पृथ्वी से आकाश में दिखाई देने वाली सभी आकृतियाँ आकाशीय पिंड या खगोलीय पिंड
कहलाती हैं।
तारे गर्म प्रकार की गैसों के बने गोले हैं।
तारों में स्वयं द्वारा उत्पन्न प्रकाश एवं ऊष्मा होती है।
सूर्य भी एक तारा है।
आकाश में कुल 88 नक्षत्र मण्डल हैं।
हमारे सौर मण्डल में कुल 8 ग्रह हैं।
हमारी पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह चन्द्रमा है।
क्षुद्र ग्रह मंगल एवं वृहस्पति के मध्य पाए जाते हैं।
मंगल ग्रह के कुल 2 उपग्रह हैं।
सर्वाधिक उपग्रह वाला ग्रह शनि (146+) है।
प्रकाश वर्ष दूरी का मापक है।
सौर परिवार का मुखिया सूर्य है।
सप्तर्षि मण्डल एवं ध्रुवतारे की सहायता से उत्तर दिशा का निर्धारण किया जाता है।
सूर्य में मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैसें पायी जाती हैं।
सूर्य हमारी पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किमी दूर है।
सूर्य के प्रकाश की चाल 3 लाख किमी प्रति सेकंड है।
सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में लगभग 8 मिनट 19 सेकण्ड लगते हैं।
जो आकाशीय पिंड अपने तारों के चारों ओर निर्धारित कक्षा में चक्कर लगाते हैं, उन्हें
ग्रह कहते हैं।
सूर्य के सबसे पास ग्रह बुध है।
सबसे गर्म ग्रह शुक्र है।
सबसे बड़ा ग्रह बृहस्पति है।
वृहस्पति ग्रह के कुल 95 उपग्रह हैं।
चमकीला ग्रह शुक्र कहलाता है।
ग्रहों का अपनी धुरी पर घूमना परिभ्रमण कहलाता है।
ग्रहों का सूर्य के चारों ओर घूमना परिक्रमण कहलाता है।
सूर्य से दूरी के क्रम में पृथ्वी तीसरे स्थान पर है।
पृथ्वी आकार के क्रम में पाँचवे स्थान पर है।
पृथ्वी को नीला ग्रह इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें पानी की मात्रा अधिक है।
चन्द्रमा का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 1/4 हिस्सा है।
पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी लगभग 3,84,000 किमी है।
शुक्र और यूरेनस ग्रह अपने घूर्णन में सभी ग्रहों से अलग, घड़ी की सूई के विपरीत
दिशा में घूमते हैं।
बुध ग्रह सूर्य की परिक्रमा लगभग 88 दिन में पूरी करता है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 365 1/4 दिन में पूरी करती है।
24 अगस्त 2006 को अंतराष्ट्रीय खगोलीय संघ IAU ने प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटा
दिया।
हमारा सौरमण्डल मंदाकिनी आकाशगंगा में स्थित है।
आकाश गंगा के केन्द्र में एक विशाल ब्लैक होल है जो गुरुत्व
केन्द्र का कार्य करता है।
चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की तुलना में लगभग 1/6 है।
जिस रात चन्द्रमा थाली जैसा गोल दिखायी देता है, उसे पूर्णिमा कहते हैं।
जिस रात चन्द्रमा बिल्कुल दिखायी नहीं देता, उसे अमावस्या कहते हैं।
चन्द्रमा के आकार में रोजाना होने वाले बदलाव को चन्द्रमा की कलाएँ (Phases of
Moon) कहते हैं।
अमावस्या से पूर्णिमा तक के पखवारे को शुक्लपक्ष कहते हैं।
पूर्णिमा से अमावस्या तक के पखवाड़े को कृष्णपक्ष कहते हैं।
पृथ्वी के घूमने के कारण, एक पूर्णिमा से दूसरी पूर्णिमा तक चन्द्रमा को लगभग 29 दिन 12
घंटे 44 मिनट लगते हैं।
विश्व के प्रथम व्यक्ति जिसने अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा की, वह यूरी गागरिन (24
अप्रैल 1961 को ) थे।
यूरी गागरिन पूर्व सोवियत संघ (रूस) के निवासी थे।
यूरी गागरिन ने पृथ्वी की परिक्रमा वॉस्टॉक 1 अंतरिक्षयान से की।
पृथ्वी पर चन्द्रमा पर पहले कदम रखने वाले व्यक्ति थे नील आर्मस्ट्रांग (29 जुलाई
1969)।
नील आर्मस्ट्रांग चन्द्रमा पर अपोलो-2 अंतरिक्षयान से पहुँचे थे।
नील आर्मस्ट्रांग संयुक्त राज्य अमेरिका के निवासी थे।
अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले प्रथम भारतीय राकेश शर्मा थे।
राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष यात्रा सोयूज टी-11 अंतरिक्षयान से की।
जिन वस्तुओं के आर-पार प्रकाश न जा सके, उन्हें अपारदर्शी वस्तुएँ कहते हैं।
जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक सीधी रेखा में स्थित हों, तो यह स्थिति युति (सिजिगी
) कहलाती है।
सिजिगी दो प्रकार की होती है युति और वियुती ।
जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आ जाता है, तो इसे युति (सूर्य ग्रहण) कहते
हैं।
युति की घटना अमावस्या को होती है।
युति की स्थिति में चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है, जिससे सूर्यग्रहण होता
है।
जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है, तब इस स्थिति को वियुति कहते है।
वियुति की घटना पूर्णिमा को होती है।
वियुति की स्थिति में पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है, जिससे होता है
चन्द्रग्रहण।
पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5° झुकी हुई है।
चन्द्रमा का कक्षा तल पृथ्वी के कक्ष तल से लगभग 5° का कोण बनाता है।
रात को आकाश में सबसे चमकीला आकाशीय पिंड है चन्द्रमा।
भू-आभ (Geoid) का अर्थ है पृथ्वी के समान आकार।
पृथ्वी को लघुरूप में वास्तविक प्रतिरूप कहते हैं ग्लोब।
वह काल्पनिक रेखा जो ध्रुवों से बराबर दुरी पर है और पृथ्वी को दो बराबर भागों में बाँटती है,
भूमध्य रेखाकहलाती है ।
भूमध्य रेखा को Equator (विषुवत रेखा) के नाम से भी जाना जाता है।
भूमध्य रेखा के उत्तर का भाग उत्तरी गोलाई कहलाता है ।
भूमध्य रेखा के दक्षिण का भाग दक्षिणी गोलाई कहलाता है ।
किसी स्थान या बिंदु की भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की कोणीय दूरी की माप को कहते हैं
अक्षांश।
सबसे लंबी अक्षांश रेखा है भूमध्य रेखा।
भूमध्य रेखा की लंबाई लगभग 40,076 किमी है।
90° उत्तरी अक्षांश की लंबाई शून्य है।
अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 181 है।
0° अक्षांश को कहते हैं भूमध्य रेखा।
23.5° उत्तरी अक्षांश को कर्क रेखा कहते हैं ।
23.5° दक्षिणी अक्षांश को मकर रेखा कहते हैं ।
66.5° उत्तरी अक्षांश को आर्कटिक रेखा कहते हैं ।
66.5° दक्षिणी अक्षांश को अंटार्कटिक रेखा कहते हैं ।
उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली अर्धवृत्ताकार काल्पनिक रेखाएँ देशान्तर
रेखाएँ कहलाती हैं।
ग्लोब पर देशान्तर रेखाओं की कुल संख्या 360 होती है।
ध्रुवों पर सभी देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी शून्य होती है।
अक्षांश वृत्तों के विपरीत सभी देशान्तर रेखाओं की लंबाई समान होती है।
लंदन के निकट ग्रीनविच वेधशाला से गुजरने वाली रेखा को 0° देशान्तर /
