनुवंशिक बहाव के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) विकास का अंतिम परिणाम है, जिसमें एक प्रजाति से दो या अधिक नई प्रजातियाँ उत्पन्न होती हैं। यह तब होता है जब एक प्रजाति की आबादी के बीच प्रजनन अलगाव (रिप्रोडक्टिव आइसोलेशन) हो जाता है, जिसके कारण वे आपस में प्रजनन नहीं कर पाते और अलग-अलग दिशाओं में विकसित होते हैं। प्रजनन अलगाव भौगोलिक (पर्वत, नदी, महासागर - एलोपैट्रिक स्पीशिएशन) या पारिस्थितिकीय/व्यवहारिक (सिम्पैट्रिक स्पीशिएशन - पॉलीप्लॉयडी, आवास विभेदन) हो सकता है।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) विकास का ऐतिहासिक साक्ष्य है, जो दर्शाता है कि जीवन सरल एककोशिकीय जीवों से शुरू हुआ, फिर जटिल बहुकोशिकीय जीव, अकशेरुकी, मछलियाँ, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी विकसित हुए। यह रिकॉर्ड संक्रमणकालीन जीवाश्म (ट्रांज़िशनल फॉसिल्स) भी प्रदान करता है, जैसे आर्कियोप्टेरिक्स (सरीसृप और पक्षी के बीच की कड़ी), जो प्रजातियों के बीच विकासवादी संबंध दिखाते हैं।
- समान प्रजातियाँ (रिलेटेड स्पीशीज) एक सामान्य पूर्वज (कॉमन एंसेस्टर) से उत्पन्न होती हैं। इस सिद्धांत को "कॉमन डिसेंट" (Common Descent) कहते हैं, जो डार्विन के विकास सिद्धांत का एक केंद्रीय बिंदु है। सभी जीव, चाहे वे बैक्टीरिया हों या मनुष्य, पृथ्वी पर जीवन के आदिम रूप से उत्पन्न हुए हैं और एक विशाल विकासवादी वृक्ष (Evolutionary Tree) के माध्यम से जुड़े हुए हैं।
- अनुकूलन (एडाप्टेशन) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने पर्यावरण (जलवायु, भोजन, शिकारी, साथी) के अनुरूप संरचनात्मक (जैसे, छलावरण, तेज दौड़ने वाले पैर), शारीरिक (जैसे, मरुस्थल में कम पानी में जीवित रहना), या व्यवहारिक (जैसे, प्रवास, शीतनिद्रा) लक्षण विकसित करता है। अनुकूलन प्राकृतिक चयन का परिणाम है, क्योंकि बेहतर अनुकूलित जीवों के जीवित रहने और प्रजनन की संभावना अधिक होती है।
- डीएनए (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) अनुक्रम विकास के आनुवंशिक साक्ष्य हैं। दो प्रजातियों के डीएनए अनुक्रम जितने अधिक समान होते हैं, वे उतने ही अधिक निकट से संबंधित होती हैं और उनका सामान्य पूर्वज उतना ही हालिया होता है। उदाहरण: मनुष्य और चिंपैंजी का डीएनए लगभग 98-99% समान है। आणविक घड़ी (मॉलिक्यूलर क्लॉक) के सिद्धांत का उपयोग यह अनुमान लगाने के लिए किया जाता है कि दो प्रजातियाँ कब अलग हुईं।
- भ्रूणीय समानता (एम्ब्रियोलॉजिकल एविडेंस) विकास का एक प्रबल साक्ष्य है। विभिन्न कशेरुकी प्रजातियों (मनुष्य, मुर्गी, मछली, सैलामैंडर) के प्रारंभिक भ्रूण (एम्ब्रियो) एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते होते हैं, जिनमें गलफड़े के स्लिट (गलफड़े की दरारें) और पूंछ जैसी संरचनाएँ होती हैं। यह समानता दर्शाती है कि ये सभी प्रजातियाँ एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुई हैं, और विकास के दौरान उनके विकास पथ (डेवलपमेंटल पाथवे) अलग-अलग हो गए।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) पर्यावरणीय दबाव (एनवायर्नमेंटल प्रेशर) पर आधारित है। ये दबाव जलवायु (तापमान, वर्षा), संसाधनों की उपलब्धता (भोजन, पानी), शिकारियों की उपस्थिति, बीमारियाँ, और अन्य जीवों (प्रतियोगी, परजीवी) से उत्पन्न होते हैं। पर्यावरण बदलने पर, चयन का दबाव भी बदल जाता है, जिसके कारण आबादी में अलग-अलग लक्षण अनुकूल हो जाते हैं।
- लैमार्क का सिद्धांत (लैमार्किज्म) अर्जित लक्षणों (अर्जित लक्षण) के वंशागति पर केंद्रित है। उनका प्रसिद्ध उदाहरण जिराफ है: जिराफ ने ऊंची पत्तियों तक पहुँचने के लिए अपनी गर्दन खींची, उसका उपयोग किया, और वह लंबी हो गई, फिर यह अर्जित लंबाई उसकी संतानों को मिल गई। यह सिद्धांत गलत साबित हुआ जब वीस्मान (Weismann) ने चूहों की पूंछ काटकर प्रयोग किया, जिसमें अगली पीढ़ियों के चूहों की पूंछ नहीं कटी थी।
- जीवों का भौगोलिक वितरण (बायोग्राफी) विकास को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, डार्विन ने गैलापागोस द्वीप समूह पर देखा कि प्रत्येक द्वीप के फिंच पक्षियों की चोंच के आकार और आकृति अलग-अलग थी, जो उस द्वीप पर उपलब्ध भोजन के प्रकार (बीज, कीड़े, कैक्टस) के अनुसार अनुकूलित थी। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले मार्सुपियल्स (धानीदार जीव - कंगारू, कोआला) अन्य महाद्वीपों से अलग-अलग विकसित हुए, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया लंबे समय तक भौगोलिक रूप से पृथक था।
