1. सुन्दरलाल बहुगुणा
परिचय: सुन्दरलाल बहुगुणा (9 जनवरी 1927 - 21 मई 2021) एक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के प्रमुख नेता थे।
योगदान:
- चिपको आंदोलन: 1970 के दशक में उत्तराखंड में शुरू हुआ यह आंदोलन वनों की कटाई रोकने के लिए था। बहुगुणा ने स्थानीय लोगों, विशेषकर महिलाओं, को पेड़ों को गले लगाकर उनकी रक्षा करने के लिए प्रेरित किया।
- 1981 में भारत सरकार ने हिमालयी क्षेत्र में वाणिज्यिक लकड़ी कटाई पर प्रतिबंध लगाया, जो बहुगुणा की मेहनत का परिणाम था।
- 1980 के दशक में 5,000 किमी की हिमालयी पैदल यात्रा कर वन संरक्षण का संदेश दिया।
पुरस्कार:
- पद्म भूषण (1987), पद्म विभूषण (2009)।
- राइट लाइवलीहुड अवार्ड (1987), जिसे वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- महात्मा गांधी के अहिंसक सिद्धांतों से प्रेरित।
- टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका।
2. चण्डी प्रसाद भट्ट
परिचय: चण्डी प्रसाद भट्ट (जन्म 1934) चिपको आंदोलन के संस्थापक और गांधीवादी पर्यावरणविद् हैं।
योगदान:
- 1973 में चमोली जिले में दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल (DGSM) के तहत चिपको आंदोलन शुरू किया।
- महिलाओं को संगठित कर 1974 में रेनी गाँव में पेड़ों की कटाई रोकी।
- स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सृजन हेतु वन संसाधनों पर आधारित लघु उद्योगों की स्थापना पर जोर।
पुरस्कार:
- रामन मैग्सेसे पुरस्कार (1982)।
- पद्म श्री (1986), पद्म भूषण (2005)।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- उत्तराखंड के चमोली जिले में 1973 में पहला चिपको विरोध प्रदर्शन आयोजित।
- स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण के लिए प्रेरित किया।
3. सुगाथाकुमारी
परिचय: सुगाथाकुमारी (1934-2020) केरल की प्रसिद्ध कवयित्री और पर्यावरण कार्यकर्ता थीं।
योगदान:
- साइलेंट वैली आंदोलन: 1970 के दशक में केरल के साइलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान को जलविद्युत परियोजना से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका।
- 1979 में केरल सरकार ने साइलेंट वैली संरक्षण अधिनियम पारित किया।
- महिलाओं और पर्यावरण संरक्षण के लिए 'अभय' संगठन की स्थापना।
पुरस्कार:
- पद्म श्री (2006)।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1978)।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- उनकी कविताएँ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित थीं।
- साइलेंट वैली को UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता।
4. बाबा आम्टे
परिचय: मुरलीधर देवीदास आम्टे (1914-2008), जिन्हें बाबा आम्टे के नाम से जाना जाता है, एक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् थे।
योगदान:
- नर्मदा बचाओ आंदोलन: सरदार सरोवर बाँध के कारण विस्थापित लोगों के पुनर्वास और पर्यावरण संरक्षण के लिए संघर्ष।
- आनंदवन की स्थापना, जो कुष्ठ रोगियों के लिए पुनर्वास केंद्र है।
- नर्मदा नदी की पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा।
पुरस्कार:
- पद्म श्री (1971), पद्म विभूषण (1988)।
- रामन मैग्सेसे पुरस्कार (1985)।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई 90 मीटर तक सीमित की।
- गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित कार्य।
5. सुनीता नारायण
परिचय: सुनीता नारायण (जन्म 1961) एक पर्यावरणविद् और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की निदेशक हैं।
योगदान:
- जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, और जल प्रबंधन पर अनुसंधान और वकालत।
- 2005 में CSE की रिपोर्ट ने कोका-कोला और पेप्सी में कीटनाशकों की उपस्थिति को उजागर किया।
- हरित ऊर्जा और टिकाऊ विकास को बढ़ावा।
पुरस्कार:
- पद्म श्री (2005)।
- चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवार्ड (2016, UNEP)।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- CSE ने डाउन टू अर्थ पत्रिका शुरू की।
- वैश्विक जलवायु परिवर्तन नीतियों पर प्रभाव।
मेधा पाटकर:
- नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख नेता।
- 1990 में 2,000 लोगों के साथ दिल्ली में 5-दिवसीय धरना।
- राइट लाइवलीहुड अवार्ड (1991)।
पांडुरंग हेगड़े:
- कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन (1983) का नेतृत्व।
- पश्चिमी घाट में वन संरक्षण पर ध्यान।
गौरा देवी:
- चिपको आंदोलन में रेनी गाँव की महिलाओं का नेतृत्व।
- 1974 में पेड़ों को बचाने के लिए महिलाओं को संगठित किया।