भूगोल भाग - 2 : SCERT

Most Important One liner Facts

हमारी पृथ्वी तीन परतों में विभाजित है।
पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत को भूपर्पटी कहते हैं।
सिलिका एवं एल्युमिनियम की अधिकता के कारण भूपर्पटी को सियाल (SiAl) कहा जाता है।
मैण्टल में चट्टानें अर्ध-द्रव अवस्था में पाई जाती हैं।
मैण्टल के ऊपरी भाग को दुर्बलता मण्डल कहा जाता है।
ज्वालामुखी विस्फोट के समय धरातल पर निकलने वाले लावा का स्रोत दुर्बलता मण्डल होता है।
सिलिका एवं मैग्नीशियम की अधिकता के कारण मैण्टल को सीमा (SiMa) भी कहते हैं।
पृथ्वी के सबसे भीतरी भाग को क्रोड कहा जाता है।
निकिल और लोहे से बने होने के कारण क्रोड को निफे (NiFe) भी कहते हैं।
उत्पत्ति के आधार पर शैल तीन प्रकार के होते हैं।
शैलों के प्रकार हैं – आग्नेय, अवसादी एवं रूपान्तरित
आग्नेय शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘इग्निस’ से बना है।
‘इग्निस’ शब्द का अर्थ अग्नि होता है।
ग्रेनाइट, बेसाल्ट, गैब्रो और डोलोराइट आग्नेय शैल हैं।
प्राथमिक शैलों को आग्नेय शैल कहा जाता है।
भूपर्पटी की सबसे अधिक मोटाई पर्वतों के नीचे पाई जाती है।
ज्वालामुखी विस्फोट से निकला लावा पृथ्वी की सतह पर एकत्रित होता है।
भारत का पहरेदार पर्वत हिमालय पर्वत कहलाता है।
हिमालय पर्वत में मुख्य रूप से अवसादी शैल पाए जाते हैं।
बलुआ पत्थर, स्लेट और चूना पत्थर अवसादी शैल हैं।
कोयला अवसादी शैल का उदाहरण है।
ग्रेनाइट के रूपान्तरण से नीस (Gneiss) का निर्माण होता है।
बलुआ पत्थर के रूपान्तरण से क्वार्टजाइट बनता है।
चूना पत्थर के रूपान्तरण से संगमरमर बनता है।
कोयले के रूपान्तरण से ग्रेफाइट और हीरा बनते हैं।
धरातल की ऊँचाई–निचाई से बनने वाले प्रतिरूप उच्चावच कहलाते हैं।
महाद्वीप एवं महासागर प्रथम श्रेणी के उच्चावच हैं।
पर्वत, पठार एवं मैदान द्वितीय श्रेणी के उच्चावच कहलाते हैं।
टीले, नदी घाटियाँ और डेल्टा तृतीय श्रेणी के उच्चावच हैं।
हिमालय, आल्प्स और एटलस वलित पर्वत हैं।
चट्टानों में आन्तरिक शक्तियों से मोड़ या वलन पड़ने पर वलित पर्वत बनते हैं।
चट्टानों के ऊपर उठने या नीचे धँसने से भ्रंश पर्वत बनते हैं।
भारत की नर्मदा नदी विंध्य और सतपुड़ा पर्वतों के बीच भ्रंश घाटी में बहती है।
वॉस्जेस (Vosges) पर्वत भ्रंश पर्वत का उदाहरण है।
ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत भी भ्रंश पर्वत है।
पश्चिमी घाट अवशिष्ट पर्वत हैं।
चिम्बोराजो एक ज्वालामुखी पर्वत है।
विसूवियस भी ज्वालामुखी पर्वत है।
भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप पर स्थित है, जो अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह में है।
अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश भाग पठार है।
जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं तो धरातल पर चौड़ी दरारें पड़ती हैं और भ्रंश पर्वत बनते हैं।
जब दो प्लेटें एक-दूसरे के निकट आती हैं तो वलित पर्वत बनते हैं।
भ्रंशन के करण कुछ भाग ऊपर उठ जाता है या नीचे धँस जाता है ऊपर उठा हुआ भाग ब्लॉक पर्वत कहलाता हैं।
भ्रंशन के करण कुछ भाग ऊपर उठ जाता है या नीचे धँस जाता है नीचे धँसा हुआ भाग भ्रंश घाटी (रिफ्ट वैली ) कहलाती है।
ज्वालामुखी और भूकम्प प्लेट विवर्तनिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते हैं।
ज्वालामुखी का अर्थ है— ऐसा पर्वत जिसके मुख से आग निकलती हो
ज्वालामुखी के मुख को विवर (क्रेटर) कहते हैं।
मैग्मा जब धरातल पर फैलता है तो उसे लावा कहते हैं।
एटना और स्ट्राम्बोली जैसे सक्रिय ज्वालामुखी इटली में स्थित हैं।
विश्व का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी कोटोपैक्सी है।
कोटोपैक्सी ज्वालामुखी दक्षिणी अमेरिका में स्थित है।
फ्यूजीयामा एक सुप्त ज्वालामुखी है, जो जापान में स्थित है।
विसूवियस ज्वालामुखी एक सुप्त ज्वालामुखी है, जो इटली में स्थित है।
माउन्ट पोपा मध्य बर्मा में स्थित एक मृत ज्वालामुखी है।
भूकम्प की तीव्रता को रिक्टर पैमाने से मापा जाता है।
जब पृथ्वी की सतह पर अचानक कंपन होता है तो उसे भूकम्प कहते हैं।