- अनुकूली विकिरण (एडेप्टिव रेडिएशन) वह प्रक्रिया है जिसमें एक एकल पूर्वज प्रजाति से, विभिन्न पारिस्थितिक निचों (इकोलॉजिकल निचेस) में अनुकूलन के कारण कई नई प्रजातियाँ उत्पन्न होती हैं। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण डार्विन के फिंच (गैलापागोस द्वीप) और ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स हैं। यह "विकिरण" तब होता है जब एक प्रजाति नए वातावरण (जैसे, एक द्वीप) में प्रवेश करती है जहाँ प्रतिस्पर्धा कम होती है और विभिन्न प्रकार के संसाधन उपलब्ध होते हैं।
- वेस्टिजियल अंग (अवशेषी अंग) वे अंग हैं जो विकास के अवशेष (रुडिमेंटरी स्ट्रक्चर्स) हैं, अर्थात ये अंग कभी पूर्वजों में कार्यशील थे, लेकिन अब वर्तमान प्रजातियों में उनका कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं है। उदाहरण: मनुष्य का अपेंडिक्स (सीकम), पूंछ की हड्डी (कोक्सिक्स), सांप की अवशेषी टांगें (कुछ सांपों में कूल्हे की हड्डियाँ), व्हेल की अवशेषी श्रोणि (पेल्विक) हड्डियाँ और पिछली टांगों के अवशेष। ये अंग दर्शाते हैं कि वर्तमान प्रजातियाँ अतीत के अन्य जीवों से विकसित हुई हैं।
- प्रजातियों का विलुप्त होना (विलुप्ति) विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा है। पृथ्वी के इतिहास में लगभग 99% प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। विलुप्ति तब होती है जब कोई प्रजाति बदलते पर्यावरण के अनुकूल होने में विफल हो जाती है (गलत अनुकूलन) या प्रतिस्पर्धा, शिकार, बीमारी, प्राकृतिक आपदाओं (ज्वालामुखी, उल्कापिंड प्रभाव) या मानवीय गतिविधियों (निवास स्थान का विनाश, अतिदोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन) के कारण उसकी पूरी आबादी समाप्त हो जाती है।
- गैलापागोस द्वीप समूह (गैलापागोस आइलैंड्स) डार्विन के लिए विकास सिद्धांत के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। 1835 में एचएमएस बीगल (HMS Beagle) यात्रा के दौरान उन्होंने यहाँ के फिंच पक्षियों (फिंच बर्ड्स), कछुओं (गैलापागोस टॉरटोइज़), और इगुआना का अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि प्रत्येक द्वीप पर ये जीव थोड़े भिन्न थे, जो द्वीप-विशिष्ट परिस्थितियों (जैसे, भोजन) के अनुकूल थे। इससे उन्हें यह विचार मिला कि प्रजातियाँ स्थिर नहीं हैं, बल्कि समय के साथ बदलती हैं।
- आनुवंशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी) विकास का आधार (रॉ मटेरियल) है, जो एक प्रजाति के भीतर विभिन्न व्यक्तियों में पाए जाने वाले जीनों की विविधता को दर्शाती है। यह विविधता उत्परिवर्तन (म्यूटेशन), यौन प्रजनन (सेक्सुअल रिप्रोडक्शन - जीन पुनर्संयोजन), और जीन प्रवाह (जीन प्रवाह - विभिन्न आबादियों के बीच जीनों का आदान-प्रदान) के कारण उत्पन्न होती है। उच्च आनुवंशिक विविधता वाली आबादी में बदलते पर्यावरण के अनुकूल होने की अधिक संभावना होती है।
- कृत्रिम चयन (आर्टिफिशियल सिलेक्शन) वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य (ह्यूमन) वांछित लक्षणों (जैसे, अधिक दूध देने वाली गाय, मीठे फल, विभिन्न कुत्तों की नस्लें - बुलडॉग, पूडल, जर्मन शेफर्ड) के आधार पर पौधों या जानवरों का प्रजनन करवाते हैं। यह प्राकृतिक चयन के समान है, लेकिन यहाँ चयन का एजेंट मनुष्य है, न कि प्रकृति। डार्विन ने कृत्रिम चयन के उदाहरण (जैसे, कबूतरों की विभिन्न नस्लें) का उपयोग प्राकृतिक चयन की शक्ति को समझाने के लिए किया।
- जीवाश्मों की आयु (फॉसिल डेटिंग) रेडियोमेट्रिक डेटिंग (रेडियोमेट्रिक डेटिंग) से मापी जाती है। यह तकनीक चट्टानों और जीवाश्मों में उपस्थित रेडियोधर्मी समस्थानिकों (आइसोटोप्स, जैसे यूरेनियम-238, पोटैशियम-40, कार्बन-14) के क्षय को मापती है। कार्बन-14 डेटिंग 50,000 वर्ष पुराने कार्बनिक पदार्थों के लिए उपयोगी है, जबकि यूरेनियम-लीड डेटिंग अरबों वर्ष पुरानी चट्टानों के लिए। यह विधि विकास के समय को निर्धारित करने में सहायक है।
- सह-विकास (को-इवोल्यूशन) वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक प्रजातियाँ एक-दूसरे को पारस्परिक रूप से प्रभावित करते हुए एक साथ विकसित होती हैं। उदाहरण: फूलों के पौधे और उनके परागणकर्ता (मधुमक्खी, तितली, चमगादड़, हमिंगबर्ड) - फूल अमृत (नेक्टर) प्रदान करते हैं, और परागणकर्ता परागण (पोलिनेशन) करते हैं। दूसरा उदाहरण: परजीवी (जैसे, टेपवर्म, मलेरिया परजीवी) और उनके मेजबान (जैसे, मानव, पशु) - दोनों एक-दूसरे के विकास को चलाते हैं।