प्रधान देशान्तर / ग्रीनविच रेखा कहते हैं।
0° देशान्तर तथा 180° पूर्वी/पश्चिमी देशान्तर मिलकर एक महान
वृत्त बनाते हैं, जो पृथ्वी को पूर्वी गोलार्द्ध एवं पश्चिमी गोलार्द्ध में
विभाजित करता है।
स्थानीय समय का निर्धारण सूर्य द्वारा बनने वाली छाया के आधार पर किया जाता है।
जब सूर्य किसी स्थान पर आकाश में सबसे अधिक ऊँचाई पर होता है, तब वहाँ मध्याह्न (दिन के 12
बजे) होता है।
एक ही देशान्तर रेखा पर स्थित सभी स्थानों का स्थानीय समय समान
होता है।
पृथ्वी अपने काल्पनिक अक्ष पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है।
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है।
पृथ्वी की घूर्णन गति 15° देशान्तर प्रति घंटा होती है।
पृथ्वी को 1° देशान्तर घूमने में लगभग 4 मिनट का समय लगता है।
भारत के सबसे पूर्वी और पश्चिमी सिरों के बीच लगभग 29° देशान्तरीय विस्तार है।
भारत में 82½° पूर्वी देशान्तर को मानक मध्याह्न रेखा माना गया
है।
IST की पूर्ण रूप Indian Standard Time है।
G.M.T. की फुलफॉर्म है: Greenwich Mean Time
भारतीय मानक समय (IST) ग्रीनविच मानक समय (GMT) से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
कनाडा में 6 मानक समय कटिबंध हैं।
यदि ग्रीनविच पर घड़ियों में शाम के 4 बजे हो तो भारत भारत की घड़ियों में समय होगा 9:30
PM।
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को 180° देशांतर रेखा माना गया है।
प्रधान देशांतर रेखा के ठीक विपरीत 180° देशांतर रेखा होती है।
अक्षांश और देशांतर का मापन अंश में किया जाता है।
सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई बराबर होती है।
पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना परिभ्रमण कहलाता है।
पृथ्वी द्वारा अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करना परिक्रमण कहलाता
है।
पृथ्वी का अक्ष पृथ्वी के कक्षा-तल से 23.5° झुका हुआ है।
एक पृथ्वी दिवस का समय 24 घंटे है।
पृथ्वी की दैनिक गति के कारण दिन और रात होते हैं।
पृथ्वी सूर्य से प्रकाश एवं ऊष्मा प्राप्त करती है।
पृथ्वी (ग्लोब) पर जो रात्रि और दिवस को विभाजित करता है, उसे प्रदीप्ति वृत्त
कहते हैं।
पृथ्वी की वार्षिक गति का समय 365¼° दिन है।
अधिवर्ष में फरवरी के दिन 29 होते हैं।
अधिवर्ष में कुल दिन 366 होते हैं।
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार पथ पर परिक्रमा करती है।
पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुके रहने और परिक्रमा करने के कारण ऋतु परिवर्तन होता है।
पृथ्वी सूर्य के सर्वाधिक निकट 3 जनवरी को होती है।
पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर 4 जुलाई को होती है।
सूर्य से प्रकाश एवं ऊष्मा के रूप में प्राप्त ऊर्जा को सूर्यातप कहते हैं।
यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी न होती, तो वर्षभर दिन और रात समान समान होते।
सूर्य कर्क रेखा पर सीधा 21 जून को चमकता है।
21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर सीधा चमकता है। इस स्थिति को उत्तरायण कहते हैं।
सूर्य मकर रेखा पर सीधा 22 दिसंबर को चमकता है।
22 दिसंबर को सूर्य मकर रेखा पर सीधा चमकता है। इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं।
सूर्य जब दक्षिणायन होता है, तो उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है।
सूर्य जब भूमध्य रेखा पर आता है, तो उत्तरी गोलार्ध में वसन्त और शरद ऋतु होती है।
सूर्य भूमध्य रेखा पर सीधा 21 मार्च और 23 सितम्बर को चमकता है।
पूरी पृथ्वी पर दिन और रात समान 21 मार्च और 23 सितम्बर को होती है।
वसंत विषुव 21 मार्च को होता है।
शिशिर विषुव 23 सितम्बर को होता है।
उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है 21 मार्च से 23 सितम्बर के दौरान।
दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है 23 सितम्बर से 21 मार्च के दौरान।
उत्तरी ध्रुव का सूर्य की ओर झुकाव अधिकतम 21 जून को होता है (दिन सबसे बड़ा)।
दक्षिणी ध्रुव का सूर्य की ओर झुकाव अधिकतम 22 दिसंबर को होता है (दिन सबसे बड़ा)।
कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य के क्षेत्र को ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं।
कर्क रेखा और आर्कटिक वृत्त तथा मकर रेखा और अंटार्कटिक वृत्त के बीच के क्षेत्र को शीतोष्ण
कटिबंधीय क्षेत्र कहते हैं।
आर्कटिक वृत्त के उत्तर और अंटार्कटिक वृत्त के दक्षिणी क्षेत्र को शीत कटिबन्ध
कहते हैं।
उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर दिन की अवधि 6 माह होती है।
लीप वर्ष हर चौथे वर्ष आता है।
सामान्य रूप से पृथ्वी या उसके किसी भाग का समतल पर समान अनुपात में प्रदर्शन
मानचित्र कहलाता है।
ध्रुव तारा किस दिशा में रहता है? उत्तर दिशा
दिक्सूचक यंत्र (Compass) की चुम्बकीय सुई सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में रुकती है।
स्थल की वास्तविक दूरी और मानचित्र पर दिखाई गई दूरी का अनुपात पैमाना कहलाता है।
मानचित्र में जलाशय को नीले रंग से दर्शाया जाता है।
मानचित्र में पर्वत को भूरे रंग से दर्शाया जाता है।
मानचित्र में पठार को पीले रंग से दर्शाया जाता है।
मानचित्र में मैदान को हरे रंग से दर्शाया जाता है।
किसी दूर स्थित स्थान, वस्तु, घटना या धरातल के बारे में बिना वहाँ गए, सूचना अथवा जानकारी प्राप्त
करना सुदूर संवेदन (Remote Sensing) कहलाता है।
सुदूर संवेदन द्वारा अनेक भूगोलिक जानकारियाँ प्राप्त करना, प्राप्त जानकारियों को कम्प्यूटर के
माध्यम से एकीकृत एवं समन्वित करना और विश्लेषण द्वारा नये निष्कर्ष एवं सूचनाएँ प्राप्त करना GIS
(Geographic Information System) कहलाता है।
G.I.S. की फुलफॉर्म है Geographic Information System (भौगोलिक सूचना प्रणाली)।
पृथ्वी की प्राकृतिक स्वरूप जैसे पर्वत, पठार, मैदान, नदी, महासागर आदि को दर्शाने वाले मानचित्रों
को भौंतिक मानचित्र कहते हैं।
राज्यों, नगरों, गाँव और विश्व के विभिन्न देशों, राज्यों तथा उनकी सीमाओं को दर्शाने वाले मानचित्र
को राजनैतिक मानचित्र कहते हैं।
सड़क, नदियाँ, वर्षा, वन तथा उद्योग आदि के वितरण को दर्शाने वाले मानचित्र को थीमैटिक
मानचित्र कहते हैं।
भूमि का बंटवारा, सिंचित क्षेत्र, विभिन्न प्रकार के भू-उपयोग, कार्यालय, विद्यालय, औद्योगिक
क्षेत्रों को दिखाने वाले मानचित्रों को भू-राजस्व मानचित्र कहते हैं।
समस्त भूमंडल को 4 परिमंडलों में बाँटा गया है?
