स्वतंत्रता से पहले भारत में अंग्रेजों का शासन था।
भारत का संविधान बनाने के लिए 1946 में संविधान सभा का गठन
किया गया।
संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे।
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे।
संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी
अम्बेडकर थे।
भारतीय संविधान बनाने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा।
संविधान सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान को स्वीकार किया।
26 नवम्बर को प्रतिवर्ष संविधान दिवस मनाया जाता है।
भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू किया गया।
26 जनवरी को प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ सरकार संविधान के अनुसार कार्य करती है।
देश का सर्वोच्च कानूनों का संग्रह संविधान कहलाता है।
भारतीय संविधान एक लिखित एवं विशाल संविधान है।
मूल संविधान में 22 भाग, 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियाँ
थीं।
वर्तमान में भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियाँ हैं।
संविधान की प्रस्तावना में भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष,
लोकतंत्रात्मक गणराज्य कहा गया है।
प्रभुत्व-संपन्न का अर्थ है कि भारत अपनी आंतरिक एवं बाहरी नीतियों में
स्वतंत्र है।
समाजवाद का अर्थ है आर्थिक समानता स्थापित करने का प्रयास करना।
पंथनिरपेक्ष का अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है।
संविधान सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता प्रदान करने
का उद्देश्य रखता है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दलितों के अधिकारों और राजनीतिक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण कार्य
किया।
संविधान के अनुसार देश का प्रत्येक नागरिक और सरकार कानून के अधीन कार्य
करते हैं।
भारत की सरकार जनता के लिए तथा जनता द्वारा चुनी जाती है, इसलिए भारत को
लोकतंत्रात्मक कहा जाता है।
भारत का राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्रपति वंशानुगत न होकर निर्वाचित होता है,
इसलिए भारत को गणराज्य कहा जाता है।
मानव अधिकार जन्म से ही प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त होते हैं और जीवन भर
साथ रहते हैं।
मानव अधिकार सभी व्यक्तियों को बिना किसी जाति, धर्म, सामाजिक या आर्थिक
भेदभाव के प्राप्त होते हैं।
10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में मानवाधिकारों
की सार्वभौमिक घोषणा की गई।
प्रतिवर्ष 10 दिसम्बर को पूरे विश्व में मानवाधिकार दिवस
मनाया जाता है।
भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए 1993 में राष्ट्रीय
मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया।
संविधान में नागरिकों को दिए गए विशेष अधिकारों को मौलिक अधिकार कहा जाता
है।
भारतीय संविधान में नागरिकों को छः मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
समानता का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से व्यवहार करने का अधिकार देता
है।
किसी भी व्यक्ति के साथ जन्म स्थान, जाति, धर्म या स्त्री-पुरुष के आधार पर
भेदभाव नहीं किया जा सकता।
सार्वजनिक स्थानों जैसे दुकान, होटल और सिनेमाघर में सभी को समान प्रवेश का
अधिकार है।
सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान किया गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अंतर्गत छुआ-छूत
(अस्पृश्यता) को समाप्त कर इसे कानूनन अपराध घोषित किया गया है।
सेना और विद्या संबंधी उपाधियों को छोड़कर अन्य उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत स्वतंत्रता का
अधिकार नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
अनुच्छेद 19(1)(b) के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक
सभा और सम्मेलन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
अनुच्छेद 19(1)(c) के अंतर्गत नागरिकों को समिति या यूनियन
बनाकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
अनुच्छेद 19(1)(d) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को देश में
कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
अनुच्छेद 19(1)(e) के अनुसार भारत का प्रत्येक नागरिक देश के किसी
भी भाग में रहने और बसने का अधिकार रखता है।
अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत भारत का कोई भी नागरिक अपनी इच्छा के अनुसार
कोई भी रोजगार, व्यापार या व्यवसाय कर सकता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(1) के अनुसार अपराध सिद्ध होने से
पहले किसी व्यक्ति को दंड नहीं दिया जा सकता।
अनुच्छेद 20(2) के अनुसार एक ही अपराध के लिए किसी व्यक्ति को एक से
अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को
अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत भारत में रहने वाले सभी लोगों को
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने
का अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 21 के अनुसार लोगों के जीवन और सुरक्षा की रक्षा करना
सरकार का कर्तव्य है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 के अनुसार किसी व्यक्ति को अपराध सिद्ध होने
से पहले जेल की सजा नहीं दी जा सकती।
अनुच्छेद 22(1) के अनुसार गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके अपराध
की जानकारी देना आवश्यक है।
अनुच्छेद 22(2) के अनुसार गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के
भीतर मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत शिक्षा का
अधिकार को 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा मौलिक अधिकार बनाया गया।
संविधान के अनुच्छेद 21(क) के अनुसार 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को
निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त है।
6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है।
निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act-2009) संसद
द्वारा पारित किया गया। (अनुच्छेद 21A)
राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का कानूनी मौलिक
अधिकार प्राप्त हो गया। (अनुच्छेद 21A)
शोषण के विरुद्ध अधिकार नागरिकों को जबरदस्ती काम कराने से सुरक्षा प्रदान
करता है। (अनुच्छेद 23)
किसी भी व्यक्ति से जबरन मजदूरी नहीं कराई जा सकती। (अनुच्छेद 23)
किसी व्यक्ति को बिना मजदूरी या न्यूनतम मजदूरी से कम पर
काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। (अनुच्छेद 23)
किसी भी व्यक्ति को खराब परिस्थितियों में जबरदस्ती काम करने के लिए बाध्य
नहीं किया जा सकता। (अनुच्छेद 23)
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से मजदूरी कराना कानूनन अपराध है। (अनुच्छेद
24)
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना मार्च 2007
में की गई। (बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005)
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए
कार्य करता है। (बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005)
प्रत्येक बच्चे को जीने का अधिकार प्राप्त है। (अनुच्छेद 21)
बच्चों को उचित देखभाल एवं पौष्टिक भोजन पाने का अधिकार है। (अनुच्छेद 21,
47)
प्रत्येक बच्चे को स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त करने का अधिकार है। (अनुच्छेद
21, 47)
हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। (अनुच्छेद 21A)
बच्चों को अपने से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात कहने का अधिकार प्राप्त है।
(अनुच्छेद 19(1)(a))
बच्चों को आर्थिक एवं शारीरिक शोषण से सुरक्षा पाने का अधिकार है। (अनुच्छेद
23, 24)
युद्ध, बाढ़, सूखा, महामारी और भूकम्प जैसी आपदाओं में बच्चों को सबसे पहले
राहत पाने का अधिकार है। (आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005)
कैलाश सत्यार्थी को वर्ष 2014 में शांति का नोबेल
पुरस्कार प्रदान किया गया।
बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी हैं।
कैलाश सत्यार्थी द्वारा कालीन, काँच, ईंट-भट्टों, खदानों और खतरनाक उद्योगों में कार्यरत
बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया।
उत्तर प्रदेश में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन वर्ष
2008 में बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत किया गया।
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का कार्यालय लखनऊ में स्थित है।
बाल मजदूरी (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के तहत बालश्रम कराना दंडनीय अपराध है।
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से मजदूरी करवाना कानूनन अपराध है।
कानून की मनाही के बावजूद बच्चों से काम करवाने वाले व्यक्ति को 6 महीने से 2
वर्ष तक की कैद हो सकती है।
बाल मजदूरी कराने पर 20,000 रुपये से 50,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा
सकता है।
बाल मजदूरी के खिलाफ शिकायत थाने, श्रम प्रवर्तन अधिकारी
(L.E.O.) या मजिस्ट्रेट कोर्ट में की जा सकती है।
सरकार द्वारा बच्चों को मुफ्त दोपहर का भोजन, किताबें,
बैग, ड्रेस तथा निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है।
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की
स्वतंत्रता देता है।
भारत में किसी भी व्यक्ति को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने से
नहीं रोका जा सकता।
सभी धर्मों के लोगों को अपने धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करने की
स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारत में लोग होली, दीपावली, क्रिसमस और
लोहड़ी जैसे त्योहार मिल-जुलकर मनाते हैं।
संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपि और
संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। (अनुच्छेद 29)
अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार
प्राप्त है। (अनुच्छेद 30)
प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने
का अधिकार है। (अनुच्छेद 29)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार नागरिकों को मौलिक अधिकारों के हनन पर न्यायालय
जाने का अधिकार देता है। (अनुच्छेद 32)
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में नागरिक उच्च न्यायालय या
उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकते हैं। (अनुच्छेद 226, 32)
सरकार का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे।
(अनुच्छेद 12–35)
यदि सरकार नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नहीं करती, तो उसके विरुद्ध लोकहित याचिका
(PIL) दायर की जा सकती है। (अनुच्छेद 32, 226)
लोकहित याचिका वह मुकदमा है जो किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के
लिए भी दायर किया जा सकता है।
संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ देश की एकता और
अखंडता बनाए रखने हेतु आपातकाल की व्यवस्था भी की गई है। (अनुच्छेद 352–360)
देश में बाहरी आक्रमण, युद्ध अथवा सशस्त्र
विद्रोह की स्थिति में आपातकाल लागू किया जा सकता है। (अनुच्छेद 352)
आपातकाल के दौरान राष्ट्रहित में नागरिकों के कुछ मौलिक अधिकार अस्थायी रूप
से स्थगित किए जा सकते हैं। (अनुच्छेद 359, 358)
राज्य के नीति निदेशक तत्व सरकार को नीतियाँ बनाने के लिए दिए गए संवैधानिक
निर्देश हैं। (अनुच्छेद 36–51)
राज्य नीति निदेशक तत्वों का पालन करने का प्रयास करता है, लेकिन इनके पालन न होने पर
न्यायालय में मुकदमा नहीं किया जा सकता। (अनुच्छेद 37)
सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिससे सभी नागरिकों को काम करने का अधिकार
प्राप्त हो।
प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा और स्वस्थ कार्य वातावरण उपलब्ध कराया जाना
चाहिए।
मजदूरों को सम्मानजनक वेतन तथा उद्योगों के संचालन में भागीदारी मिलनी
चाहिए।
बच्चों को उनके विकास के लिए स्वतंत्र और सम्मानपूर्ण
वातावरण मिलना चाहिए।
समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाना चाहिए।
स्त्री और पुरुषों के वेतन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
सरकार को ऐसी नीतियाँ नहीं बनानी चाहिए जिनसे कुछ लोगों के पास अत्यधिक धन एकत्र हो जाए।
सभी पुरुषों और महिलाओं को पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने के लिए नीति बनाई
जानी चाहिए।
राज्य को ग्राम पंचायतों की स्थापना करनी चाहिए ताकि वे शासन की इकाई के रूप
में कार्य कर सकें।
गरीबों को न्याय दिलाने हेतु निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जानी
चाहिए।
राज्य का कर्तव्य है कि वह पर्यावरण, वनों तथा
वन्य जीवों की रक्षा करे।
संविधान के अनुसार कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग
रखा जाना चाहिए।
राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रयास करना
चाहिए।
नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ हमारे मौलिक कर्तव्य भी हैं, जिनका पालन
करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
मौलिक कर्तव्यों को वर्ष 1976 में संविधान में जोड़ा गया।
भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे तथा उसके
आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे।
नागरिकों को स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित उच्च आदर्शों को हृदय में संजोकर
उनका पालन करना चाहिए।
प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत की संप्रभुता,
एकता और अखंडता की रक्षा करे।
देश की रक्षा करना तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र सेवा करना प्रत्येक नागरिक
का कर्तव्य है।
सभी भारतीयों में समरसता और भाईचारे की भावना विकसित करना
हमारा कर्तव्य है।
स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना प्रत्येक नागरिक का
कर्तव्य है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार,
मौलिक कर्तव्य और नीति निदेशक तत्व में समानता के सिद्धांत को समाहित
किया गया है।
संविधान महिलाओं को समानता का अधिकार प्रदान करता है।
राज्य को महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए सकारात्मक
नीतियाँ अपनाने की शक्ति दी गई है।
भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं को समझना और उनका सम्मान करना हमारा
कर्तव्य है।
वन, झील, नदी और वन्य जीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन
करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
सभी जीवों के प्रति दयाभाव रखना नागरिकों का नैतिक कर्तव्य है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन और सुधार की
भावना का विकास करना आवश्यक है।
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना हमारा कर्तव्य है।
प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता प्राप्त
करने का प्रयास करना चाहिए।
वर्ष 2002 में संविधान में यह कर्तव्य जोड़ा गया कि माता-पिता या संरक्षक
6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।
वर्तमान में संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य शामिल हैं।
मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी
पालन करना चाहिए।
भारत का संविधान यह स्पष्ट करता है कि भारत अर्थात 'राज्यों का संघ' (Union
of States) है। (अनुच्छेद 1)
भारतीय संघ का पूरा क्षेत्र सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मिलकर
बना है। (अनुच्छेद 1)
भारत में संघ (केन्द्र) और राज्य सरकारों के अधिकार संविधान द्वारा निश्चित
किए गए हैं। (अनुच्छेद 245–255)
भारत में संघ और राज्य सरकारों के कार्यों का विभाजन विधायी शक्तियों के
बंटवारे के आधार पर किया गया है। (अनुच्छेद 246)
संघ सूची (Union List) के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार
संसद को प्राप्त है। (अनुच्छेद 246)
संघ सूची में रक्षा, विदेश मामले, रेल, बैंक, संचार आदि प्रमुख विषय शामिल
हैं। (अनुच्छेद 246, सातवीं अनुसूची)
राज्य सूची (State List) के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य
विधानमंडल को प्राप्त है। (अनुच्छेद 246)
राज्य सूची में पुलिस, कृषि, सिंचाई, सड़क, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन जैसे
विषय शामिल हैं। (सातवीं अनुसूची)
समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार
संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को प्राप्त है। (अनुच्छेद 246)
समवर्ती सूची में शिक्षा, विवाह, वन, चिकित्सा, उद्योग, बिजली जैसे विषय
शामिल हैं। (सातवीं अनुसूची)
यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में विरोध हो,
तो संघीय कानून को प्राथमिकता दी जाती है। (अनुच्छेद 254)
भारत में प्रत्येक सरकार के तीन प्रमुख अंग होते हैं—व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और
न्यायपालिका। (अनुच्छेद 50, 74, 123, 124)
व्यवस्थापिका (Legislature) का कार्य देश के लिए कानून
बनाना है। (अनुच्छेद 245–255)
कार्यपालिका (Executive) का कार्य बनाए गए कानूनों को लागू
करना है। (अनुच्छेद 74, 163)
न्यायपालिका (Judiciary) का कार्य नागरिकों को न्याय प्रदान
करना है। (अनुच्छेद 124–147, 214–231)
संघ (केन्द्र) की व्यवस्थापिका को संसद (Parliament) कहा जाता है। (अनुच्छेद
79)