- डार्विन का सिद्धांत (डार्विनिज्म) पूरी तरह से प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) पर आधारित है, न कि उपयोग और अनुपयोग या आंतरिक प्रेरणा पर। इस सिद्धांत के मुख्य बिंदु हैं: (i) अति-जनन (ओवरप्रोडक्शन) - सभी जीव अपनी क्षमता से अधिक संतान पैदा करते हैं, (ii) जनसंख्या में भिन्नता (वेरिएशन) - सभी व्यक्ति आनुवंशिक रूप से भिन्न होते हैं, (iii) संघर्ष (स्ट्रगल) - सीमित संसाधनों के कारण प्रतिस्पर्धा होती है, (iv) प्राकृतिक चयन (नेचुरल सिलेक्शन) - अनुकूल लक्षण वाले जीव जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं, (v) वंशागति (हेरिटेबिलिटी) - ये अनुकूल लक्षण अगली पीढ़ी को मिलते हैं।
- उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) डीएनए में परिवर्तन (डीएनए में परिवर्तन) लाता है, जो एक जीन के न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम (ए, टी, जी, सी) को बदल सकता है। यह परिवर्तन एक एकल न्यूक्लियोटाइड (बिंदु उत्परिवर्तन - पॉइंट म्यूटेशन) से लेकर गुणसूत्र के एक बड़े हिस्से (विलोपन - डिलीशन, दोहराव - डुप्लिकेशन, उत्क्रमण - इन्वर्जन, स्थानान्तरण - ट्रांसलोकेशन) तक हो सकता है। उत्परिवर्तन ही अंततः नए एलील (जीन के रूप) और नए लक्षणों का स्रोत है।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) में प्रजनन अलगाव (रिप्रोडक्टिव आइसोलेशन) अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रजनन अलगाव के कारण नई प्रजातियाँ बनती हैं क्योंकि एक बार जब दो आबादियाँ आपस में प्रजनन नहीं कर सकतीं, तो वे अलग-अलग दिशाओं में विकसित (जीन पूल अलग हो जाता है) हो जाती हैं। प्रजनन अलगाव दो प्रकार के होते हैं: पूर्व-युग्मक (प्री-ज़ाइगोटिक - आवास, व्यवहार, यांत्रिक, काल) और उत्तर-युग्मक (पोस्ट-ज़ाइगोटिक - संकर की अव्यवहार्यता/बाँझपन, जैसे खच्चर)।
- होमोलॉगस संरचनाएँ (समजात संरचनाएँ) सामान्य पूर्वज (कॉमन एंसेस्टर) को दर्शाती हैं, भले ही उनके कार्य अलग-अलग हों। यह "अपसारी विकास (डाइवर्जेंस)" का उदाहरण है। उदाहरण: मानव का हाथ, चमगादड़ का पंख, व्हेल का फ्लिपर और घोड़े का अगला पैर - इन सभी में ह्यूमरस (ऊपरी बांह की हड्डी), रेडियस (त्रिज्या) और अलना (उल्ना), कार्पल्स (कलाई की हड्डियाँ), मेटाकार्पल्स और फालेंजेस (उंगलियों की हड्डियाँ) की मूल संरचना समान होती है।
- एनालॉगस संरचनाएँ (समरूप संरचनाएँ) समान कार्य (कार्यात्मक समानता) करती हैं, लेकिन उनकी आंतरिक संरचना और विकासात्मक उत्पत्ति भिन्न होती है। यह "अभिसारी विकास (कन्वर्जेंस)" का उदाहरण है। उदाहरण: पक्षी का पंख (हड्डियों और पंखों से बना) और तितली का पंख (काइटिन और मेम्ब्रेन से बना) - दोनों उड़ने के लिए, लेकिन पूरी तरह से अलग-अलग तरीकों से विकसित हुए।
- विकास (इवोल्यूशन) में पर्यावरणीय बदलाव (पर्यावरणीय परिवर्तन) एक महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति है। जब पर्यावरण (जलवायु, वनस्पति, सूक्ष्मजीव, आदि) बदलता है, तो प्राकृतिक चयन का दबाव भी बदल जाता है। इस नए दबाव के जवाब में, आबादी में वे लक्षण अनुकूल हो जाते हैं जो नई परिस्थितियों में जीवित रहने में सहायक होते हैं। इस प्रकार, पर्यावरणीय परिवर्तन विकास की दिशा निर्धारित करता है। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन वर्तमान में कई प्रजातियों के लिए एक गंभीर खतरा है।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) में संक्रमणकालीन रूप (ट्रांज़िशनल फॉर्म्स) पाए जाते हैं, जो दो प्रजाति समूहों के बीच के अंतर को पाटते हैं। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) - एक जीवाश्म जिसमें सरीसृप (दांत, लंबी हड्डी वाली पूंछ, पंजे वाले पंख) और पक्षी (पंख) दोनों के लक्षण थे, जो सरीसृपों और पक्षियों के बीच की कड़ी को दर्शाता है। अन्य उदाहरणों में टिक्टालिक (Tiktaalik - मछली और उभयचर के बीच की कड़ी) शामिल हैं।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) में अनुकूल (फेवरेबल) लक्षण (ट्रेट्स) पीढ़ियों में बढ़ते हैं, जबकि प्रतिकूल (अनफेवरेबल) लक्षण कम होते जाते हैं। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए, एक कीट आबादी में, कीटनाशक के प्रति प्रतिरोधी जीन वाले कीट ही कीटनाशक छिड़कने के बाद जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं, जिससे अगली पीढ़ी में प्रतिरोधी जीन की आवृत्ति बढ़ जाती है।
- लैमार्क का सिद्धांत (लैमार्किज्म) आज वैज्ञानिक रूप से स्वीकार नहीं है (नॉट एक्सेप्टेड), क्योंकि बाद के आनुवंशिक प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया कि "अर्जित लक्षण" (जीव के जीवनकाल में विकसित हुए लक्षण, जैसे कि वजन उठाने से बनी मांसपेशियाँ) विरासत में नहीं मिलते हैं। डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत, जिसे बाद में आनुवंशिकी (मेंडल, वाटसन और क्रिक) ने समर्थन दिया, ने लैमार्क के सिद्धांत को प्रतिस्थापित कर दिया।