1) स्थलमंडल
2) जलमंडल
3) वायुमंडल
4) जैवमंडल
पृथ्वी का वह भाग जहाँ जलमंडल, स्थलमंडल, वायुमंडल तीनों एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, वह
जैवमंडल कहलाता है।
पृथ्वी के केंद्र को रोड़ क्कहा जाता है क्रोड़ के ऊपर की परत को
मैन्टल कहा जाता है और मैन्टल की बाहरी परत को भूपर्पटी कहा जाता है
पृथ्वी के चारों परिमंडलों के नाम की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है।
'Lithos' का अर्थ है पत्थर।
'Atmos' का अर्थ है वाष्प/वायु।
'Hydor' का अर्थ है जल।
'बायोस ' का अर्थ है जीवन ।
स्थल पर किसी स्थान की ऊँचाई अथवा महासागर में गहराई समुद्र तल से मापी जाती है।
स्थल पर किसी स्थान की ऊँचाई अथवा महासागर में किसी स्थान की गहराई को समुद्र तल
से मापा जाता है
विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट हिमालय पर्वत में स्थित है।
माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848 मीटर है।
विश्व का सबसे गहरा भाग प्रशांत महासागर में स्थित मारियाना ट्रेंच है।
मारियाना ट्रेंच की गहराई 11,022 मीटर है।
पृथ्वी पर स्थित विशाल भू खण्डों को महाद्वीप कहा जाता है
विश्व के महाद्वीपों की संख्या 7 है। ---> 1. एशिया , 2. अफ्रीका , 3. उत्तरी
अमेरिका , 4. दक्षिणी अमेरिका , 5. अन्टार्कटिका , 6. यरोप , 7. ऑस्ट्रेलिया
स्थल भाग का अधिकांश हिस्सा उत्तरी गोलार्ध में है
सबसे बड़ा महाद्वीप एशिया है। यहाँ विश्व का लगभग एक तिहाई
भू-भाग और 60 %जनसंख्या पायी जाती है
भारत एशिया महाद्वीप में स्थित है
एशिया महाद्वीप के उत्तर में आर्कटिक महासागर और दक्षिण में हिन्द
महासागर है
एशिया महाद्वीप के पश्चिम में स्थित महाद्वीप यूरोप है।
यूरोप और एशिया मिलकर यूरेशिया कहलाते हैं।
दुनिया की छत तिब्बत का पठार है।
अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग पठार है। यह एशिया के बाद दूसरा सर्वाधिक
क्षेत्रफल वाला महाद्वीप है
विषुवत रेखा, कर्क रेखा एवं मकर रेखा तीनो अफ्रीका महाद्वीप से गुजरती हैं।
अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में सहारा मरुस्थल स्थित है
अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में एटलस पर्वत है।
मिस्र देश में विश्व की सबसे लंबी नदी नील बहती है और यह अफ्रीका
महाद्वीप में है।
कांगो नदी भूमध्य रेखा को दो बार काटती है।
लिम्पोपो नदी मकर रेखा को दो बार काटती है।
पिरामिडों के लिए प्रसिद्ध देश मिस्र है।
अफ्रीका महाद्वीप का विक्टोरिया जल प्रपात विश्व प्रसिद्ध है
सबसे पहले मानव का जन्म और विकास अफ्रीका महाद्वीप पर हुआ।
अफ्रीका महाद्वीप का दो तिहाई भाग भूमध्य रेखा के उत्तर तथा एक तिहाई भाग
भूमध्य रेखा के दक्षिण में पड़ता है
अमेरिका की खोज कोलमबस ने की
वेस्ट इंडीज के उत्तर पश्चिम में उत्तरी अमेरिका महाद्वीप स्थित है
उत्तरी अमेरिका के पश्चिम में प्रशांत महासागर है।
उत्तरी अमेरिका के पूर्व में अटलांटिक महासागर है।
उत्तरी अमेरिका के उत्तर में आर्कटिक महासागर (उत्तरी ध्रुव महा सागर ) है।
उत्तरी अमेरिका महाद्वीप से होकर कर्क रेखा गुजरती है
उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के बीच पनामा नहर बनाई गई है।
पनामा नहर अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है।
उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी भाग में रॉकी पर्वत स्थित है।
उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग में अप्लेशियन पर्वत श्रेणी है।
उत्तरी अमेरिका के मध्य में उत्तर से दक्षिण मिसिसिपी- मिसौरी नदी बहती है।
दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप , उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है इसका अधिकांश भाग
दक्षिणी गोलार्द्ध में है
अमेज़न घाटी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में स्थित है।
लम्बाई की द्रष्टि से सबसे लम्बी नदी नील नदी (अफ्रीका महाद्वीप ) में स्थित है
जबकि अपवाह (आयतन) की द्रष्टि से विश्व की सबसे बड़ी नदी अमेजन नदी (दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप ) में
स्थित है
एण्डीज पर्वत श्रृंखला दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के पश्चिमी भाग में उत्तर से
दक्षिण तक फैली हुई है।
यूराल तथा काकेशस पर्वत एशिया और यूरोप महाद्वीपों को अलग करते
हैं।
यूरोप महाद्वीप के उत्तर में आर्कटिक महासागर स्थित है।
यूरोप महाद्वीप के दक्षिण में भूमध्य सागर है।
अंटार्कटिक महाद्वीप दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणी ध्रुव के आसपास है
वर्ष भर मोटी बर्फ की सफेद चादर से ढका महाद्वीप अंटार्कटिका है।
अंटार्कटिक महाद्वीप पर भारत ने तीन शोध केंद्र खोले है जिनके नाम है - 1. दक्षिणी गंगोत्री
, 2. मैत्री , 3. भारती
कंगारू जानवर ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में पाया जाता है।
सबसे छोटा महाद्वीप ऑस्ट्रेलिया है।
ऑस्ट्रेलिया दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है।
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप भूमध्य रेखा के दक्षिण में है।
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के मध्य होकर मकर रेखा गुजरती है।
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के पूर्व में स्थित पर्वतमाला का नाम ग्रेट डिवाइडिंग रेंज
है।
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप चारों ओर महासागरो से घिरा होने के कारण द्वीपीय स्थिति में है इसलिए इसे
द्वीपीय महाद्वीप भी कहते है
मरे व डार्लिंग नदियाँ ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में बहती है
ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति का नाम ग्रेट बैरियर
रीफ है।
विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रशांत महासागर में स्थित है।
विश्व में कुल महासागरों की संख्या 5 है।
महासागर के नाम हैं: प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिन्द महासागर, आर्कटिक महासागर,
दक्षिणी महासागर
सबसे बड़ा महासागर प्रशांत महासागर है।
भारत के दक्षिण में स्थित महासागर हिन्द महासागर है।
पृथ्वी का जल वायुमंडल में पहुँचता है वाष्पीकरण की प्रक्रिया द्वारा।
जलवाष्प के ठंडा होकर पुनः द्रव अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं।
वायुमण्डल की कुल 5 परतें होती हैं।
वायुमण्डल की परतें हैं – क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल और
बहिर्मण्डल।
वायुमण्डल में नाइट्रोजन गैस की मात्रा लगभग 78% होती है।
वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 21% होती है।
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग 0.04% होती है।
प्राणवायु ऑक्सीजन गैस को कहते हैं।
जीव-जन्तुओं और पौधों की वृद्धि के लिए नाइट्रोजन गैस आवश्यक होती है।
ऊँचाई बढ़ने के साथ हवा का घनत्व घटता जाता है।
धरातल से ऊँचाई बढ़ने पर वायु का तापमान घटता (6.5 डिग्री सेल्सियस /किमी ) जाता
है।
धरातल से ऊँचाई बढ़ने पर वायु का दाब घटता जाता है।
हमारी पृथ्वी का लगभग तीन चौथाई (71%) भाग जल तथा लगभग एक चौथाई
(29%) स्थल है।
:contentReference[oaicite:0]{index=0} का क्षेत्रफल लगभग 16.5 करोड़ वर्ग किमी
है।
समुद्री तल को शून्य ऊँचाई वाला माना जाता है।
जल चक्र का तात्पर्य जल के तीनों रूपों के आपसी परिवर्तन से है।
वह गैसीय आवरण, जो आकाश में लगभग 1600 किमी ऊँचाई तक फैला हुआ है और पृथ्वी के
साथ-साथ घूमता रहता है, वायुमण्डल कहलाता है।
वायुमण्डल का लगभग 3/4 भाग धरातल के निकट पाया जाता है।
ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायु विरल होती जाती है।
समुद्री क्षेत्रों पर हवा का घनत्व अधिक होता है।
वनस्पतियों, शाकाहारी तथा मांसाहारी जीवों के सम्मिलित रूप को स्थलीय जैव मण्डल
कहा जाता है।
भारत की राजधानी नई दिल्ली है।
भारत में कुल 28 राज्य तथा 8 केन्द्रशासित प्रदेश हैं।
भारत उत्तरी गोलार्ध में स्थित है।
भारत एशिया महाद्वीप में स्थित है।
दक्षिण से उत्तर की ओर भारत की मुख्य भूमि का विस्तार 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी
अक्षांश के बीच है।
दक्षिण से उत्तर की ओर भारत की मुख्य भूमि का विस्तार 29°2′ है।
भारत का वास्तविक उत्तर–दक्षिण विस्तार इंदिरा पॉइंट (6°45′ उत्तरी अक्षांश) से
माना जाता है, जो ग्रेट निकोबार द्वीप समूह का दक्षिणतम बिंदु है।
भारत की मुख्य भूमि का पश्चिम से पूर्व विस्तार 68°7′ पूर्वी देशान्तर से
97°25′ पूर्वी देशान्तर के बीच है।
पश्चिम से पूर्व दिशा में भारत की मुख्य भूमि का देशान्तरीय विस्तार लगभग 29°18′
है।
भारत पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से पश्चिम में कच्छ तक लगभग
2933 किमी चौड़ा है तथा उत्तर में जम्मू-कश्मीर से दक्षिण में
कन्याकुमारी तक लगभग 3214 किमी लंबा है।
भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है।
विश्व में कुल 197 देश हैं।
प्रत्येक 1° देशांतर के लिए स्थानीय समय में 4 मिनट का अंतर होता
है।
भारत की मानक समय रेखा 82½° पूर्वी देशांतर को माना गया है, जो ग्रीनविच समय से
5 घंटे 30 मिनट आगे है।
भारत की मानक समय रेखा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) के पास
मिर्जापुर से होकर गुजरती है।
अधिक देशान्तरीय विस्तार के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका में 7,
कनाडा में 6 तथा रूस में 11 मानक समय लागू हैं।
तीन तरफ पानी से घिरा होने के कारण भारत को प्रायद्वीपीय देश कहा जाता है।
भारत में कुल दो द्वीप समूह पाए जाते हैं।
लक्षद्वीप द्वीपसमूह भारत का एक प्रमुख द्वीप समूह है।
अण्डमान एवं निकोबार द्वीपसमूह भारत का दूसरा प्रमुख द्वीप समूह है।
अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश एवं म्यांमार – इन सात
देशों की स्थलीय सीमाएँ भारत से जुड़ी हुई हैं, जबकि श्रीलंका और मालदीव भारत के
पड़ोसी द्वीपीय देश हैं।
भारत की मानक समय रेखा पाँच राज्यों से होकर गुजरती है।
भारत की मानक समय रेखा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र
प्रदेश राज्यों से होकर गुजरती है।
पश्चिम से पूर्व भारत की मुख्य भूमि का विस्तार लगभग 2933 किमी है।
दक्षिण से उत्तर भारत की मुख्य भूमि का विस्तार लगभग 2770 किमी है।
भारत का वास्तविक दक्षिणतम बिंदु इंदिरा प्वाइंट है, जो 6°45′ उत्तरी
अक्षांश पर स्थित है और ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में है।
भारत उत्तर में जम्मू एवं कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी
तक लगभग 3214 किमी लंबा है।
यदि लंदन में सुबह 6:00 बजे हैं, तो उसी समय भारत में दोपहर
11:30 बजे होते हैं।
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे छोटा राज्य गोवा है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तर प्रदेश राज्य का स्थान चौथा है।
जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश राज्य का स्थान प्रथम है।
जनसंख्या की दृष्टि से भारत का सबसे छोटा राज्य सिक्किम है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है।
लक्षद्वीप समूह अरब सागर में स्थित है।
अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में स्थित है।
भारतीय मानक समय (IST) की स्थापना 1 सितम्बर 1947 को हुई थी।
भारतीय मानक समय (IST) ग्रीनविच माध्य समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे (GMT
+5:30) है।
दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव अब अलग-अलग नहीं हैं 26 जनवरी 2020 से दोनों
मिलकर एक ही केन्द्र शासित प्रदेश हैं।
भारत का भौतिक स्वरूप अत्यंत विविधतापूर्ण है, जिसमें पर्वत, मैदान, पठार,
मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीपसमूह शामिल हैं।
भारत के भौतिक स्वरूप को मुख्यतः पाँच भागों में बाँटा गया है।
भारत के पाँच प्रमुख भौतिक भाग हैं — उत्तर का पर्वतीय भाग, उत्तर का मैदानी भाग, थार का
मरुस्थल, दक्षिण का पठारी भाग तथा समुद्र तटीय मैदान एवं द्वीपसमूह।
टेथीज सागर आज से करोड़ों वर्ष पूर्व हिमालय पर्वत के स्थान पर स्थित था।
अंगारालैण्ड टेथीज सागर के उत्तर में तथा गोंडवानालैण्ड दक्षिण
में स्थित भू-भाग थे।
नदियों द्वारा लाया गया मलबा टेथीज सागर की तलहटी में परतों के रूप में जमा होता
गया।
पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण जमा हुआ परतदार मलबा ऊपर उठकर मोड़दार पर्वत बन
गया, जिससे हिमालय का निर्माण हुआ।
हिमालय विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला मानी जाती है।
हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी सीमा पर पश्चिम में जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्व में
अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ है।
हिमालय की चौड़ाई पश्चिम में अधिक तथा पूर्व में कम है।
हिमालय शब्द का अर्थ है — हिम + आलय, अर्थात बर्फ का
घर।
उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को चार समानान्तर श्रेणियों में बाँटा जाता है।
ट्रांस हिमालय को हिमालय-पार क्षेत्र भी कहा जाता है।
ट्रांस हिमालय क्षेत्र में मुख्यतः कराकोरम, लद्दाख एवं कैलाश पर्वत श्रेणियाँ
सम्मिलित हैं।
के-2 कराकोरम श्रेणी का सर्वोच्च पर्वत शिखर है, जिसकी ऊँचाई 8,611
मीटर है।
हिमाद्रि श्रेणी हिमालय की सबसे उत्तरी पर्वत श्रृंखला है।
हिमाद्रि को वृहद हिमालय भी कहा जाता है।
हिमाद्रि श्रेणी में विश्व के अनेक ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखर स्थित हैं।
माउंट एवरेस्ट संसार का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर है और यह हिमाद्रि श्रेणी में स्थित
है।
माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 8,850 मीटर है।
हिमाद्रि श्रृंखला पर अनेक हिमनद (Glacier) पाए जाते हैं, जिनसे
कई नदियाँ निकलती हैं।
हिमाचल श्रेणी हिमाद्रि श्रृंखला के दक्षिण में स्थित है।
हिमाचल श्रेणी को मध्य हिमालय भी कहा जाता है।
हिमाचल श्रेणी में श्रीनगर, शिमला, कुल्लू, डलहौजी, नैनीताल, अल्मोड़ा और
दार्जिलिंग जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल स्थित हैं।
कश्मीर घाटी हिमाद्रि और हिमाचल श्रृंखला के बीच स्थित एक रमणीक घाटी है।
डल झील कश्मीर घाटी का प्रमुख पर्यटन आकर्षण है।
शिवालिक श्रेणी हिमालय की सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला है।
शिवालिक श्रेणी को उपहिमालय भी कहा जाता है।
शिवालिक श्रेणी कम ऊँचाई वाली पर्वत श्रृंखला है, जहाँ घने वन पाए जाते हैं।
हिमालय पर्वत भारत के उत्तर में एक पहरेदार की तरह स्थित है और बाहरी आक्रमणों से
रक्षा करता है।
हिमालय पर्वत उत्तर से आने वाली ठण्डी हवाओं को रोककर भारत की जलवायु को अत्यधिक
शुष्क और ठण्डी होने से बचाता है।
हिमालय पर्वत दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं को रोककर वर्षा कराने में सहायक होता
है।
हिमालय पर्वत से अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं,
जिनका उपयोग रोगों के उपचार में किया जाता है।
हिमालय के रमणीक स्थल पर्यटन को बढ़ावा देकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते
हैं।
भाबर क्षेत्र शिवालिक के सहारे 8 से 16 किमी चौड़ाई में फैला अवसादी क्षेत्र है।
भाबर क्षेत्र में नदियाँ पत्थरों और अवसादों के नीचे विलुप्त हो जाती हैं।
तराई क्षेत्र भाबर के दक्षिण में स्थित नम एवं दलदली क्षेत्र है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में जैव-विविधता युक्त विस्तृत वन पाए जाते हैं।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान भाबर एवं तराई क्षेत्र में स्थित है।
हिमालय के दक्षिण में भारत का विशाल मैदानी भाग स्थित है।
भारत का उत्तरी मैदानी भाग विश्व का सबसे विस्तृत समतल मैदान माना जाता है।
भारत का विशाल मैदानी भाग लगभग 2400 किमी लंबाई में फैला हुआ है।
जलोढ़ मिट्टी नदियों द्वारा लाई गई अत्यंत महीन एवं उपजाऊ मिट्टी होती है।
भारत के उत्तरी मैदान का ढाल पश्चिम से पूरब की ओर है।
उत्तरी मैदान सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई
जलोढ़ मिट्टी से बना है।
नदी-तन्त्र किसी मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों के समूह को कहा जाता है।
