तरंग गति (Wave Motion)
- तरंग गति (wave motion) ऊर्जा का स्थानांतरण बिना पदार्थ हस्तांतरण के होता है – अर्थात तरंगें संचरण के दौरान माध्यम के कणों को विस्थापित तो करती हैं, परंतु वे अपने मूल स्थान पर लौट आते हैं। समुद्र की लहरें एवं ध्वनि तरंगें इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- तरंगें दो प्रकार की होती हैं: अनुदैर्ध्य (longitudinal) और अनुप्रस्थ (transverse) – अनुदैर्ध्य में कणों का कंपन तरंग संचरण की दिशा में होता है, जबकि अनुप्रस्थ में कणों का कंपन तरंग संचरण की दिशा के लंबवत होता है।
- ध्वनि तरंगें (sound waves) अनुदैर्ध्य तरंगों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं – इनमें संपीड़न (compression) एवं विरलन (rarefaction) होता है। ये ठोस, द्रव एवं गैस तीनों माध्यमों में संचरित होती हैं, लेकिन निर्वात में नहीं।
- प्रकाश तरंगें (light waves) अनुप्रस्थ तरंगों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं – इनमें विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र एक-दूसरे के लंबवत दोलन करते हैं। प्रकाश का ध्रुवण (polarization) इस बात का प्रमाण है कि प्रकाश अनुप्रस्थ तरंग है।
- तरंग की गति (wave velocity) v = fλ सूत्र द्वारा व्यक्त की जाती है – जहाँ f = आवृत्ति (frequency) एवं λ = तरंगदैर्घ्य (wavelength) है। किसी निश्चित माध्यम में तरंग का वेग स्थिर होता है, जबकि आवृत्ति एवं तरंगदैर्घ्य परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।
- तरंग की आवृत्ति (frequency) प्रति सेकंड में पूरे हुए चक्रों (चक्रों) की संख्या होती है – इसका मात्रक हर्ट्ज़ (Hz) है। 1 Hz का अर्थ है – 1 चक्र प्रति सेकंड। उच्च आवृत्ति का अर्थ उच्च पिच (ध्वनि) अथवा उच्च ऊर्जा (प्रकाश) होता है।
- तरंगदैर्घ्य (wavelength) दो क्रमिक तरंग-शिखरों (crests) या तरंग-गर्तों (troughs) के बीच की दूरी है – इसे λ (लैम्ब्डा) से व्यक्त किया जाता है। दृश्य प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 400 nm (बैंगनी) से 700 nm (लाल) के मध्य होती है।
- तरंग का आयाम (amplitude) उसकी माध्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन को दर्शाता है – आयाम जितना अधिक होगा, तरंग की ऊर्जा एवं तीव्रता उतनी ही अधिक होगी। ध्वनि में बड़ा आयाम = तेज़ आवाज़; प्रकाश में बड़ा आयाम = अधिक दीप्ति (brightness) ।
- तरंग का काल (time period – T) एक पूर्ण चक्र को पूरा करने में लगा समय होता है – सूत्र T = 1/f (काल = 1/आवृत्ति) । इसका मात्रक सेकंड (s) है। काल एवं आवृत्ति परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं – आवृत्ति बढ़ने पर काल घटता है।
- तरंग का वेग (velocity) माध्यम के गुणों पर निर्भर करता है – जैसे – घनत्व (density), लोच (elasticity), तापमान (temperature) एवं तनाव (tension) । माध्यम बदलने पर तरंग का वेग बदल जाता है, जबकि आवृत्ति स्थिर रहती है।