भारतीय संसद तीन भागों से मिलकर बनती है—राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा।
(अनुच्छेद 79)
लोकसभा संसद का निम्न सदन (Lower House) है, जिसके सदस्य जनता
द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। (अनुच्छेद 81)
लोकसभा चुनाव के लिए पूरे देश को निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा जाता है और
प्रत्येक क्षेत्र से एक सदस्य चुना जाता है। (अनुच्छेद 81)
लोकसभा की अधिकतम संख्या 552 सदस्य हो सकती है, जिनमें से 530 राज्य, 20
केंद्र शासित प्रदेश और 2 आंग्ल-भारतीय (पूर्व व्यवस्था) शामिल थे। (अनुच्छेद 81)
लोकसभा सदस्य बनने की आयु कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए।
(अनुच्छेद 84)
लोकसभा का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष होता है, जिसे राष्ट्रपति प्रधानमंत्री
की सलाह पर भंग कर सकता है। (अनुच्छेद 83)
लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के
सदस्य अपने बीच से करते हैं। (अनुच्छेद 93)
लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करता है और सदन में अनुशासन बनाए रखता है।
(अनुच्छेद 93)
लोकसभा के प्रमुख कार्य हैं—कानून बनाना, कर लगाना, बजट पारित करना और सरकार
पर नियंत्रण रखना। (अनुच्छेद 107–117)
राज्यसभा संसद का उच्च सदन (Upper House) है। (अनुच्छेद 80)
राज्यसभा की अधिकतम संख्या 250 सदस्य हो सकती है, जिनमें से 12 राष्ट्रपति
द्वारा मनोनीत होते हैं। (अनुच्छेद 80)
राज्यसभा के सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते
हैं। (अनुच्छेद 80)
राज्यसभा सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए। (अनुच्छेद 84)
वर्तमान में राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या लगभग 245 है। (अनुच्छेद 80)
कोई भी व्यक्ति एक ही समय में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) का
सदस्य नहीं हो सकता। (अनुच्छेद 101)
राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और एक-तिहाई सदस्य हर 2
वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं। (अनुच्छेद 83)
राज्यसभा कभी भंग नहीं होती, इसलिए इसे 'स्थायी सदन' कहा
जाता है। (अनुच्छेद 83)
भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
(अनुच्छेद 64, 89)
राज्यसभा में उपसभापति सदन की कार्यवाही का संचालन करता है जब सभापति अनुपस्थित होता है।
(अनुच्छेद 90)
राज्यसभा का अधिवेशन वर्ष में कम से कम दो बार होना आवश्यक है और दो सत्रों
के बीच 6 माह से अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। (अनुच्छेद 85)
राज्यसभा भी लोकसभा की तरह कानून बनाने और संशोधन करने का कार्य करती है।
(अनुच्छेद 107–111)
किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों की स्वीकृति और
राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। (अनुच्छेद 107–111)
धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है, राज्यसभा में केवल उस
पर चर्चा होती है। (अनुच्छेद 109)
विधेयक (Bill) वह प्रस्ताव है जिसके आधार पर कानून बनाया जाता है। (अनुच्छेद
107)
विधेयक दो प्रकार के होते हैं—साधारण विधेयक और धन विधेयक।
(अनुच्छेद 107–109)
यदि विधेयक मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाए तो उसे सरकारी विधेयक कहा जाता
है।
यदि विधेयक किसी अन्य सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाए तो उसे गैर-सरकारी
विधेयक कहा जाता है।
साधारण विधेयक तीन वाचन (प्रथम, द्वितीय, तृतीय) के माध्यम से पारित होता
है। (अनुच्छेद 107)
प्रथम वाचन में विधेयक सदन में प्रस्तुत किया जाता है और उसकी प्रति सदस्यों
को दी जाती है।
द्वितीय वाचन में विधेयक पर विस्तार से चर्चा और संशोधन किए जाते हैं।
तृतीय वाचन में पूरे विधेयक को स्वीकृति या अस्वीकृति के लिए मतदान किया
जाता है।
यदि दोनों सदनों से विधेयक पारित हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति
के लिए भेजा जाता है। (अनुच्छेद 111)
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक कानून (Act) बन जाता है। (अनुच्छेद
111)
यदि किसी विधेयक पर दोनों सदनों में मत बराबर हों तो सभापति का निर्णायक मत
होता है।
यदि दोनों सदनों में मतभेद हो तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुला सकता है।
(अनुच्छेद 108)
धन विधेयक (Money Bill) ऐसे विधेयक होते हैं जिनमें आय और व्यय
(Income and Expenditure) से संबंधित प्रावधान होते हैं, जैसे बजट। (अनुच्छेद 110)
धन विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के बाद ही संसद में प्रस्तुत किया जा
सकता है। (अनुच्छेद 117)
धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है और इसे केवल मंत्री ही
पेश कर सकते हैं। (अनुच्छेद 109)
धन विधेयक पर केवल लोकसभा को मत देने का अधिकार होता है, राज्यसभा केवल
चर्चा कर सकती है। (अनुच्छेद 109)
राज्यसभा धन विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है, इसके बाद इसे स्वीकृत
माना जाता है। (अनुच्छेद 109)
लोकतंत्र का एक प्रमुख सिद्धांत बहुमत का शासन है, जिसमें निर्णय बहुमत के
आधार पर लिए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश की व्यवस्थापिका को विधानमंडल कहा जाता है, जिसमें राज्यपाल,
विधानसभा और विधान परिषद् शामिल हैं। (अनुच्छेद 168)
उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 निर्वाचित सदस्य होते हैं, जिन्हें जनता
द्वारा चुना जाता है।
विधानसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए। (अनुच्छेद
173)
विधानसभा के सदस्यों को विधायक (MLA) कहा जाता है।
विधानसभा के सदस्य अपने बीच से अध्यक्ष (Speaker) और
उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। (अनुच्छेद 178)