सहायक नदी वह नदी होती है, जो अपना जल मुख्य नदी में विसर्जित करती है।
नदी-तन्त्र के आधार पर उत्तरी मैदान को तीन भागों में बाँटा गया है।
उत्तरी मैदान के तीन प्रमुख नदी-तन्त्र हैं — सिन्धु नदी-तन्त्र, गंगा नदी-तन्त्र तथा
ब्रह्मपुत्र नदी-तन्त्र।
सिन्धु नदी-तन्त्र की मुख्य नदी सिन्धु है।
सिन्धु नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, सतलज, रावी और ब्यास हैं।
सिन्धु नदी का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट है।
सिन्धु नदी-तन्त्र जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में फैला हुआ है।
गंगा नदी-तन्त्र की मुख्य नदी गंगा है।
गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना, घाघरा, गण्डक, गोमती और कोसी हैं।
गंगा नदी-तन्त्र उत्तरी मैदान के अधिकांश भाग में विस्तृत है।
गंगा नदी का उद्गम हिमालय स्थित गंगोत्री हिमनद से होता है।
ब्रह्मपुत्र नदी-तन्त्र की मुख्य नदी ब्रह्मपुत्र है।
ब्रह्मपुत्र नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ लोहित, दिबांग और तिस्ता हैं।
ब्रह्मपुत्र नदी-तन्त्र अरुणाचल प्रदेश और असम में विस्तृत है।
ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम भी तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट
है।
नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बने मैदान कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ होते हैं।
उपजाऊ भूमि के कारण उत्तरी मैदानों में कृषि एवं पशुपालन आधारित उद्योगों का विकास
हुआ है।
मैदानी भूमि समतल होने के कारण यहाँ सड़क और रेल परिवहन का विकास आसानी से हुआ है।
नदियों से नहरें निकालकर सिंचाई एवं जल-परिवहन का विकास किया जाता है।
ब्रह्मपुत्र नदी चीन, भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है।
ब्रह्मपुत्र नदी को चीन में सांगपो तथा बांग्लादेश में मेघना या
जमुना कहा जाता है।
गंगा नदी को बांग्लादेश में पद्मा नाम से जाना जाता है।
भारत के पश्चिमी भाग में स्थित मरुस्थल को थार का मरुस्थल या भारतीय
महामरुस्थल कहा जाता है।
थार का मरुस्थल भारत के उत्तरी मैदान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल के पूर्वी भाग में स्थित है।
थार का मरुस्थल पाकिस्तान की सीमा तक फैला हुआ है।
थार का मरुस्थल शुष्क, गर्म और रेतीला क्षेत्र है।
मरुस्थलीय क्षेत्र में वनस्पति की मात्रा बहुत कम पाई जाती है।
साँभर झील थार क्षेत्र की प्रसिद्ध खारे पानी की झील है।
साँभर झील से नमक का उत्पादन किया जाता है।
दक्षिण का पठारी भाग उत्तर के विशाल मैदान और तटीय भागों के बीच स्थित है।
दक्षिण का पठार प्राचीन कठोर चट्टानों से मिलकर बना है।
दक्षिण के पठार की आकृति त्रिभुजाकार है।
दक्षिण के पठार का धरातल ऊँचा-नीचा है तथा यहाँ अनेक पहाड़ियाँ और घाटियाँ स्थित
हैं।
दक्षिण का पठार उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वत से घिरा है।
दक्षिण का पठार उत्तर में विन्ध्य एवं सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है।
पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट दक्षिण के पठार की सीमाएँ बनाते हैं।
दक्षिण के पठार के प्रमुख भाग हैं — मालवा का पठार, छोटा नागपुर पठार और दक्कन का
पठार।
मालवा का पठार दक्षिण के पठार के पश्चिमी भाग में स्थित है।
मालवा का पठार उत्तर की ओर ढालदार है।
चम्बल और बेतवा नदियों का उद्गम मालवा के पठार
से
होता है।
छोटा नागपुर पठार दक्षिण के पठार के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है।
छोटा नागपुर पठार लोहा और कोयला जैसे खनिजों से समृद्ध है।
दक्कन का पठार विन्ध्य एवं सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के दक्षिण में स्थित है।
दक्कन के पठार का ढाल पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर है।
महानदी, गोदावरी और कावेरी नदियाँ दक्कन के पठार से निकलकर बंगाल की खाड़ी में
गिरती
हैं।
नर्मदा और तापी नदियाँ पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं।
पठार वह स्थलरूप है, जो पर्वत से नीचे और मैदान से ऊँचा होता है तथा जिसका ऊपरी
भाग
सपाट होता है।
पश्चिमी घाट को सह्याद्रि भी कहा जाता है।
पश्चिमी घाट का विस्तार एकसमान है, जबकि पूर्वी घाट बीच-बीच में
कटा-फटा है।
दक्षिण के पठार की प्राचीन शैलों में अधिकांश खनिज पदार्थ पाए
जाते हैं।
प्रायद्वीपीय पठार में तीव्र ढाल होने के कारण जल विद्युत उत्पादन केन्द्रों की
स्थापना आसानी से की जा सकती है।
दक्षिण के पठार में सागौन, चन्दन तथा अन्य बहुमूल्य वृक्ष पाए
जाते हैं।
दक्षिण के पठार के पर्वत दक्षिण-पश्चिम मानसून को रोककर पश्चिमी तट पर वर्षा कराने
में सहायक होते हैं।
तटीय मैदान पश्चिमी घाट के पश्चिम तथा पूर्वी घाट के पूर्व में स्थित हैं।
पश्चिमी तटीय मैदान संकरे होते हैं, जबकि पूर्वी तटीय मैदान
अपेक्षाकृत चौड़े होते हैं।
पश्चिमी तटीय मैदान में कोई बड़ी नदी नहीं बहती है।
महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियाँ पूर्वी तटीय मैदान से होकर बहती हैं।
पूर्वी तटीय मैदान की नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले डेल्टा का निर्माण
करती हैं।
डेल्टा नदी के मुहाने पर बनने वाला त्रिभुजाकार भू-भाग होता है।
गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियाँ विश्व के सबसे बड़े डेल्टा सुन्दरवन का
निर्माण करती हैं।
पूर्वी तटीय मैदान की प्रमुख झीलें चिल्का, कोलेरू और पुलीकट हैं।
भारत के दो प्रमुख द्वीपसमूह हैं — लक्षद्वीप तथा अण्डमान और निकोबार
द्वीपसमूह।
लक्षद्वीप द्वीपसमूह अरब सागर में स्थित है।
लक्षद्वीप द्वीपसमूह मूँगे (Corals) से निर्मित है।
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह बंगाल की खाड़ी में स्थित है।
अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह के द्वीप अपेक्षाकृत बड़े हैं।
पूर्वी तटीय मैदान अत्यंत उपजाऊ है, जहाँ चावल की अच्छी खेती होती है।
पश्चिमी तटीय मैदान में मसाले, नारियल और रबड़ की खेती की जाती है।
भारत के व्यापार, पर्यटन और सुरक्षा की दृष्टि से द्वीपसमूहों का विशेष महत्व है।
वातावरण की विभिन्न स्थितियों जैसे गर्मी, सर्दी और वर्षा को मौसम कहा जाता है।
बादल, हवा, वर्षा, हिम, ताप, कोहरा और पाला मौसम के प्रमुख संकेतक तत्व हैं।
मौसम को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कारक तापमान, वायुदाब और आर्द्रता हैं।
जब एक समान वातावरणीय स्थिति लगभग 2 से 3 महीने तक बनी रहती है, तो उसे ऋतु कहते हैं।
भारत में सामान्यतः चार प्रमुख ऋतुएँ पाई जाती हैं।
दिसम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु रहती है।
मार्च से मई तक ग्रीष्म ऋतु रहती है।
जून से सितम्बर तक वर्षा ऋतु रहती है।
अक्टूबर से नवम्बर तक शरद ऋतु रहती है।
शीत ऋतु में सूर्य की किरणें भारतीय भू-भाग पर तिरछी पड़ती हैं।
शीत ऋतु में उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में कम ठण्ड पड़ती है।
शीत ऋतु में पहाड़ों पर बर्फ जमने के कारण उत्तर भारत के मैदानों में शीत लहर चलती है।
शीत ऋतु में किसान रबी फसलों की बुआई करते हैं।
मौसम वायुमण्डल में तापमान, वायुदाब और आर्द्रता के कारण होने वाला दैनिक परिवर्तन है।
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें भारतीय भू-भाग पर सीधी पड़ती हैं।
ग्रीष्म ऋतु में उत्तर भारत के मैदानों में चलने वाली गर्म और शुष्क हवाओं को लू कहते हैं।
ग्रीष्म ऋतु में कभी-कभी आँधी भी चलती है।
ग्रीष्म ऋतु में किसान जायद फसलों की बुआई करते हैं।
आम का फल मुख्यतः ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होता है।
वर्षा ऋतु में हवाएँ बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से स्थल की ओर बहती हैं।
वर्षा ऋतु में पहाड़ों से टकराने पर नमी वाली हवाओं से वर्षा होती है।
वर्षा ऋतु में नदियाँ पानी से भर जाती हैं और कहीं-कहीं बाढ़ की स्थिति बन जाती है।
वर्षा ऋतु में किसान खरीफ फसलों की बुआई करते हैं।
शरद ऋतु में हवाएँ स्थल भागों से लौटकर बंगाल की खाड़ी की ओर बहती हैं।