- ध्वनि तरंगों को गति के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है – ये निर्वात में नहीं चल सकतीं – क्योंकि ध्वनि यांत्रिक तरंगें (mechanical waves) हैं, जिन्हें संचरण के लिए कणों की आवश्यकता होती है। चंद्रमा पर ध्वनि का संचरण नहीं होता, क्योंकि वहाँ निर्वात है।
- हवा (वायु) में ध्वनि की गति लगभग 343 m/s (20°C तापमान पर) होती है – 0°C पर यह 331 m/s होती है। ध्वनि की गति हवा में सबसे कम, जल में मध्यम (≈1480 m/s) एवं ठोस (स्टील में ≈5000 m/s) में सबसे अधिक होती है।
- ध्वनि की गति ठोस (स्टील) में सबसे अधिक होती है – क्योंकि ठोस में कण अत्यधिक निकट होते हैं, जिससे कंपन तीव्रता से संचरित होता है। द्रव (जल) में गति मध्यम एवं गैस (वायु) में न्यूनतम होती है।
- ध्वनि की गति जल में लगभग 1480 m/s होती है, जो वायु से लगभग 4.3 गुना अधिक है – जल का घनत्व वायु से अधिक है, परंतु जल की लोच (bulk modulus) भी अधिक होती है, जिससे ध्वनि तीव्र गति से चलती है।
- ध्वनि की गति तापमान बढ़ने पर बढ़ती है – क्योंकि तापमान बढ़ने पर वायु के अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे कंपन तीव्रता से संचरित होता है। तापमान में प्रत्येक 1°C वृद्धि पर ध्वनि की गति लगभग 0.6 m/s बढ़ जाती है।
- ध्वनि तरंगों की आवृत्ति (श्रव्य सीमा) 20 Hz से 20 kHz (20,000 Hz) के मध्य होती है – 20 Hz से कम आवृत्ति को इन्फ्रासाउंड (infrasound) एवं 20 kHz से अधिक को अल्ट्रासाउंड (ultrasound) कहते हैं। मनुष्य 20 Hz से 20 kHz तक ही सुन सकता है।
- ध्वनि की तीव्रता (intensity) डेसीबल (dB) में मापी जाती है – 0 dB सुनने की न्यूनतम सीमा (threshold of hearing) है। 120 dB से अधिक ध्वनि कर्ण पटल (eardrum) के लिए हानिकारक होती है एवं दर्द की सीमा (pain threshold) होती है।
- ध्वनि की तीव्रता (ध्वनि का प्रबलता) दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (inverse square law) होती है – सूत्र: I ∝ 1/r² । अर्थात स्रोत से दूरी दोगुनी करने पर तीव्रता चौथाई रह जाती है।
- ध्वनि तरंगों का परावर्तन (reflection) प्रतिध्वनि (echo) एवं गूँज का कारण होता है – प्रतिध्वनि तब सुनाई देती है जब परावर्तित ध्वनि मूल ध्वनि के 0.1 सेकंड बाद आती है (न्यूनतम दूरी लगभग 17 मीटर)। संगीत सभागारों (auditoriums) में ध्वनि के परावर्तन का उपयोग ध्वनि प्रवर्धन के लिए किया जाता है।
- ध्वनि तरंगों का परावर्तन गुफाओं, खाली हालों एवं पहाड़ियों में गूँज (reverberation) बनाता है – इसे संगीत हॉल में नियंत्रित किया जाता है, अन्यथा अत्यधिक गूँज से ध्वनि अस्पष्ट हो जाती है।
- प्रकाश तरंगें विद्युत चुम्बकीय तरंगें (electromagnetic waves) हैं – इन्हें संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, ये निर्वात में भी चल सकती हैं। निर्वात में प्रकाश की गति 3 × 10⁸ m/s (लगभग 3,00,000 km/s) है, जो ब्रह्मांड की सबसे अधिक गति है।