- विकास (इवोल्यूशन) में समय की लंबी अवधि (ज्यादा समय) शामिल है - यह लाखों वर्षों में होने वाली एक धीमी प्रक्रिया है (हालाँकि "पंकचुएटेड इक्विलिब्रियम" सिद्धांत तीव्र विकास की अवधियों को भी स्वीकार करता है)। उदाहरण के लिए, मानव वंश (होमो सेपियन्स) लगभग 6-7 मिलियन वर्ष पहले चिंपैंजी के वंश से अलग हुआ था। जीवन पृथ्वी पर लगभग 3.5 अरब वर्ष पहले प्रकट हुआ था।
- डार्विन के फिंच पक्षी (डार्विन्स फिंचेस) प्राकृतिक चयन और अनुकूली विकिरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन सभी 14 प्रजातियों का मूल एक ही सामान्य पूर्वज था जो दक्षिण अमेरिका से गैलापागोस द्वीपों पर पहुँचा। विभिन्न द्वीपों पर उपलब्ध भोजन (बीज, कीड़े, कैक्टस फूल) के अनुसार, प्राकृतिक चयन ने उनकी चोंच (बीज कुचलने वाली मोटी चोंच, कीट पकड़ने वाली पतली चोंच) के आकार और आकृति को अलग-अलग दिशाओं में आकार दिया।
- आनुवंशिक बहाव (जेनेटिक ड्रिफ्ट) में संयोग (यादृच्छिकता) अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर छोटी आबादियों में। इसमें, एक एलील (जीन का रूप) संयोगवश अगली पीढ़ी में पहुँच सकता है या नहीं भी, भले ही वह अनुकूल हो या नहीं। "बॉटलनेक इफेक्ट" (प्राकृतिक आपदा के बाद बचे कुछ व्यक्तियों की जीन आवृत्ति) और "फाउंडर इफेक्ट" (कुछ व्यक्तियों द्वारा नई आबादी बसाना) इसके उदाहरण हैं।
- अनुकूलन (एडाप्टेशन) जीवों को उनके वातावरण में जीवित रहने और प्रजनन करने में मदद करता है। यह संरचनात्मक (जैसे, पक्षियों की खोखली हड्डियाँ, मछलियों के गलफड़े, पौधों के काँटे), शारीरिक (जैसे, ऊँट का कूबड़ में वसा संग्रहित करना, मरुस्थलीय पौधों का मोटा क्यूटिकल), या व्यवहारिक (जैसे, पक्षियों का प्रवास, जानवरों का शीतनिद्रा, मधुमक्खियों का नृत्य) हो सकता है। असंगत अनुकूलन (जैसे, मोर की भारी पूंछ) शिकारी को आकर्षित कर सकता है, लेकिन यह यौन चयन (सेक्शुअल सिलेक्शन) के कारण बना रहता है क्योंकि यह साथी को स्वास्थ्य का संकेत देता है।
- वेस्टिजियल अंगों (अवशेषी अंगों) का एक प्रमुख उदाहरण मानव का अपेंडिक्स (अपेंडिक्स) है, जो एक छोटी, कीड़े के आकार की थैली है जो बड़ी आंत (कोलोन) की शुरुआत में स्थित होती है। यह हमारे शाकाहारी पूर्वजों (जो पौधे का सेल्यूलोज पचाते थे) के एक बड़े सीकम (सेकम) का अवशेष है। अब मनुष्य में इसका कोई पाचन कार्य नहीं है (हालाँकि यह प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए एक भंडार हो सकता है, लेकिन इसके बिना भी मनुष्य जीवित रह सकता है)।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) भौगोलिक अलगाव (जियोग्राफिक आइसोलेशन) से हो सकता है, जिसे एलोपैट्रिक स्पीशिएशन (Allopatric Speciation) कहते हैं। जब किसी प्रजाति की आबादी किसी भौतिक बाधा (पर्वत, नदी, महासागर, रेगिस्तान) से अलग हो जाती है, तो अलग-अलग वातावरण में अनुकूलन के कारण वे आनुवंशिक रूप से भिन्न हो जाती हैं और अंततः प्रजनन रूप से अलग हो जाती हैं, जिससे नई प्रजातियाँ बनती हैं। उदाहरण: ग्रैंड कैन्यन के दोनों ओर पाई जाने वाली गिलहरियों की विभिन्न प्रजातियाँ।
- डीएनए अनुक्रमों (डीएनए सीक्वेंसेस) की तुलना करके हम विकासवादी रिश्तों (इवोल्यूशनरी रिलेशनशिप्स) को समझ सकते हैं। जितने अधिक डीएनए अनुक्रम समान होंगे, दो प्रजातियाँ उतनी ही अधिक निकट से संबंधित होंगी। यह आणविक फाइलोजेनेटिक्स (मॉलिक्यूलर फाइलोजेनेटिक्स) का आधार है। साइटोक्रोम सी (साइटोक्रोम सी) नामक प्रोटीन का डीएनए अनुक्रम मनुष्यों और चिंपैंजी में लगभग समान है, जबकि मनुष्यों और खमीर में यह काफी भिन्न है, जो उनकी विकासवादी दूरी को दर्शाता है।
- भ्रूणीय समानता (एम्ब्रियोलॉजिकल एविडेंस) में विभिन्न कशेरुकी (मछली, सैलामैंडर, मुर्गी, मनुष्य) के प्रारंभिक भ्रूण (शुरुआती भ्रूण) में गलफड़े की दरारें (फेरिंजियल स्लिट्स) और पूंछ (टेल) दिखाई देती हैं। ये संरचनाएँ उनके सामान्य जलीय पूर्वज के कार्यशील गलफड़ों और पूंछ के विकासात्मक अवशेष हैं। विकास के दौरान, मछली में ये गलफड़ों में विकसित हो जाती हैं, जबकि मनुष्य में ये मध्य कान और थायरॉयड ग्रंथि के कुछ हिस्सों में बदल जाती हैं।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) में लक्षणों (ट्रेट्स) का चयन किया जाता है, न कि संपूर्ण जीनोम का। प्राकृतिक चयन केवल उन्हीं आनुवंशिक विविधताओं पर कार्य करता है जो किसी जीव की प्रजनन सफलता (प्रजनन सफलता) को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि तटस्थ उत्परिवर्तन (जो फेनोटाइप को प्रभावित नहीं करते) आनुवंशिक बहाव द्वारा आबादी में बने रह सकते हैं।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) में आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) एक प्रसिद्ध संक्रमणकालीन जीवाश्म है, जो सरीसृपों और पक्षियों के बीच की कड़ी को दर्शाता है। यह लगभग 150 मिलियन वर्ष पुराना है (जुरासिक काल)। इसमें सरीसृपों जैसे दांत, लंबी हड्डी वाली पूंछ, और पंजे वाले अग्रपाद (पंख) थे, लेकिन पक्षियों की तरह पंख भी थे। यह दर्शाता है कि पक्षी सरीसृपों (थेरोपॉड डायनासोर) से विकसित हुए हैं।