विधानसभा का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष होता है, जिसे राज्यपाल पहले भी भंग
कर सकता है। (अनुच्छेद 172)
उत्तर प्रदेश विधान परिषद् में कुल 100 सदस्य होते हैं। (अनुच्छेद 171)
विधान परिषद् के सदस्य विभिन्न माध्यमों से चुने जाते हैं जैसे—विधानसभा, स्थानीय निकाय,
शिक्षक, स्नातक और राज्यपाल द्वारा मनोनयन। (अनुच्छेद 171)
विधान परिषद् सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए। (अनुच्छेद
173)
विधान परिषद् एक स्थायी सदन है और इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।
(अनुच्छेद 172)
विधान परिषद् के सदस्य अपने बीच से सभापति (Chairman) और
उपसभापति चुनते हैं।
विधानमंडल का मुख्य कार्य कानून बनाना है और राज्यपाल की स्वीकृति के बाद
विधेयक कानून बनता है। (अनुच्छेद 200)
उत्तर प्रदेश का विधानसभा भवन लखनऊ में स्थित है।
कार्यपालिका का मुख्य कार्य कानूनों और नीतियों को लागू
करना होता है। (अनुच्छेद 53, 74, 163)
कार्यपालिका विधायिका द्वारा पारित नीतियों और कानूनों को लागू करने के लिए
उत्तरदायी होती है। (अनुच्छेद 73, 162)
भारत में संघ और राज्य दोनों स्तरों पर कार्यपालिका की व्यवस्था संविधान
द्वारा की गई है। (अनुच्छेद 52–78, 153–167)
भारत का राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का प्रधान होता है।
(अनुच्छेद 52)
राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक होता है और तीनों सेनाओं का
सर्वोच्च सेनापति होता है। (अनुच्छेद 53)
राष्ट्रपति की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ औपचारिक रूप से उसी में निहित होती
हैं, लेकिन वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में होती है। (अनुच्छेद 74)
राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद और
राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। (अनुच्छेद 54)
राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। (अनुच्छेद 56)
राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है। (अनुच्छेद 56)
राष्ट्रपति को महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया द्वारा संविधान उल्लंघन
के लिए हटाया जा सकता है। (अनुच्छेद 61)
राष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
राष्ट्रपति बनने के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए। (अनुच्छेद 58)
राष्ट्रपति किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए। (अनुच्छेद 58)
राष्ट्रपति की सभी शासन संबंधी शक्तियाँ भारत सरकार के नाम से प्रयोग की
जाती हैं। (अनुच्छेद 53)
नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ के अंतर्गत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति
करता है। (अनुच्छेद 75)
राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है और उनके विभागों का
बँटवारा करता है। (अनुच्छेद 75)
राष्ट्रपति राज्यपालों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों
की नियुक्ति करता है। (अनुच्छेद 124, 217, 155)
राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की
नियुक्ति करता है। (अनुच्छेद 324)
राष्ट्रपति भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति करता
है। (अनुच्छेद 148)
संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बिना कानून नहीं बन
सकता। (अनुच्छेद 111)
राष्ट्रपति विधेयक को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, लेकिन
दूसरी बार उसे स्वीकृति देनी ही होती है। (अनुच्छेद 111)
राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति स्वीकृति या पुनर्विचार का
विकल्प रखता है। (अनुच्छेद 200)
क्षमा दान की शक्ति के तहत राष्ट्रपति मृत्युदंड सहित विभिन्न दंडों को
क्षमा, स्थगित या परिवर्तित कर सकता है। (अनुच्छेद 72)
राष्ट्रीय आपातकाल युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में
लगाया जा सकता है। (अनुच्छेद 352)
राष्ट्रपति शासन तब लागू किया जाता है जब किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र
विफल हो जाए। (अनुच्छेद 356)
वित्तीय आपातकाल आर्थिक संकट की स्थिति में लागू किया जा सकता है। (अनुच्छेद
360)
राष्ट्रपति देश का औपचारिक (नाममात्र) प्रधान होता है क्योंकि वास्तविक
कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में होती है। (अनुच्छेद 74)
भारत का उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है और उसका चुनाव संसद के
दोनों सदनों के सदस्य करते हैं। (अनुच्छेद 66)
उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। (अनुच्छेद 64)
राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कर्तव्यों का
निर्वहन करता है। (अनुच्छेद 65)
उपराष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक, कम से कम 35
वर्ष आयु का और राज्यसभा सदस्य बनने योग्य होना चाहिए। (अनुच्छेद 66)
उपराष्ट्रपति स्वेच्छा से अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को दे सकता है।
(अनुच्छेद 67)
उपराष्ट्रपति को राज्यसभा के प्रस्ताव और लोकसभा की सहमति से पद से हटाया जा
सकता है। (अनुच्छेद 67)
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उस व्यक्ति को की जाती है जिसे
लोकसभा में बहुमत प्राप्त हो। (अनुच्छेद 75)
यदि प्रधानमंत्री संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है तो उसे 6 माह के भीतर किसी सदन
का सदस्य बनना आवश्यक होता है। (अनुच्छेद 75)
लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल अपना नेता चुनता है, जिसे राष्ट्रपति
प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। (अनुच्छेद 75)
मंत्रिपरिषद् का छोटा रूप मंत्रिमंडल (Cabinet) होता है,
जिसमें प्रमुख मंत्री शामिल होते हैं।
सरकार की नीतियाँ और महत्वपूर्ण निर्णय मंत्रिमंडल द्वारा लिए जाते हैं।