शरद ऋतु में तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश में वर्षा होती है।
शरद ऋतु में किसान खरीफ फसलों की कटाई करते हैं।
लगभग 30 से 35 वर्षों तक मौसम की औसत दशा को जलवायु कहते हैं।
मौसम और जलवायु के मूल तत्व समान होते हैं।
जलवायु अनेक वर्षों में मापी गई मौसम की औसत दशा है।
मानसून शब्द अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है — मौसम।
किसी स्थान की जलवायु उसकी भौगोलिक स्थिति, समुद्र तल से ऊँचाई तथा समुद्र से दूरी पर निर्भर करती है।
भारत की भौगोलिक विविधता के कारण यहाँ की जलवायु में क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।
जैसलमेर और बीकानेर राजस्थान के अत्यधिक गर्म मरुस्थलीय क्षेत्र हैं।
द्रास और कारगिल में अत्यधिक ठण्ड पड़ती है तथा बर्फबारी होती है।
मुम्बई और कोलकाता जैसे तटीय क्षेत्रों की जलवायु सामान्य एवं आर्द्र होती है।
भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है।
भारत की जलवायु मानसूनी हवाओं से अत्यधिक प्रभावित होती है।
भारत की कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है।
अच्छे मानसून का अर्थ है — पर्याप्त वर्षा और अधिक फसल उत्पादन।
कर्क रेखा भारत को लगभग दो बराबर भागों में विभाजित करती है।
कर्क रेखा के दक्षिण का भाग उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र कहलाता है।
कर्क रेखा के उत्तर का भाग उपोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र कहलाता है।
ग्रीष्म ऋतु में स्थल भागों का तापमान समुद्र की अपेक्षा अधिक हो जाता है।
ग्रीष्म ऋतु में नमी युक्त हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं।
ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से आने वाली हवाएँ अधिक वर्षा कराती हैं।
शीत ऋतु में हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।
शीत ऋतु की हवाएँ अपेक्षाकृत शुष्क होती हैं और कम वर्षा करती हैं।
ऋतुओं के अनुसार दिशा बदलने वाली हवाओं को मानसूनी हवाएँ कहते हैं।
समुद्र से स्थल की ओर चलने वाली हवाओं को दक्षिण-पश्चिमी मानसून या ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं।
स्थल से समुद्र की ओर चलने वाली हवाओं को उत्तर-पूर्वी मानसून या शीतकालीन मानसून कहते हैं।
भारत में वर्षा का वितरण असमान है।
दक्षिण भारत में तटीय भागों से आन्तरिक क्षेत्रों की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।
उत्तरी भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है।
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठने वाले बादल तटीय क्षेत्रों में अधिक वर्षा करते हैं।
भारत के आन्तरिक भागों में पहुँचते-पहुँचते बादलों में जलवाष्प की मात्रा कम हो जाती है।
राजस्थान तक पहुँचते-पहुँचते बादल लगभग शुष्क हो जाते हैं, इसलिए वहाँ कम वर्षा होती है।
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य तीन ओर से पहाड़ों से घिरे होने के कारण अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं।
वर्षामापी यंत्र का उपयोग वर्षा की मात्रा मापने के लिए किया जाता है।
वर्षामापी यंत्र का उपयोग वर्षा की मात्रा मापने के लिए किया जाता है।
वर्षामापी यंत्र को बोतल, कीप, रबड़ बैंड, स्केल और साइकिल की तीली की सहायता से बनाया जा सकता है।
वर्षा मापने के लिए वर्षामापी यंत्र को खुले स्थान या छत पर रखा जाता है।
वर्षा की माप सामान्यतः सेन्टीमीटर या इंच में की जाती है।
भारत में अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी राज्य प्रमुख हैं।
विश्व में सबसे अधिक वर्षा मेघालय राज्य के मॉसिनराम नामक स्थान पर होती है।
वायु में ऊष्मा या ठण्डक की मात्रा को तापमान कहते हैं।
तापमापी (Thermometer) से तापमान मापा जाता है।
तापमान मापन की इकाई डिग्री सेल्सियस है।
उत्तर भारत में सामान्यतः शीत ऋतु नवम्बर माह के मध्य से आरम्भ होती है।
उत्तर India में जनवरी और फरवरी सबसे अधिक ठण्ड वाले महीने होते हैं।
शीत ऋतु में उत्तर भारत का औसत दिन का तापमान 21°C से कम रहता है।
उत्तर भारत में अधिक ठण्ड पड़ने का मुख्य कारण हिमालय पर्वत की निकटता और समुद्र से दूरी है।
प्रायद्वीपीय भारत में शीत ऋतु का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है।
प्रायद्वीपीय भारत में कम ठण्ड पड़ने का कारण भूमध्यरेखा और समुद्र की निकटता है।
गर्म और उमस भरे मौसम में जीवाणु एवं विषाणु तेजी से पनपते हैं।
गर्म और उमस भरे दिनों में विभिन्न बीमारियाँ फैलने की संभावना बढ़ जाती है।
उत्तर भारत में सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु मार्च माह के मध्य से आरम्भ होती है।
भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
पृथ्वी की ऊपरी सतह पर महीन कणों से बनी पतली परत को मृदा (मिट्टी) कहते हैं।
मृदा में रेत, बजरी, कंकड़, पत्थर तथा ह्यूमस पाए जाते हैं।
ह्यूमस पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के सड़े-गले अवशेषों से बनता है।
ह्यूमस मिट्टी को अधिक उपजाऊ बनाता है।
भारत में अनेक प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं।
जलोढ़ मृदा भारत की सबसे अधिक उपजाऊ मिट्टी मानी जाती है।
जलोढ़ मृदा नदियों द्वारा लाए गए महीन मलबे के जमाव से बनती है।
भारत का उत्तरी विशाल मैदान जलोढ़ मिट्टी से बना है।
गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए मलबे से उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ है।
महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में भी जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।
जलोढ़ मिट्टी में गेहूँ, चावल और गन्ने की खेती की जाती है।
काली मृदा को रेगर या कपासी मिट्टी भी कहा जाता है।
काली मिट्टी का निर्माण लावा चट्टानों के टूटने-फटने से हुआ है।
काली मिट्टी कपास की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त होती है।
काली मिट्टी मुख्यतः महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में पाई जाती है।
लाल-पीली मृदा का निर्माण पुरानी चट्टानों के टूटने से हुआ है।
लाल-पीली मिट्टी गर्म और शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।
लाल-पीली मिट्टी अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है।
उर्वरकों और सिंचाई की सहायता से लाल-पीली मिट्टी में अच्छी फसल उगाई जा सकती है।
लेटराइट मृदा गर्म और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
अधिक वर्षा के कारण लेटराइट मिट्टी के पोषक तत्व नीचे बह जाते हैं।
लेटराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है।
लेटराइट मिट्टी केरल, छोटा नागपुर पठार और उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाई जाती है।
लेटराइट मिट्टी में चाय, कॉफी और काजू की खेती की जाती है।
मरुस्थलीय मृदा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
भारत में मरुस्थलीय मिट्टी राजस्थान और गुजरात के कुछ भागों में मिलती है।
मरुस्थलीय मिट्टी रेतीली और नमकीन होती है।
मरुस्थलीय मिट्टी में नमी की मात्रा बहुत कम होती है।
इंदिरा गांधी नहर से सिंचाई कर पश्चिमी राजस्थान में गेहूँ की खेती की जा रही है।
पर्वतीय मृदा पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
पर्वतीय ढालों पर मिट्टी की परत पतली होती है, जबकि घाटियों में इसकी मोटाई अधिक होती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती की जाती है।
मृदा के कटाव और बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं।
मृदा अपरदन से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
मृदा अपरदन को रोकने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने की प्रक्रिया को मृदा संरक्षण कहते हैं।
पेड़-पौधों, झाड़ियों और घास आदि के समूह को वनस्पति कहते हैं।
जो वनस्पति मानव की सहायता के बिना उगती और बढ़ती है, उसे प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।
भारत में जलवायु, मिट्टी, तापमान और वर्षा की विविधता के कारण विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