- अनुकूली विकिरण (एडेप्टिव रेडिएशन) का एक उत्कृष्ट उदाहरण डार्विन के फिंच (डार्विन्स फिंचेस) हैं। एक अन्य उदाहरण ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स (ऑस्ट्रेलियन मार्सुपियल्स) हैं, जैसे कंगारू (Kangaroo), कोआला (Koala), वॉम्बेट (Wombat), और तस्मानियन डेविल (Tasmanian Devil)। सभी एक सामान्य मार्सुपियल पूर्वज से उत्पन्न हुए, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग पारिस्थितिक निचों (घास के मैदान, वन, पेड़) में अनुकूलन के कारण उनके शरीर के आकार, आहार और व्यवहार में विविधता आ गई।
- कृत्रिम चयन (आर्टिफिशियल सिलेक्शन) का एक स्पष्ट उदाहरण गेहूँ की विभिन्न प्रजातियाँ (व्हीट वेरायटीज) हैं। मनुष्य ने हजारों वर्षों में जंगली घास से, बड़े बीज, रोग प्रतिरोध, और अधिक उपज देने वाली गेहूँ की किस्मों का चयन किया और उन्हें विकसित किया। यही प्रक्रिया मक्का (मेक्सिको में टियोसिंटे (Teosinte) घास से), चावल, और सब्जियों (जैसे, जंगली सरसों से ब्रोकोली, फूलगोभी, केल, ब्रसेल्स स्प्राउट्स) के विकास के लिए भी लागू होती है।
- सह-विकास (को-इवोल्यूशन) का सबसे अच्छा उदाहरण मधुमक्खी और फूल (बी एंड फ्लावर) के बीच का संबंध है। फूलों ने मधुमक्खियों को आकर्षित करने के लिए चमकीले रंग, मीठा अमृत (नेक्टर), और विशिष्ट आकार विकसित किए, जबकि मधुमक्खियों ने फूलों से अमृत एकत्र करने के लिए विशेष मुखांग और पराग टोकरियाँ (पोलन बास्केट) विकसित कीं। इस पारस्परिक सह-विकास (म्युचुअलिज्म) ने दोनों पक्षों को लाभान्वित किया है।
- विलुप्त होने (एक्सटिंक्शन) का एक प्रसिद्ध उदाहरण डायनासोर (डायनासोर) हैं, जो लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले (क्रेटेशियस-पैलियोजीन विलुप्ति घटना) एक विशाल क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) के पृथ्वी से टकराने के कारण विलुप्त हो गए। एक अन्य उदाहरण डोडो पक्षी (डोडो बर्ड) है, जो 17वीं शताब्दी में मनुष्यों द्वारा अतिशिकार और उनके द्वारा लाए गए आक्रामक जानवरों (जैसे, सूअर, बिल्लियाँ) के कारण विलुप्त हो गया। ये उदाहरण बताते हैं कि विलुप्ति प्राकृतिक (क्षुद्रग्रह) या मानव-जनित (शिकार, निवास स्थान का विनाश) हो सकती है।
- डार्विन ने प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) को पर्यावरणीय दबावों (एनवायर्नमेंटल प्रेशर्स) से जोड़ा, यह बताते हुए कि प्रकृति प्रतिस्पर्धा (संसाधनों के लिए) और शिकार, बीमारी, जलवायु जैसे कारकों का एक मजबूत दबाव डालती है। यह दबाव ही है जो "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" (सबसे उपयुक्त की उत्तरजीविता) को चलाता है, क्योंकि जो जीव इस दबाव में सबसे अच्छी तरह अनुकूलन कर लेते हैं, वे जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं।
- उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के प्रकारों में जीन दोहराव (जीन डुप्लिकेशन) शामिल है, जहाँ एक जीन के दो या अधिक प्रतियाँ (कॉपी) उत्पन्न हो जाती हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि एक प्रति अपने मूल कार्य को कर सकती है, जबकि दूसरी प्रति उत्परिवर्तित होकर एक नया कार्य विकसित कर सकती है। मानव आँख में प्रकाश संवेदनशील प्रोटीन (ऑप्सिन) कई जीन दोहराव के परिणामस्वरूप विकसित हुए हैं।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) में प्रजनन अलगाव (रिप्रोडक्टिव आइसोलेशन) आवश्यक है, जो पूर्व-युग्मक (प्री-ज़ाइगोटिक) या उत्तर-युग्मक (पोस्ट-ज़ाइगोटिक) हो सकता है। पूर्व-युग्मक अलगाव के उदाहरण: भिन्न आवास (एक ही क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर रहना), भिन्न संभोग काल (एक ही प्रजाति के भिन्न समय पर प्रजनन करना), भिन्न संभोग व्यवहार (अलग-अलग प्रदर्शन करना), या यांत्रिक बाधा (प्रजनन अंगों का मेल न खाना)। उत्तर-युग्मक अलगाव का एक उदाहरण खच्चर (खच्चर) है, जो घोड़े और गधे का संकर है, लेकिन बाँझ (स्टेराइल) होता है।