- प्रकाश तरंगें निर्वात में गति कर सकती हैं – जबकि ध्वनि तरंगें नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि सूर्य से प्रकाश (प्रकाश वर्षों) की दूरी तय करके पृथ्वी तक पहुँचता है, परंतु सूर्य की आवाज़ हम नहीं सुन सकते।
- प्रकाश तरंगों की आवृत्ति (frequency) रंग (colour) पर निर्भर करती है – लाल प्रकाश की आवृत्ति सबसे कम (≈4.3 × 10¹⁴ Hz) एवं बैंगनी प्रकाश की सबसे अधिक (≈7.5 × 10¹⁴ Hz) होती है। आवृत्ति ही प्रकाश का रंग निर्धारित करती है, तरंगदैर्घ्य नहीं।
- प्रकाश तरंगों की आवृत्ति माध्यम बदलने पर स्थिर रहती है – माध्यम बदलने पर प्रकाश का वेग एवं तरंगदैर्घ्य बदल जाते हैं, लेकिन आवृत्ति नियत रहती है। यही कारण है कि रंग माध्यम बदलने पर नहीं बदलता।
- प्रकाश तरंगों की गति काँच में निर्वात की तुलना में कम हो जाती है – निर्वात में गति ≈ 3 × 10⁸ m/s, काँच में ≈ 2 × 10⁸ m/s एवं जल में ≈ 2.25 × 10⁸ m/s। यही गति में कमी अपवर्तन (refraction) का कारण बनती है।
- तरंगों का व्यतिकरण (interference) दो तरंगों के अध्यारोपण (superposition) से बनता है, जो रचनात्मक या विनाशकारी हो सकता है – रचनात्मक व्यतिकरण (constructive) में आयाम एवं तीव्रता बढ़ जाती है (दीप्त फ्रिंज) , जबकि विनाशकारी (destructive) में आयाम घट जाता है (अदीप्त फ्रिंज) ।
- प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण यंग के डबल स्लिट प्रयोग (Young's double slit experiment) में स्पष्ट रूप से देखा जाता है – इस प्रयोग ने प्रकाश के तरंग सिद्धांत को प्रमाणित किया। व्यतिकरण के कारण पर्दे पर चमकीली एवं गहरी पट्टियाँ (fringes) बनती हैं।
- प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण न्यूटन के छल्लों (Newton's rings) में भी देखा जाता है – यह एक प्लानो-उत्तल लेंस एवं समतल काँच की प्लेट के मध्य बनी वायु फिल्म (air film) के कारण होता है। इससे प्रकाश की तरंगदैर्घ्य ज्ञात की जाती है।
- साबुन के बुलबुले (soap bubbles) एवं तेल की पतली परत पर रंगीन पट्टियाँ व्यतिकरण के कारण ही बनती हैं – प्रकाश की किरणें परत की ऊपरी एवं निचली सतहों से परावर्तित होकर व्यतिकरण करती हैं। यह प्रकाश की तरंग प्रकृति का एक सरल उदाहरण है।
- तरंगों का सुपरपोजीशन सिद्धांत (principle of superposition) व्यतिकरण को समझाता है – इस सिद्धांत के अनुसार, जब दो या अधिक तरंगें एक बिंदु पर मिलती हैं, तो परिणामी विस्थापन सभी तरंगों के विस्थापनों का बीजगणितीय योग होता है।
- तरंगों का विवर्तन (diffraction) किसी बाधा या संकीर्ण झिरी (slit) के किनारों पर तरंग का झुकने का गुण है – यह गुण सभी प्रकार की तरंगों (ध्वनि, प्रकाश, जल तरंग) में पाया जाता है। विवर्तन तरंग प्रकृति का प्रमाण है।
- प्रकाश तरंगों का विवर्तन संकीर्ण छिद्रों (narrow slits) या बारीक झिरियों से होता है – विवर्तन अधिक स्पष्टता से तब होता है जब झिरी का आकार तरंगदैर्घ्य के समान या उससे छोटा हो। दृश्य प्रकाश का तरंगदैर्घ्य बहुत छोटा (≈500 nm) होता है, अतः विवर्तन स्पष्ट रूप से देखने के लिए अति सूक्ष्म झिरी की आवश्यकता होती है।