(अनुच्छेद 74)
प्रधानमंत्री के सुझाव पर राष्ट्रपति मंत्रियों की नियुक्ति और बर्खास्तगी
करता है। (अनुच्छेद 75)
मंत्रियों को संसद का सदस्य होना आवश्यक है, अन्यथा उन्हें 6 महीने के भीतर सदस्य
बनना पड़ता है। (अनुच्छेद 75)
जिस दल से प्रधानमंत्री और मंत्री बनते हैं उसे सत्ताधारी दल और अन्य दलों
को विपक्ष कहा जाता है।
प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् का कार्य संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और
नीतियों को लागू करना है। (अनुच्छेद 74)
सरकार के विभिन्न कार्यों के लिए अनेक मंत्रालय और विभाग होते हैं, जैसे
रेल, रक्षा और विदेश मंत्रालय।
सरकारी खर्च और आय का प्रबंधन वित्त मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
मंत्रिपरिषद् पर संसद का नियंत्रण होता है और उसे अविश्वास प्रस्ताव द्वारा
हटाया जा सकता है। (अनुच्छेद 75)
यदि अविश्वास प्रस्ताव बहुमत से पारित हो जाए तो प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद् को
इस्तीफा देना पड़ता है।
सांसद मंत्रियों से प्रश्न पूछकर और जानकारी मांगकर सरकार पर नियंत्रण रखते
हैं। (अनुच्छेद 75)
सांसद बजट पर चर्चा करते हैं और उसमें संशोधन के सुझाव दे सकते हैं।
इस प्रकार संसद मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण और निगरानी रखती है।
न्यायपालिका का मुख्य कार्य न्याय प्रदान करना होता है।
(अनुच्छेद 50, 124–147, 214–231)
न्यायपालिका में कोर्ट-कचहरीके माध्यम से लोगों के विवादों का समाधान किया
जाता है। (अनुच्छेद 32, 226)
न्यायालयों में न्यायाधीश, वकील और पक्षकार होते हैं, जो न्याय
प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र होती है ताकि निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित
किया जा सके। (अनुच्छेद 50)
न्यायालयों में लोगों के सिविल और आपराधिक मामले सुने जाते हैं।
(अनुच्छेद 226, 32)
एफ.आई.आर. (FIR) किसी अपराध की पहली सूचना रिपोर्ट होती है जिसे
पुलिस थाने में दर्ज किया जाता है। (दंड प्रक्रिया संहिता)
पुलिस थाने में दर्ज की गई पहली रिपोर्ट को प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (First
Information Report) कहा जाता है।
एफ.आई.आर. दर्ज होने के बाद पुलिस मामले की जांच शुरू करती है।
झगड़े या विवाद की स्थिति में पहले पुलिस थाना और फिर आवश्यकता होने
पर न्यायालय में मामला जाता है।
न्यायालय का कार्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून के अनुसार न्याय
हो। (अनुच्छेद 21, 32)
न्यायपालिका का उद्देश्य समाज में शांति, सुरक्षा और न्याय बनाए
रखना है।
एफ.आई.आर. (First Information Report) किसी भी व्यक्ति द्वारा पुलिस
थाने में दर्ज कराई जा सकती है।
एफ.आई.आर. लिखित रूप में या मौखिक रूप से दी जा सकती है, जिसे पुलिस अधिकारी दर्ज
करता है और शिकायतकर्ता से हस्ताक्षर करवाता है।
एफ.आई.आर. में अपराध का विवरण, समय, स्थान, अपराधी का नाम और गवाहों के
नाम शामिल होना आवश्यक है।
एफ.आई.आर. पुलिस स्टेशन के आधिकारिक रजिस्टर (Station House
Register) में दर्ज की जाती है।
एफ.आई.आर. दर्ज कराने वाले को उसकी एक निःशुल्क प्रति प्राप्त करने
का अधिकार होता है।
यदि पुलिस एफ.आई.आर. दर्ज करने से मना करे तो शिकायतकर्ता पुलिस अधीक्षक या
मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है।
अब एफ.आई.आर. को ऑनलाइन माध्यम से भी दर्ज कराया जा सकता है।
एफ.आई.आर. दर्ज होने के बाद पुलिस मामले की जाँच (Investigation)
शुरू करती है।
जाँच के दौरान पुलिस सबूत, गवाहों और परिस्थितियों की पुष्टि करती
है।
पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है ताकि वह पूछताछ में सहयोग करे और
सबूत नष्ट न कर सके।
गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके अपराध का कारण बताना अनिवार्य
होता है। (अनुच्छेद 22)
पुलिस किसी व्यक्ति से जबरन जुर्म कबूल नहीं करवा सकती, और ऐसा
कबूलनामा न्यायालय में मान्य नहीं होता।
केवल न्यायालय (मजिस्ट्रेट) के सामने किया गया स्वीकारोक्ति ही
कानूनी रूप से मान्य होता है।
पुलिस का कार्य केवल जाँच और सबूत एकत्र करना है, सजा देना नहीं।
सजा देने का अधिकार केवल न्यायालय को होता है।
जमानत (Bail) के तहत आरोपी को कुछ शर्तों पर रिहा किया जा सकता है।
जमानत देने के लिए व्यक्ति को जिम्मेदारी या संपत्ति के आधार पर
बॉण्ड भरना पड़ सकता है।
जमानत पर छोड़ा गया व्यक्ति यह आश्वासन देता है कि वह पुलिस या न्यायालय के
बुलाने पर उपस्थित होगा।
परसू ने बताया कि उसके पास 8 एकड़ जमीन है और उसने अपनी जमानत के
लिए बॉण्ड भर दिया।
थानेदार ने परसू को बताया कि उसे अगली पेशी के लिए कचहरी में उपस्थित
होना होगा।
सभी मामलों में जमानत नहीं मिलती, यह अपराध की गंभीरता पर निर्भर
करता है।
कचहरी में मुकदमा न्यायालय में शुरू होता है और इसे कई पेशियों तक
चलाया जाता है।
मुकदमे के दौरान गवाहों की गवाही और सबूत प्रस्तुत किए जाते हैं।
न्याय प्रक्रिया में वकील की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और वह अपने मुवक्किल
का बचाव करता है।
किसी भी केस में गवाहों की बात सुनना जरूरी है क्योंकि इससे सत्य का पता चलता
है और न्याय सही ढंग से होता है।
कई पेशियों के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा फैसला सुनाया जाता है और सजा
निर्धारित की जाती है।
यदि आरोपी निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह सेशन्स कोर्ट में अपील कर
सकता है।
सेशन्स कोर्ट अपील स्वीकार कर सजा को स्थगित या संशोधित कर सकता है।
सेशन्स कोर्ट में पुनः सुनवाई होती है और दोनों पक्षों के गवाहों और
वकीलों को सुना जाता है।
सेशन्स कोर्ट द्वारा सजा कम या अधिक की जा सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय के बाद भी
उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार होता है।
भारत में उच्च न्यायालय (High Court) राज्यों का सर्वोच्च न्यायालय होता है, जैसे
प्रयागराज (इलाहाबाद) उच्च न्यायालय।
उच्च न्यायालय में अपील दर्ज होने के बाद अंतिम निर्णय दिया जाता है, जो
अधिकतर अंतिम कानूनी निर्णय होता है।
अंततः न्याय प्रक्रिया में यदि सभी अपील असफल हों तो आरोपी को दी गई सजा का
पालन करना होता है।
दीवानी मामले वे होते हैं जिनमें जमीन-जायदाद, पैसे के
लेन-देन या संपत्ति विवाद शामिल होते हैं।
दीवानी मामलों में जेल की सजा नहीं होती, बल्कि नुकसान की भरपाई या
संपत्ति वापस दिलाई जाती है।
फौजदारी मामले वे होते हैं जिनमें अपराध, मारपीट, चोरी,
डकैती, रिश्वत या मिलावट शामिल होते हैं।
फौजदारी मामलों में अपराध सिद्ध होने पर जेल की सजा अनिवार्य हो सकती
है।
मारपीट जैसे मामलों को फौजदारी अपराध माना जाता है क्योंकि इसमें
शारीरिक नुकसान होता है।
मेड़ खिसकाने जैसे भूमि विवाद सामान्यतः दीवानी मामले होते हैं।
यदि भूमि विवाद के साथ मारपीट भी हो जाए तो मामला फौजदारी बन जाता
है।
दीवानी मामलों में न्यायालय मुआवजा या संपत्ति वापसी का आदेश दे
सकता है।
फौजदारी मामलों में न्यायालय सजा (जेल या जुर्माना) देता है।
भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है और यह कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से
अलग होती है। (अनुच्छेद 50)
भारत में न्यायालयों की संरचना तीन स्तरों में होती है—जिला
न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय।
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) भारत का सबसे ऊँचा न्यायालय है
जो नई दिल्ली में स्थित है। (अनुच्छेद 124)
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होते
हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक
होना आवश्यक है।
न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति को उच्च न्यायालय में 5 वर्ष
न्यायाधीश या 10 वर्ष वकील रहना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश सहित 34
न्यायाधीश होते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय भारत की अंतिम अपीलीय अदालत है, जहाँ अंतिम अपील
की जा सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्य कर सकते
हैं। (अनुच्छेद 124)
दोष सिद्ध होने पर न्यायाधीश को असमर्थता या कदाचार के आधार पर संसद
की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। (अनुच्छेद 124(4))
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) को संविधान द्वारा व्यापक अधिकार
प्राप्त हैं और यह भारत का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है। (अनुच्छेद 124)
कुछ मामलों की प्रारंभिक सुनवाई सीधे सर्वोच्च न्यायालय में होती
है, विशेषकर केंद्र और राज्यों के विवाद। (अनुच्छेद 131)
सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है और इसकी व्याख्या करने का
अधिकार रखता है।
सर्वोच्च न्यायालय भारत में अंतिम अपील न्यायालय के रूप में कार्य
करता है। (अनुच्छेद 132–136)
यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण करता है और उल्लंघन की
स्थिति में न्याय देता है। (अनुच्छेद 32)
सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को कानूनी मामलों पर परामर्श दे सकता
है, लेकिन वह बाध्यकारी नहीं होता। (अनुच्छेद 143)
यदि कोई कानून संविधान के विरुद्ध हो तो सर्वोच्च न्यायालय उसे असंवैधानिक
घोषित कर रद्द कर सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती,
जिससे इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
सर्वोच्च न्यायालय को अवमानना (Contempt of Court) करने वालों को
दंड देने का अधिकार है। (अनुच्छेद 129)
उच्च न्यायालय (High Court) राज्य का सर्वोच्च न्यायालय होता है।
(अनुच्छेद 214)
भारत में वर्तमान में लगभग 25 उच्च न्यायालय कार्यरत हैं।
उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र एक राज्य या राज्यों के समूह तथा केंद्र शासित
प्रदेशों तक होता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक कार्य कर सकते हैं।
(अनुच्छेद 217)
उच्च न्यायालय का मुख्य कार्य मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है।
(अनुच्छेद 226)
उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों की समीक्षा और अपील
सुनता है।
उच्च न्यायालय जनहित याचिकाओं (PIL) पर भी सुनवाई करता है।
उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण और पर्यवेक्षण करता
है।
उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय प्रयागराज में स्थित है।
जिला न्यायालय (District Court) प्रत्येक जिले में स्थित होता है और
यह दीवानी तथा फौजदारी मामलों की सुनवाई करता है।
जिला न्यायालय राज्य के उच्च न्यायालय के अधीन कार्य करता है और
उसके आदेशों का पालन करता है।
जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
(अनुच्छेद 233)
लोक अदालत का उद्देश्य मुकदमों का तेजी से और आपसी समझौते
से निपटारा करना है।
लोक अदालतों की स्थापना इसलिए की गई ताकि न्यायालयों पर बोझ कम हो
और मामलों का शीघ्र निपटारा हो सके।
लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच समझौते के आधार पर विवाद सुलझाया जाता
है।
लोक अदालत में वाहन दुर्घटना, पेंशन, बिजली बिल, गृहकर, बैंक ऋण
जैसे मामले सुलझाए जाते हैं।
लोक अदालतें समझौते योग्य फौजदारी मामलों को भी सुलझा सकती हैं।
लोक अदालतें भूमि अधिग्रहण, उपभोक्ता विवाद और पारिवारिक मामलों का
भी समाधान करती हैं।
परिवार न्यायालय (Family Court) का गठन 1984 के अधिनियम के तहत किया
गया है।
परिवार न्यायालय का मुख्य कार्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण और बच्चों की