- होमोलॉगस अंगों (समजात अंगों) का एक स्पष्ट उदाहरण मानव (हाथ), चमगादड़ (पंख), और व्हेल (फ्लिपर) के अग्रपाद हैं। इन तीनों में ह्यूमरस (ऊपरी बांह की हड्डी), रेडियस (त्रिज्या), अलना (उल्ना), कार्पल्स (कलाई की हड्डियाँ), मेटाकार्पल्स और फालेंजेस (उंगलियों की हड्डियाँ) की संरचना समान है। यह समानता एक सामान्य पूर्वज से उनके विकास का पुख्ता सबूत है, भले ही उनके कार्य अलग-अलग हों (पकड़ना, उड़ना, तैरना)।
- एनालॉगस अंगों (समरूप अंगों) का उदाहरण पक्षी का पंख (बर्ड विंग) और कीट का पंख (इंसेक्ट विंग) है। पक्षी का पंख हड्डियों, मांसपेशियों और पंखों से बना होता है, जबकि कीट का पंख काइटिन (चिटिन) की एक झिल्ली होती है। दोनों की विकासात्मक उत्पत्ति पूरी तरह से अलग है, लेकिन दोनों उड़ान का एक ही कार्य करते हैं। यह समान पर्यावरणीय चुनौतियों (उड़ना) के प्रति अभिसारी विकास (कन्वर्जेंट इवोल्यूशन) का परिणाम है।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) में प्राचीन मछलियाँ (एन्शिएंट फिशेस) शामिल हैं, जैसे कि डिकिनोस्टियस (Bothriolepis), जो 380 मिलियन वर्ष पुरानी एक बख्तरबंद मछली है। ये जीवाश्म दर्शाते हैं कि कशेरुकी जीवों की शुरुआत जबड़े रहित (Agnatha) और बख्तरबंद मछलियों से हुई, फिर जबड़े वाली मछलियाँ (Gnathostomata), और फिर मांसल-पंख वाली मछलियाँ (Sarcopterygii) विकसित हुईं, जिनसे अंततः स्थलीय कशेरुकी (टेट्रापोड्स) का विकास हुआ।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) में जीवों का अनुकूलन (ऑर्गेनिज्म्स एडेप्टेशन) होता है, जिसका अर्थ है कि जीव अपने पर्यावरण के अभ्यस्त हो जाते हैं। अनुकूलन हमेशा "पूर्ण" नहीं होता; यह सिर्फ "पर्याप्त रूप से अच्छा" होता है जो प्रजातियों को जीवित रहने और प्रजनन करने की अनुमति देता है। उदाहरण के लिए, मानव की रीढ़ सीधे चलने के लिए पूर्ण रूप से अनुकूलित नहीं है (पीठ दर्द आम है), लेकिन यह पर्याप्त रूप से अच्छा है।
- लैमार्क का सिद्धांत (लैमार्किज्म) पर्यावरणीय प्रभाव (एनवायर्नमेंटल इन्फ्लुएंस) पर आधारित था, अर्थात बदलता पर्यावरण जीवों में परिवर्तन लाता है, और ये परिवर्तन (लैमार्क के अनुसार) विरासत में मिलते हैं। हालाँकि उनका तंत्र (अर्जित लक्षण) गलत था, लेकिन यह विचार कि पर्यावरण विकास को प्रभावित करता है, सही है (जैसा कि डार्विन के प्राकृतिक चयन में दिखाया गया है)। लैमार्क को विकास की अवधारणा (जीव बदलते हैं) को एक सुसंगत सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय दिया जाता है।
- आनुवंशिक बहाव (जेनेटिक ड्रिफ्ट) में आबादी का आकार (पॉपुलेशन साइज़) अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। आनुवंशिक बहाव का प्रभाव छोटी आबादी (स्मॉल पॉपुलेशन) में बहुत अधिक होता है, क्योंकि यादृच्छिक घटनाओं के कारण एक एलील (जीन रूप) के पूरी तरह से समाप्त हो जाने (फिक्सेशन या लॉस) की संभावना अधिक होती है। बड़ी आबादी में, यह प्रभाव नगण्य होता है।
- अनुकूलन (एडाप्टेशन) का एक उदाहरण मरुस्थलीय पौधों (डेजर्ट प्लांट्स) की विशेषताएँ हैं, जैसे कि कैक्टस (Cactus) में: पत्तियाँ काँटों में बदल गई हैं (पानी की कमी को कम करने के लिए वाष्पोत्सर्जन कम करना), तना मोटा और रसीला होता है (पानी संग्रहित करना), और जड़ें उथली लेकिन चौड़ी होती हैं (थोड़ी सी बारिश के पानी को तुरंत सोखना)।
- वेस्टिजियल अंगों (अवशेषी अंगों) का एक और उदाहरण साँपों की अवशेषी टांगें (रुडिमेंटरी लेग्स इन स्नेक्स) हैं, जैसे कि अजगर (Python) और बोआ (Boa) में कूल्हे (श्रोणि) की हड्डियों के अवशेष और छोटी उभरी हुई हड्डियाँ (स्पर्स) होती हैं। ये अवशेष साँपों के चार पैरों वाले सरीसृप पूर्वजों (जैसे, मॉसासोर) से उनके विकास को दर्शाते हैं, जब साँप धीरे-धीरे रेंगने वाले जीवन शैली के लिए अनुकूलित हुए और उनकी टांगों का उपयोग कम होता गया।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) में पॉलीप्लॉयडी (Polyploidy) एक प्रकार का सिम्पैट्रिक स्पीशिएशन (Sympatric Speciation) है, जहाँ बिना भौगोलिक अलगाव के ही नई प्रजातियाँ बन जाती हैं। पॉलीप्लॉयडी का अर्थ है कि एक जीव में गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) के सेट (सेट) की संख्या दोगुनी या अधिक हो जाती है (उदाहरण: टेट्राप्लॉयड - चार सेट)। यह पौधों (जैसे, गेहूँ, स्ट्रॉबेरी, केला, कॉफी, कपास) में आम है, क्योंकि पौधे आत्म-निषेचन कर सकते हैं, और पॉलीप्लॉयड जीव अपने द्विगुणित (डिप्लॉयड) मूल जीव के साथ प्रजनन नहीं कर पाते, इसलिए वे तुरंत एक नई प्रजाति बन जाते हैं।