- तरंग का विवर्तन तरंगदैर्घ्य के समानुपाती होता है – तरंगदैर्घ्य बड़ा होगा तो विवर्तन अधिक होगा – यही कारण है कि ध्वनि (बड़ी तरंगदैर्घ्य) का विवर्तन आसानी से देखा जा सकता है (जैसे – दीवार के पीछे से आवाज़ सुनाई देना) , जबकि प्रकाश (बहुत छोटी तरंगदैर्घ्य) का विवर्तन देखने के लिए विशेष व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
- प्रकाश तरंगों का विवर्तन विवर्तन ग्रेटिंग (diffraction grating) द्वारा स्पष्ट रूप से देखा जाता है – ग्रेटिंग एक ऐसी सतह होती है जिस पर बहुत बारीक एवं सहार्श रेखाएँ होती हैं। इसका उपयोग स्पेक्ट्रम (प्रकाश के रंग) को विश्लेषण करने में किया जाता है।
- तरंगों का ध्रुवण (polarization) केवल अनुप्रस्थ तरंगों में होता है, अनुदैर्ध्य तरंगों में नहीं – क्योंकि अनुदैर्ध्य तरंगों में कण केवल एक दिशा (संचरण दिशा) में कंपन करते हैं, जबकि अनुप्रस्थ तरंगों में कण अनेक दिशाओं में कंपन कर सकते हैं। यह प्रकाश की अनुप्रस्थ प्रकृति का प्रबल प्रमाण है।
- प्रकाश तरंगों का ध्रुवण निकोल प्रिज्म (Nicol prism) या पोलरॉइड शीट (Polaroid sheet) द्वारा किया जाता है – निकोल प्रिज्म कैल्साइट (calcite) क्रिस्टल से बना होता है। पोलरॉइड का उपयोग धूप के चश्मों (sunglasses) एवं कैमरा फिल्टर में किया जाता है।
- प्रकाश का ध्रुवण ध्रुवक (polarizer) एवं विश्लेषक (analyzer) द्वारा मापा जाता है – ध्रुवक तरंगों को एक निश्चित दिशा में सीमित करता है, जबकि विश्लेषक यह जाँचता है कि प्रकाश कितना ध्रुवित है। यह सूर्यास्त एवं सूर्योदय के रंगों को भी प्रभावित करता है।
- डॉप्लर प्रभाव (Doppler effect) तब होता है जब स्रोत (source) और प्रेक्षक (observer) के बीच सापेक्ष गति होती है – इससे प्रेक्षक द्वारा सुनी गई या देखी गई आवृत्ति में परिवर्तन (आभासी आवृत्ति) हो जाता है। स्रोत पास आने पर आवृत्ति बढ़ती है एवं दूर जाने पर घटती है।
- तरंगों का डॉप्लर प्रभाव आवृत्ति (frequency) में परिवर्तन का कारण होता है – ध्वनि के लिए यह सायरन (एम्बुलेंस/पुलिस) की आवाज़ में उतार-चढ़ाव के रूप में सुनाई देता है। प्रकाश के लिए इसे रेडशिफ्ट (redshift – दूर जाने पर तरंगदैर्घ्य बढ़ना) एवं ब्लूशिफ्ट (blueshift – पास आने पर तरंगदैर्घ्य घटना) कहते हैं।
- डॉप्लर प्रभाव स्रोत की सापेक्ष गति (relative speed) पर निर्भर करता है – गति जितनी अधिक होगी, आवृत्ति में परिवर्तन उतना ही अधिक होगा। ब्रह्मांड विज्ञान (cosmology) में यह सिद्ध करने के लिए उपयोग किया जाता है कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है (बढ़ती हुई रेडशिफ्ट) ।
- प्रकाश तरंगों का प्रकीर्णन (scattering) रैले के नियम (Rayleigh's law) पर आधारित है – रैले का नियम: प्रकीर्णन की तीव्रता ∝ 1/λ⁴ (तरंगदैर्घ्य की चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती) । अर्थात छोटी तरंगदैर्घ्य (नीला/बैंगनी) अधिक प्रकीर्णित होती है, बड़ी तरंगदैर्घ्य (लाल) कम प्रकीर्णित होती है।