अभिरक्षा से जुड़े मामलों को सुलझाना है।
दहेज लेना और देना कानूनन अपराध है और इसे रोकने के लिए दहेज निषेध
अधिनियम लागू है।
दहेज प्रथा सामाजिक रूप से गलत है क्योंकि यह महिलाओं पर अत्याचार और
शोषण को बढ़ावा देती है।
दहेज के कारण कई मामलों में घरेलू हिंसा और मानसिक-शारीरिक
प्रताड़ना होती है।
शिक्षित व्यक्ति भी यदि चुप रहते हैं तो वे अन्याय को बढ़ावा देते हैं, इसलिए
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना आवश्यक है।
किसी भी महिला को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पुलिस, परिवार न्यायालय या
महिला हेल्पलाइन की सहायता लेनी चाहिए।
दहेज लेना और देना अपराध है और इसके खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज
कराई जा सकती है।
दहेज लेना, देना या इसे बढ़ावा देना एक दंडनीय अपराध है।
दहेज प्रथा में दोषी पाए जाने पर कम से कम 5 वर्ष की सजा और
15,000 रुपये या दहेज की राशि (जो अधिक हो) का जुर्माना लगाया जा सकता है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ताओं को गलत वस्तु या
धोखाधड़ी से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा दी गई है।
उपभोक्ता अदालत (Consumer Court) उपभोक्ताओं की शिकायतों का समाधान
करती है और उन्हें न्याय दिलाती है।
यदि किसी वस्तु में गुणवत्ता की कमी या मूल्य में हेर-फेर हो तो
उपभोक्ता अदालत में शिकायत की जा सकती है।
उपभोक्ता अदालत में शिकायत सही पाए जाने पर ग्राहक को मुआवजा दिया
जा सकता है।
उपभोक्ता अदालत दुकानदार या कंपनी पर जुर्माना भी लगा सकती है।
जनहित याचिका (PIL) का उद्देश्य कमजोर और गरीब वर्गों को न्याय
दिलाना है।
जनहित याचिका के माध्यम से कोई भी व्यक्ति या संस्था अन्य लोगों के अधिकारों
के लिए न्यायालय जा सकती है।
PIL की शुरुआत 1980 के दशक में हुई और इसका श्रेय जस्टिस पी. एन.
भगवती को दिया जाता है।
जनहित याचिका को पोस्टकार्ड या साधारण आवेदन के माध्यम से भी दाखिल
किया जा सकता है।
PIL में महिला, बच्चे, अनुसूचित जाति/जनजाति, दिव्यांगजन और गरीब
वर्ग के मामलों को प्राथमिकता दी जाती है।
बाढ़, सूखा, भूकंप या औद्योगिक आपदा से पीड़ित लोग भी जनहित याचिका का
लाभ ले सकते हैं।
निःशुल्क कानूनी सहायता उन लोगों को मिलती है जिनकी वार्षिक आय 50,000 रुपये
से कम है।
भारत में न्यायालयों का ढाँचा तीन स्तरों में विभाजित है—केन्द्र
स्तर, राज्य स्तर और जनपद स्तर।
केन्द्र स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) स्थित होता है,
जो नई दिल्ली में है।
राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय (High Court) कार्य करता है।
जनपद स्तर पर जिला न्यायालय (District Court) कार्य करता है।
जिला न्यायालय के अंतर्गत सत्र न्यायालय (Sessions Court) फौजदारी
मामलों की सुनवाई करता है।
जिला न्यायालय के अंतर्गत दीवानी न्यायालय (Civil Court) दीवानी
मामलों की सुनवाई करता है।
सभी जनपदीय न्यायालय जिले के मुख्यालय पर स्थित होते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे ऊँचा न्यायालय है और इसके निर्णय सभी
न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं।
उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायालय होता है और यह जिला न्यायालयों पर
निगरानी रखता है।
जिला न्यायालय न्याय प्रणाली की प्राथमिक इकाई होती है जहाँ अधिकांश
मामले प्रारंभ होते हैं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय है, जिसका मुख्य
स्थान प्रयागराज (इलाहाबाद) में है।
दिल्ली उच्च न्यायालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का उच्च न्यायालय है, जिसका
स्थान नई दिल्ली में है।
मुम्बई उच्च न्यायालय महाराष्ट्र और गोवा राज्य के लिए कार्य करता है, जिसका
मुख्य स्थान मुम्बई है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय पश्चिम बंगाल का उच्च न्यायालय है, जिसका स्थान
कोलकाता में है।
मद्रास उच्च न्यायालय तमिलनाडु और पुडुचेरी के लिए कार्य करता है, जिसका
स्थान चेन्नई में है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान बेंगलुरु है।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय दोनों राज्यों के लिए कार्य करता है, जिसका
स्थान चंडीगढ़ है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का स्थान जबलपुर है।
राजस्थान उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान जोधपुर है (एक खंड
जयपुर में भी है)।
गुजरात उच्च न्यायालय का स्थान अहमदाबाद है।
दिल्ली उच्च न्यायालय राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का उच्च न्यायालय
है, जिसका स्थान नई दिल्ली में है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के लिए
कार्य करता है, जिसका मुख्य स्थान श्रीनगर (ग्रीष्मकालीन) और जम्मू (शीतकालीन) में है।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के लिए भी
कार्य करता है, जिसका स्थान चंडीगढ़ है।
मद्रास उच्च न्यायालय पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के लिए भी न्यायिक
क्षेत्राधिकार रखता है, जिसका स्थान चेन्नई में है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव केंद्र शासित
प्रदेश के मामलों को भी देखता है, जिसका स्थान मुम्बई है।
कोलकाता उच्च न्यायालय अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के लिए भी न्यायिक
अधिकार रखता है, जिसका स्थान कोलकाता में है।
केंद्र शासित प्रदेशों में कई मामलों की सुनवाई निकटवर्ती उच्च न्यायालयों
द्वारा की जाती है क्योंकि सभी UT के अलग उच्च न्यायालय नहीं होते।
दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में प्रत्यक्ष उच्च
न्यायालय व्यवस्था उपलब्ध है, जबकि अन्य UT में निकटवर्ती राज्यों के उच्च न्यायालय कार्य करते
हैं।