- डीएनए अनुक्रम (डीएनए सीक्वेंसेस) में प्रोटीन कोडिंग जीन (प्रोटीन कोडिंग जीन्स) वे खंड होते हैं जो प्रोटीन के निर्माण (प्रोटीन सिंथेसिस) के लिए कोड करते हैं। ये जीन विकास के अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयोगी होते हैं, क्योंकि प्रोटीन कोडिंग अनुक्रमों में उत्परिवर्तन अक्सर फेनोटाइप (लक्षण) को प्रभावित करते हैं और प्राकृतिक चयन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि नॉन-कोडिंग डीएनए (जीन्स के बीच का डीएनए) तटस्थ उत्परिवर्तन जमा कर सकता है और विकासवादी दूरी को मापने के लिए उपयोगी होता है।
- भ्रूणीय विकास (एम्ब्रियोनिक डेवलपमेंट) में सभी कशेरुकी (vertebrate) जीवों में समान प्रक्रियाएँ (प्रोसेसेस) होती हैं, जैसे कि गैस्ट्रुलेशन (गैस्ट्रुलेशन - कोशिकाओं का पुनर्व्यवस्थित होना), न्यूरुलेशन (न्यूरल ट्यूब का निर्माण), और फेरिंजियल मेहराब (फेरिंजियल आर्चेस) का विकास। ये समानताएँ बताती हैं कि विकास ने प्राचीन विकासात्मक मार्गों (डेवलपमेंटल पाथवेज) को बरकरार रखा है और उन्हें संशोधित किया है, जिसे "डीप होमोलॉजी" कहते हैं।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) में प्रजनन सफलता (रिप्रोडक्टिव सक्सेस) सबसे महत्वपूर्ण मापदंड है, जिसे "फिटनेस" (Fitness) कहते हैं। फिटनेस का माप केवल किसी जीव के जीवित रहने से नहीं, बल्कि वह कितनी अधिक व्यवहार्य (वायेबल) और उपजाऊ (फर्टाइल) संतान पैदा करता है, से होता है। इसलिए, एक जीव जो लंबे समय तक जीवित रहता है लेकिन कम संतान पैदा करता है, कम फिटनेस वाला होता है, जबकि एक जीव जो थोड़े समय में बहुत अधिक संतान पैदा करता है, उसकी फिटनेस अधिक होती है।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) में प्राचीन सरीसृप (एन्शिएंट रेप्टाइल्स) शामिल हैं, जैसे कि डिमेट्रोडोन (Dimetrodon) (जो वास्तव में एक मैमल-लाइक रेप्टाइल था, डायनासोर नहीं) और आइच्थियोसोर (Ichthyosaur) (एक समुद्री सरीसृप)। ये जीवाश्म सरीसृपों के शुरुआती विकास और विविधता को दर्शाते हैं, जो पर्मियन और ट्राइऐसिक काल में फले-फूले।
- अनुकूली विकिरण (एडेप्टिव रेडिएशन) में डार्विन के फिंच (डार्विन्स फिंचेस) एक प्रमुख उदाहरण हैं। दूसरा उदाहरण सिक्लिड मछलियाँ (सिक्लिड फिशेस) है, विशेष रूप से अफ्रीका की विक्टोरिया झील (लेक विक्टोरिया) में। ये मछलियाँ एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुई हैं और विभिन्न प्रकार के भोजन (प्लवक, कीट लार्वा, घोंघे, शैवाल, यहाँ तक कि अन्य मछलियाँ) के लिए अनुकूलित विभिन्न प्रकार के जबड़े (जॉज़) और खाने की आदतें विकसित कर चुकी हैं।
- कृत्रिम चयन (आर्टिफिशियल सिलेक्शन) में मक्का (कॉर्न/मक्का) की प्रजातियाँ शामिल हैं। जंगली मक्का (Teosinte) के दाने बहुत छोटे, कठोर और कम संख्या में होते थे। मनुष्यों ने हजारों वर्षों में बड़े, मुलायम, मीठे और अधिक दानों वाली किस्मों का चयन किया, जिससे आज की मक्का की फसल विकसित हुई। यह एक जबरदस्त आनुवंशिक परिवर्तन है जो दर्शाता है कि चयन कितना शक्तिशाली हो सकता है।
- सह-विकास (को-इवोल्यूशन) में परजीवी (पैरासाइट) और मेजबान (होस्ट) का संबंध शामिल है। परजीवी अक्सर अपने मेजबान को कमजोर करने से बचने के लिए विकसित होते हैं (कम विषैले बन जाते हैं), जबकि मेजबान परजीवी से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करता है। यह एक शस्त्र-प्रतिस्पर्धा (आर्म्स रेस) है जो दोनों के विकास को चलाती है। उदाहरण: मायक्सोमा वायरस (Myxoma virus) और ऑस्ट्रेलियाई खरगोश (Australian rabbit)।
- विलुप्त होने (एक्सटिंक्शन) में डोडो पक्षी (डोडो बर्ड) एक प्रतिष्ठित उदाहरण है, जो भारतीय महासागर के मॉरीशस द्वीप में पाया जाता था। 17वीं शताब्दी में यूरोपीय नाविकों और उनके द्वारा लाए गए सूअर, बंदर, चूहों और बिल्लियों (आक्रामक प्रजातियाँ) के कारण यह पक्षी तेजी से विलुप्त हो गया। डोडो उड़ान रहित था और उसे इंसानों या नए शिकारियों से कोई खतरा नहीं था, जिसके कारण वह आसानी से शिकार बन गया। यह मानव-जनित विलुप्ति का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
- डार्विन ने पर्यावरणीय दबाव (एनवायर्नमेंटल प्रेशर) पर जोर दिया, अर्थात पर्यावरण (भोजन, जलवायु, शिकारी) ही चयन का एजेंट (Agent) है। यह पर्यावरणीय दबाव ही है जो तय करता है कि कौन से लक्षण "अनुकूल" (फेवरेबल) हैं और कौन से "प्रतिकूल" (अनफेवरेबल) हैं। यदि पर्यावरण बदलता है, तो अनुकूल लक्षण भी बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए, बर्फीले वातावरण में सफेद फर अनुकूल है, लेकिन जंगल में भूरा फर अधिक अनुकूल होता है।
- उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के प्रकारों में जीन विलोपन (जीन डिलीशन) शामिल है, जहाँ एक या अधिक न्यूक्लियोटाइड (जीन के अक्षर) डीएनए से हट जाते हैं। इससे फ्रेमशिफ्ट उत्परिवर्तन (फ्रेमशिफ्ट म्यूटेशन) हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप पूरा जीन पढ़ने का तरीका बदल जाता है और अक्सर एक गैर-कार्यात्मक (नॉन-फंक्शनल) प्रोटीन बनता है। विलोपन बड़े पैमाने पर भी हो सकता है, जहाँ गुणसूत्र (क्रोमोसोम) का एक पूरा हिस्सा हट जाता है।