- प्रकाश तरंगों का प्रकीर्णन छोटी तरंगदैर्घ्य (बैंगनी, नीला) पर अधिक होता है – यही कारण है कि आकाश नीला दिखता है (नीले प्रकाश का सबसे अधिक प्रकीर्णन) , जबकि सूर्यास्त के समय लाल रंग दिखता है (बड़ी दूरी तय करने पर नीला प्रकीर्णित होकर समाप्त हो जाता है) ।
- प्रकाश तरंगों का प्रकीर्णन आकाश के नीले रंग का मुख्य कारण है – वायुमंडल में सूर्य का प्रकाश प्रकीर्णित होता है। नीले प्रकाश की तरंगदैर्घ्य सबसे कम होती है, अतः यह सबसे अधिक प्रकीर्णित होकर चारों ओर फैल जाता है, जिससे आकाश नीला दिखता है।
- तनी हुई रस्सी (stretched string) में तरंग का वेग v = √(T/μ) होता है – जहाँ T = तनाव (tension) एवं μ = द्रव्यमान प्रति इकाई लंबाई (linear mass density) है। तनाव बढ़ाने पर वेग बढ़ता है, द्रव्यमान घनत्व बढ़ाने पर वेग घटता है।
- द्रव (जल) में तरंग का वेग v = √(B/ρ) होता है – जहाँ B = आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (bulk modulus) एवं ρ = घनत्व (density) है। द्रव के प्रत्यास्थता गुणांक एवं घनत्व के अनुपात का वर्गमूल तरंग वेग देता है।
- ध्वनि तरंगों की आवृत्ति (तार के कंपन में) तार की लंबाई एवं तनाव पर निर्भर करती है – लंबाई कम करने पर आवृत्ति बढ़ती है (उच्च स्वर) , तनाव बढ़ाने पर भी आवृत्ति बढ़ती है। संगीत वाद्यों (गिटार, सितार, वायलिन) में यही सिद्धांत काम करता है।
- तार की आवृत्ति f ∝ √T (तनाव के वर्गमूल के समानुपाती) एवं f ∝ 1/L (लंबाई के व्युत्क्रमानुपाती) होती है – यह सूत्र संगीत वाद्यों के स्वरों के मिलान (tuning) में प्रयोग किया जाता है।
- तरंग का आयाम तरंग की ऊर्जा के समानुपाती होता है – आयाम का वर्ग तीव्रता के समानुपाती होता है – I ∝ A² (तीव्रता ∝ आयाम का वर्ग) । यदि आयाम दोगुना कर दिया जाए, तो ऊर्जा एवं तीव्रता चार गुना हो जाती है।
- प्रकाश तरंगों का विवर्तन न्यूटन के छल्लों में भी देखा जा सकता है – हालाँकि न्यूटन के छल्ले मुख्यतः व्यतिकरण (interference) का उदाहरण हैं, इनमें विवर्तन प्रभाव भी गौण रूप से विद्यमान होता है।
- प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण साबुन की पतली परत (soap film) में रंगीन पट्टियाँ बनाता है – यह एक सामान्य एवं सरल उदाहरण है, जिसे दैनिक जीवन में देखा जा सकता है।
- ध्वनि तरंगों की तीव्रता (sound intensity) दूरी बढ़ने पर कम होती है – ध्वनि की तीव्रता दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। यही कारण है कि कोई ध्वनि स्रोत दूर जाने पर धीमी होती जाती है।
- काल (time period) एवं आवृत्ति (frequency) परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं – T = 1/f – यदि आवृत्ति अधिक है, तो काल कम होगा (तेजी से दोलन) एवं यदि आवृत्ति कम है, तो काल अधिक होगा (धीमे दोलन) ।