प्राकृतिक वनस्पति की विविधता के लिए जलवायु, मृदा, तापमान और वर्षा मुख्य उत्तरदायी कारक हैं।
वनस्पति को प्रभावित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक वर्षा है।
भारत की वनस्पतियों को मुख्यतः पाँच भागों में विभाजित किया जाता है।
भारत में पाई जाने वाली प्रमुख वनस्पतियाँ हैं — उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन, पतझड़ वन, मरुस्थलीय झाड़ियाँ, पर्वतीय वन तथा ज्वारीय वन।
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन मुख्यतः पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी भारत में पाए जाते हैं।
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन इतने घने होते हैं कि सूर्य का प्रकाश जमीन तक नहीं पहुँच पाता।
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन हमेशा हरे-भरे रहते हैं, इसलिए इन्हें सदाबहार वन भी कहा जाता है।
महोगनी, एबोनी, रबड़ और रोजवुड सदाबहार वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
उष्ण कटिबन्धीय पतझड़ वन 100 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
पतझड़ वन हिमालय की शिवालिक श्रेणी से लेकर पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलानों तक फैले हैं।
पतझड़ वन वर्ष के एक निश्चित समय में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
पतझड़ वनों को मानसूनी वन भी कहा जाता है।
सागौन, साल, आबनूस, पीपल, नीम, चन्दन, शीशम और शहतूत पतझड़ वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
पतझड़ वन मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ भागों में पाए जाते हैं।
उष्ण कटिबन्धीय मरुस्थलीय झाड़ियाँ 80 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
मरुस्थलीय वनस्पति मुख्यतः शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है।
पर्वतीय वन पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
पर्वतीय वनों को पर्वतों की ऊँचाई प्रभावित करती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में उष्ण कटिबन्धीय पतझड़ वनों से लेकर उपोष्ण कटिबन्धीय सदाबहार शंकुधारी वन पाए जाते हैं।
समुद्र तल से 1500 से 2500 मीटर की ऊँचाई पर शंक्वाकार वृक्ष पाए जाते हैं।
शंक्वाकार वृक्षों को शंकुधारी वृक्ष कहा जाता है।
चीड़, पाइन, चेस्टनट, ओक, देवदार और मैग्नोलिया पर्वतीय वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
उष्ण कटिबन्धीय मरुस्थलीय वनस्पति गुजरात, हरियाणा, पंजाब और दक्षिणी पठार के शुष्क भागों में पाई जाती है।
मरुस्थलीय वनस्पतियों की पत्तियाँ पानी की कमी के कारण काँटेदार होती हैं।
मरुस्थलीय वनस्पतियों में झाड़ियों की प्रधानता होती है।
कीकर, खैर, बबूल, खजूर और कैक्टस मरुस्थलीय क्षेत्रों की प्रमुख वनस्पतियाँ हैं।
ज्वारीय या दलदली वन डेल्टा क्षेत्रों और समुद्र के ज्वार वाले भागों में पाए जाते हैं।
ज्वारीय वन खारे पानी में भी विकसित हो सकते हैं।
ज्वारीय वन मुख्यतः पश्चिम बंगाल तथा अण्डमान-निकोबार द्वीपसमूह में पाए जाते हैं।
गंगा नदी का डेल्टा ज्वारीय वनों का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
सुन्दरी वृक्षों की अधिकता के कारण गंगा डेल्टा क्षेत्र को सुन्दरवन कहा जाता है।
ज्वारीय वनों को मैंग्रोव वन भी कहा जाता है।
वन हमें ऑक्सीजन, फल, शहद, लकड़ी और दवाइयाँ प्रदान करते हैं।
वन अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं।
कागज, दियासलाई, साबुन और बूट पॉलिश उद्योग वनों पर आधारित हैं।
वन वायु को शीतल तथा मिट्टी को नम बनाए रखने में सहायता करते हैं।
वन वर्षा कराने में सहायक होते हैं।
पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर मृदा अपरदन को रोकती हैं।
वन बाढ़ रोकने में सहायक होते हैं।
मैंग्रोव वन समुद्र तटों की रक्षा करते हैं और उन्हें स्थिर बनाए रखते हैं।
वन वन्य जीवों का प्राकृतिक निवास स्थल हैं।
पृथ्वी को हरा-भरा रखने के लिए पेड़ों की कटाई रोकनी चाहिए और अधिक पेड़ लगाने चाहिए।
जंगलों में रहने वाले जीवों को वन्य जीव कहा जाता है।
पालतू जानवर मनुष्यों के साथ बस्तियों में रहते हैं, जबकि वन्य जीव वनों में रहते हैं।
वनों की लगातार कटाई से वन्य जीवों के जीवन पर खतरा उत्पन्न हो गया है।
वनों के कटने के कारण अनेक पशु-पक्षियों की संख्या लगातार कम हो रही है।
बाघ, सफेद हिरण, काला हिरण और शेर वन्य पशुओं के उदाहरण हैं।
गिद्ध, गौरैया, सारस और कौआ पक्षियों की घटती संख्या वाले प्रमुख पक्षी हैं।
गिद्ध मरे हुए पशुओं का मांस खाकर वातावरण को प्रदूषित होने से बचाते हैं।
वन्य जीव हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और पक्षी-विहार स्थापित किए गए हैं।
राष्ट्रीय उद्यान वह क्षेत्र है जहाँ शिकार और चराई पूर्णतः प्रतिबंधित होती है।
वन्य जीव अभयारण्य वह क्षेत्र है जहाँ नियंत्रित चराई की अनुमति होती है।
पक्षी-विहार वह स्थान है जहाँ पक्षी स्वतंत्र रूप से भोजन प्राप्त कर सकते हैं।
जंगलों में शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार के जीव पाए जाते हैं।
शाकाहारी जीव वनस्पतियों पर आधारित भोजन करते हैं।
गाय, भैंस, बकरी और घोड़ा शाकाहारी जीवों के उदाहरण हैं।
मांसाहारी जीव अन्य जानवरों का शिकार करके भोजन प्राप्त करते हैं।
शेर और भेड़िया मांसाहारी जीवों के उदाहरण हैं।
प्रत्येक वर्ष अक्टूबर माह का पहला सप्ताह वन्य जीव सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।
भारत को ‘मसालों का घर’ कहा जाता है।
विश्व के फलों के उत्पादन में भारत का लगभग दसवाँ हिस्सा है।
भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है।
एशियाई शेर केवल गुजरात के गिर जंगलों में पाए जाते हैं।
असम के जंगलों में हाथी और गैंडे पाए जाते हैं।
केरल और कर्नाटक में भी हाथी पाए जाते हैं।
प्रवासी पक्षी सर्दियों के मौसम में दूसरे देशों से भारत आते हैं।
पेलिकन, साइबेरियन सारस, स्टोर्क, फ्लेमिंगो और पिनटेल बतख प्रमुख प्रवासी पक्षी हैं।
साइबेरियन सारस साइबेरिया से दिसंबर माह में भारत आते हैं।
साइबेरियन सारस मार्च के आरम्भ तक भारत में रहते हैं।
उपोष्ण का अर्थ है — कम गर्म क्षेत्र।
उष्ण का अर्थ है — गर्म।
मानसूनी का अर्थ है — मौसमी।
मरुस्थल का अर्थ है — सूखा क्षेत्र।
शंक्वाकार का अर्थ है — शंकु के आकार का।
सदाबहार वन वे वन हैं जो हमेशा हरे-भरे रहते हैं।
भारत में कुल 28 राज्य और 8 केन्द्रशासित प्रदेश हैं।
उत्तर प्रदेश भारत के उत्तर-मध्य भाग में स्थित एक सीमावर्ती राज्य है।
उत्तर प्रदेश के उत्तर में नेपाल देश स्थित है।
उत्तर प्रदेश का विस्तार 23°52' उत्तरी अक्षांश से 30°24' उत्तरी अक्षांश तक है।
उत्तर प्रदेश का विस्तार 77°05' पूर्वी देशांतर से 84°38' पूर्वी देशांतर तक है।
उत्तर प्रदेश की पूर्व से पश्चिम लंबाई लगभग 650 किमी है।
उत्तर प्रदेश की उत्तर से दक्षिण चौड़ाई लगभग 240 किमी है।
उत्तर प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 2,40,928 वर्ग किमी है।
भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 7.33 प्रतिशत भाग उत्तर प्रदेश में है।
उत्तर प्रदेश के उत्तर में नेपाल और उत्तराखण्ड स्थित हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व में बिहार और झारखण्ड स्थित हैं।
उत्तर प्रदेश के दक्षिण में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ स्थित हैं।
उत्तर प्रदेश के पश्चिम में हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली स्थित हैं।
उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 75 जनपद हैं।
उत्तर प्रदेश के 75 जनपद 18 मण्डलों में विभाजित हैं।
मण्डल जनपद और प्रदेश के मध्य की प्रशासनिक इकाई है।
मण्डल का प्रमुख अधिकारी कमिश्नर (युक्त) कहलाता है।
लखनऊ मण्डल में लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई और लखीमपुर खीरी जनपद शामिल हैं।
कानपुर मण्डल में कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा, फर्रुखाबाद, कन्नौज और औरैया शामिल हैं।
मेरठ मण्डल में मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर, बागपत और हापुड़ शामिल हैं।