- प्रजाति निर्माण (स्पीशिएशन) में हाइब्रिडाइजेशन (Hybridization) दो अलग-अलग प्रजातियों के बीच संकरण है। कभी-कभी, संकरण से नई प्रजातियाँ भी बन सकती हैं, खासकर पौधों में (जैसे, ब्रेड व्हीट (Bread wheat) - ट्रिटिकम एस्टिवम - तीन अलग-अलग जंगली घास के संकरण से विकसित हुआ है)। इस प्रक्रिया को "हाइब्रिड स्पीशिएशन" (Hybrid Speciation) कहते हैं।
- होमोलॉगस अंगों (समजात अंगों) में समान विकासात्मक मूल (डेवलपमेंटल ओरिजिन) होता है, अर्थात ये भ्रूणीय विकास (एम्ब्रियोनिक डेवलपमेंट) के दौरान एक ही प्रकार के ऊतकों (टिशू) और संरचनाओं से बनते हैं। उदाहरण के लिए, सभी कशेरुकी (वर्टेब्रेट) अग्रपाद (फोरलिम्ब) समान मूल भ्रूणीय संरचनाओं (लिंब बड्स) से विकसित होते हैं, जो दर्शाता है कि ये सभी एक सामान्य पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं।
- एनालॉगस अंगों (समरूप अंगों) में समान पर्यावरणीय दबाव (सिमिलर एनवायर्नमेंटल प्रेशर्स) समान कार्य के विकास को प्रेरित करते हैं, जिससे असंबंधित जीव समान संरचनाएँ विकसित कर लेते हैं। उदाहरण: डॉल्फिन (स्तनधारी) और शार्क (मछली) का शरीर धारारेखीय (स्ट्रीमलाइन्ड) होता है, जो पानी में तैरने के लिए अनुकूलित है, लेकिन उनकी आंतरिक संरचनाएँ और विकासात्मक उत्पत्ति बिल्कुल भिन्न है।
- जीवाश्म रिकॉर्ड (फॉसिल रिकॉर्ड) में प्राचीन उभयचर (एन्शिएंट एम्फीबियन्स) शामिल हैं, जैसे कि इचथियोस्टेगा (Ichthyostega) और एरियोस (Eryops)। ये जीवाश्म दिखाते हैं कि कैसे मछलियों (मांसल-पंख वाली मछलियों) से उभयचर (चार पैरों वाले स्थलीय कशेरुकी) का विकास हुआ, जो पानी से जमीन पर जीवन के संक्रमण का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें मछली और उभयचर दोनों के लक्षण होते थे (जैसे, मछली जैसी पूंछ लेकिन चार मजबूत पैर)।
- प्राकृतिक चयन (प्राकृतिक चयन) में अनुकूल जीन (फेवरेबल जीन्स) पीढ़ियों में बढ़ते हैं (जीन आवृत्ति बढ़ जाती है) क्योंकि उन जीनों वाले जीवों के जीवित रहने और प्रजनन करने की संभावना अधिक होती है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन के औद्योगिक क्षेत्रों में कालिख से काली हुई पेड़ की छाल पर, काली तितलियाँ (मेलेनिक मॉथ) सफेद तितलियों की तुलना में अधिक छलावरण (कैमोफ्लाज) कर पाती थीं, जिससे काली तितलियों की आवृत्ति बढ़ गई (औद्योगिक कालापन - Industrial Melanism)।
- लैमार्क का सिद्धांत (लैमार्किज्म) पर्यावरणीय अनुकूलन (एनवायर्नमेंटल एडेप्टेशन) पर आधारित था, अर्थात पर्यावरण में परिवर्तन जीवों में परिवर्तन लाता है। हालाँकि लैमार्क का तंत्र (अर्जित लक्षणों की वंशागति) गलत था, उनका यह विचार कि पर्यावरण विकास को चलाता है, पूरी तरह से सही था और डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत में केंद्रीय है। लैमार्क ने यह भी सही कहा था कि विकास एक क्रमिक, लंबी प्रक्रिया है।
- आनुवंशिक बहाव (जेनेटिक ड्रिफ्ट) में संयोगी परिवर्तन (रैंडम चेंजेस) होते हैं, जिसका अर्थ है कि यह प्राकृतिक चयन (Adaptive) की तरह अनुकूली नहीं होता है; यह यादृच्छिक है। एक एलील (जीन रूप) आबादी में बढ़ या घट सकता है, भले ही वह हानिकारक हो या तटस्थ। यही कारण है कि हानिकारक एलील (जैसे, कुछ आनुवंशिक रोग) कभी-कभी छोटी आबादी में उच्च आवृत्ति पर पाए जा सकते हैं (जैसे, एमिश समुदाय में एलिस-वैन क्रेवेल्ड सिंड्रोम)।
- अनुकूलन (एडाप्टेशन) का एक उदाहरण ध्रुवीय भालू (पोलर बियर) की विशेषताएँ हैं: सफेद फर (बर्फ में छलावरण के लिए), काली त्वचा (सूर्य की गर्मी को अवशोषित करने के लिए), मोटी ब्लबर (चमड़े के नीचे वसा की परत - ऊर्जा भंडारण और इन्सुलेशन के लिए), और बालों से ढके पंजे (बर्फ पर फिसलन रोकने और इन्सुलेशन के लिए)। ये सभी अनुकूलन ध्रुवीय भालू को आर्कटिक के अत्यधिक ठंडे वातावरण में जीवित रहने में मदद करते हैं।
- वेस्टिजियल अंगों (अवशेषी अंगों) का एक और उदाहरण मानव की पूंछ की हड्डी (कोक्सिक्स) है, जो एक छोटी, त्रिकोणीय हड्डी है जो रीढ़ के सबसे निचले सिरे पर स्थित होती है। यह हमारे पूर्वजों की पूंछ (टेल) का एक अवशेष है। यह हड्डी आज मनुष्यों में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को नहीं करती है, लेकिन कभी यह संतुलन और गति में मदद करती थी। इसकी उपस्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि मनुष्य का विकास पूंछ वाले जानवरों से हुआ है।