अयोध्या मण्डल में अयोध्या, बाराबंकी, अम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर और अमेठी शामिल हैं।
आगरा मण्डल में आगरा, मथुरा, मैनपुरी और फिरोजाबाद शामिल हैं।
वाराणसी मण्डल में वाराणसी, गाजीपुर, चंदौली और जौनपुर शामिल हैं।
गोरखपुर मण्डल में गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज शामिल हैं।
देवीपाटन मण्डल में गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और श्रावस्ती शामिल हैं।
बरेली मण्डल में बरेली, शाहजहाँपुर, पीलीभीत और बदायूँ शामिल हैं।
मुरादाबाद मण्डल में मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर, अमरोहा और संभल शामिल हैं।
प्रयागराज मण्डल में प्रयागराज, कौशाम्बी, फतेहपुर और प्रतापगढ़ शामिल हैं।
चित्रकूटधाम मण्डल में बांदा, चित्रकूट, महोबा और हमीरपुर शामिल हैं।
मिर्जापुर मण्डल में मिर्जापुर, भदोही और सोनभद्र शामिल हैं।
बस्ती मण्डल में बस्ती, संतकबीर नगर और सिद्धार्थ नगर शामिल हैं।
झांसी मण्डल में झांसी, ललितपुर और जालौन शामिल हैं।
आजमगढ़ मण्डल में आजमगढ़, बलिया और मऊ शामिल हैं।
सहारनपुर मण्डल में सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर शामिल हैं।
प्राकृतिक संरचना के आधार पर उत्तर प्रदेश को तीन भौतिक विभागों में बाँटा गया है।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख भौतिक विभाग हैं — भाबर एवं तराई क्षेत्र, मध्य का मैदानी क्षेत्र तथा दक्षिण के पहाड़ एवं पठार।
भाबर एवं तराई क्षेत्र सहारनपुर से लेकर कुशीनगर तक फैला हुआ है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र पश्चिम में लगभग 34 किमी चौड़ा है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में घने वन और जैव विविधता पाई जाती है।
भूमि सुधार कार्यों के कारण भाबर एवं तराई क्षेत्र के वनों का विस्तार कम हुआ है।
वनों को साफ करके भाबर एवं तराई क्षेत्र में उपजाऊ कृषि भूमि का विस्तार किया गया है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में धान और गन्ने की रिकॉर्ड पैदावार की जाती है।
गंगा-यमुना का मैदान उत्तर प्रदेश के मध्य मैदानी क्षेत्र का प्रमुख भाग है।
मध्य मैदानी क्षेत्र का निर्माण नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी से हुआ है।
मध्य मैदानी क्षेत्र का ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है।
हिमालय से आने वाली प्रमुख नदियाँ — गंगा, यमुना, रामगंगा, शारदा, गोमती, घाघरा और राप्ती हैं।
दक्षिण के पठारी भाग से आने वाली प्रमुख नदियाँ — चम्बल, केन, बेतवा, टोंस, रिहन्द और सोन हैं।
उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग पठारी क्षेत्र है।
उत्तर प्रदेश का पठारी भाग भारत के पठारी क्षेत्र का उत्तरी विस्तार है।
उत्तर प्रदेश का पठारी भाग यमुना और गंगा नदियों के दक्षिण में स्थित है।
उत्तर प्रदेश के पठारी भाग को बुन्देलखण्ड का पठार भी कहा जाता है।
झाँसी, जालौन, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट और सोनभद्र पठारी क्षेत्र के प्रमुख जनपद हैं।
उत्तर प्रदेश की जलवायु सामान्यतः मानसूनी है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यतः ग्रीष्म, वर्षा और शीत ऋतुएँ पाई जाती हैं।
मार्च से जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है।
ग्रीष्म ऋतु में पठारी भागों का तापमान 40° से 47° सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
ग्रीष्म ऋतु में चलने वाली गर्म धूल भरी हवाओं को लू कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक गर्मी आगरा और झाँसी में पड़ती है।
उत्तर प्रदेश में सबसे कम गर्मी बरेली में पड़ती है।
मध्य जून से मध्य सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है।
उत्तर प्रदेश में वर्षा बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाओं से होती है।
प्रदेश की लगभग 88 प्रतिशत वर्षा वर्षा ऋतु में होती है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक वर्षा होती है।
उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक वर्षा गोरखपुर जनपद में होती है।
उत्तर प्रदेश में सबसे कम वर्षा मथुरा जनपद में होती है।
नवम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है।
दक्षिण से उत्तर की ओर जाने पर उत्तर प्रदेश में ठंड बढ़ती जाती है।
हिमालय में हिमपात होने से उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों में शीत लहर चलती है।
शीत ऋतु में पश्चिमी हवाओं से होने वाली वर्षा रबी की फसलों के लिए लाभकारी होती है।
उत्तर प्रदेश की मृदा और वनस्पति का अध्ययन उसके प्राकृतिक विभाजन के आधार पर किया जाता है।
भाबर क्षेत्र की मृदा हिमालय से आने वाली नदियों के भारी निक्षेप से बनती है।
भाबर क्षेत्र की मिट्टी में कंकड़, पत्थर और मोटा बालू पाया जाता है।
भाबर क्षेत्र में जल प्रायः मृदा के नीचे बहता है।
भाबर क्षेत्र में कृषि कार्य करना कठिन होता है।
भाबर क्षेत्र में अधिकतर वन और झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
तराई क्षेत्र की मिट्टी समतल, दलदली और नम होती है।
तराई क्षेत्र की उपजाऊ मिट्टी में गन्ना और धान की अच्छी पैदावार होती है।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में उष्ण कटिबन्धीय नम पर्णपाती वन पाए जाते हैं।
इन वनों में साल, गूलर, बेर, पलाश, इमली, शीशम और महुआ के वृक्ष पाए जाते हैं।
भाबर एवं तराई क्षेत्र में बाँस के झुरमुट और झाड़ियाँ भी पाई जाती हैं।
तराई क्षेत्र में बड़े-बड़े फार्म बनाकर गन्ने और धान की खेती की जा रही है।
उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में उपजाऊ जलोढ़ मृदा पाई जाती है।
मैदानी क्षेत्र की मृदा कॉप मिट्टी, कीचड़ और बालू से निर्मित होती है।
जलोढ़ मृदा पोषक तत्वों से भरपूर एवं अत्यंत उपजाऊ होती है।
मैदानी क्षेत्र की मृदा को दो भागों में विभाजित किया जाता है।
नवीन जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है।
पुरानी जलोढ़ मृदा को बांगर कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में उष्ण कटिबन्धीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।
मैदानी क्षेत्र के प्रमुख वृक्ष साल, पलाश, नीम, आम, महुआ और शीशम हैं।
मैदानी क्षेत्र में वनों को साफ करके कृषि भूमि का विस्तार किया गया है।
उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में अब बहुत कम वन बचे हैं।
दक्षिणी पठारी भाग की मिट्टी को पठारी मृदा कहा जाता है।
पठारी भाग में मुख्य रूप से लाल मिट्टी पाई जाती है।
पठारी क्षेत्र में बलुई दोमट, परवा, राकर, भोर और मार मिट्टी भी मिलती है।
पठारी भाग में उष्ण कटिबन्धीय कंटीली झाड़ियों के वन पाए जाते हैं।
इस क्षेत्र में अकेसिया, कंचा, रुलई, थोर और नीम के वृक्ष पाए जाते हैं।
पठारी भाग में अनेक प्रकार की कंटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
सम्पूर्ण पठारी भाग में मुख्यतः शुष्क खेती की जाती है।
सिंचाई और उर्वरकों के प्रयोग से पठारी क्षेत्र में अच्छी उपज प्राप्त की जाती है।
पठारी भाग में सरसों, मटर, चना, अरहर और सोयाबीन की खेती की जाती है।
उत्तर प्रदेश में वनों के अनुसार विविध प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख वन्य जीवों में हाथी, ऊँट, बाघ, बारहसिंगा और भालू शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश में चीता, पांडा, अजगर, मगर, सांभर, लोमड़ी और सियार भी पाए जाते हैं।
कबूतर, मयूर, तोता, मैना, गौरैया और कौआ प्रमुख पक्षी हैं।
कोयल, कठफोड़वा, बगुला, बतख और जलमुर्गी भी उत्तर प्रदेश में पाई जाती हैं।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान लखीमपुर खीरी और पीलीभीत जिलों में स्थित है।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान लगभग 490 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है।
उत्तर प्रदेश में टाइगर रिजर्व, राज्य वन्यजीव विहार और पक्षी विहार संरक्षित किए गए हैं।
कछुआ, घड़ियाल, टाइगर, एलीफैंट और सारस पक्षी संरक्षण कार्यक्रमों के प्रमुख जीव हैं।