पृथ्वी के अंदर जहाँ से भूकम्पीय कंपन उत्पन्न होता है, उसे भूकम्प उद्गम केन्द्र कहते हैं।
उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित बिन्दु को उपकेंद्र (Epicentre) कहते हैं।
विश्व के लगभग 80% भूकम्प प्रशान्त महासागर के चारों ओर आते हैं।
स्थलमण्डलीय प्लेटें दुर्बलतामण्डल पर तैरती हैं।
जो बल पृथ्वी के अंदर कार्य करता है, उसे आन्तरिक बल कहते हैं।
जो बल धरातल के ऊपरी भाग में कार्य करता है, उसे बाह्य बल कहते हैं।
पृथ्वी की बाह्य शक्तियों द्वारा टूटे हुए टुकड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर जमा करने की क्रिया अनाच्छादन कहलाती है।
चट्टानों का अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना अपक्षय कहलाता है।
टूटे हुए कणों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना अपरदन कहलाता है।
वर्षा ऋतु में लोहे पर जंग लगना रासायनिक अपक्षय का उदाहरण है।
मानव द्वारा खदान खोदना और सुरंग बनाना जैविक अपक्षय का उदाहरण है।
अपरदन के कारकों की गति कम होने पर अवसादों का एकत्र होना निक्षेपण कहलाता है।
नदी का अपरदन कार्य ढाल, जल की मात्रा और जल की गति पर निर्भर करता है।
V आकार की घाटी गहरी और संकरी होती है।
जब नदी का जल ऊँचाई से तीव्र ढाल पर गिरता है तो उसे जल-प्रपात कहते हैं।
विश्व के सबसे ऊँचे जलप्रपात का नाम एंजेल जलप्रपात है, जो वेनेजुएला (दक्षिण अमेरिका) में स्थित है।
मैदानों में ढाल कम होने के कारण नदियाँ सीधे मार्ग पर न बहकर टेढ़े-मेढ़े रास्तों में बहने लगती हैं, इन्हें विसर्प (Meanders) कहते हैं।
संसार का सबसे बड़ा डेल्टा गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा है।
चूना पत्थर वाली चट्टानों के क्षेत्रों में पाई जाने वाली स्थलाकृतियों को कार्स्ट स्थलाकृति कहते हैं।
ऊँचे पर्वतों पर जब कोई बड़ा हिमखंड ढाल पर खिसकता है तो उसे हिमानी (हिमनद) कहते हैं।
पहले से बनी V-आकार की घाटी को हिमानी U-आकार की घाटी में बदल देती है।
जब हिमानी चट्टानों को घिसकर उसका चूर्ण पर्वतों के निचले भागों में जमा कर देती है तो उसे हिमोढ़ (Moraines) कहते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली गहरी और सँकरी घाटी को गॉर्ज कहते हैं।
पवन द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृतियाँ बालुका स्तूप (Sand Dunes) एवं मशरूम शिला हैं।
भूमिगत जल द्वारा निर्मित प्रमुख आकृतियाँ स्टैलेक्टाइट और स्टैलैग्माइट हैं।
पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों से उत्पन्न होने वाली प्रमुख घटना भूकम्प है।
पृथ्वी के चारों ओर विभिन्न गैसों के मिश्रण का जो आवरण पाया जाता है, उसे वायुमण्डल कहते हैं।
वायुमण्डल में लगभग 78% नाइट्रोजन तथा 21% ऑक्सीजन गैस पाई जाती है।
वायुमण्डल को कुल पाँच परतों में विभाजित किया गया है — क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल और वाह्य मण्डल।
वायुमण्डल की सबसे निचली परत को क्षोभमण्डल कहा जाता है।
क्षोभमण्डल धरातल से औसतन लगभग 15 किमी ऊँचाई तक पाया जाता है; ध्रुवों पर इसकी ऊँचाई लगभग 8 किमी तथा विषुवत रेखा पर लगभग 18 किमी होती है।
क्षोभमण्डल में ऊँचाई बढ़ने पर प्रति 1 किमी पर तापमान लगभग 6.5°C की दर से घटता है, इसलिए इसे तापमान परिवर्तन मण्डल भी कहते हैं।
कोहरा, बादल, ओला, तुषार, आँधी-तूफान, बादलों की गर्जना और बिजली चमकना जैसी सभी मौसम सम्बन्धी घटनाएँ क्षोभमण्डल में ही घटित होती हैं।
क्षोभमण्डल (Troposphere) वायुमण्डल की सबसे निचली परत है, जहाँ वर्षा, आँधी और तूफान जैसी सभी मौसम सम्बन्धी घटनाएँ होती हैं। इसकी औसत ऊँचाई 8–18 किमी होती है तथा ऊँचाई के साथ तापमान घटता है। इसकी ऊपरी सीमा को क्षोभसीमा (Tropopause) कहते हैं।
समतापमण्डल (Stratosphere) क्षोभमण्डल के ऊपर स्थित परत है। इसी परत में ओजोन परत पाई जाती है और यहाँ ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता है। जेट विमान इसी परत में उड़ते हैं। इसकी ऊपरी सीमा को समतापसीमा (Stratopause) कहते हैं।
मध्य मण्डल (Mesosphere) समतापमण्डल के ऊपर स्थित परत है, जहाँ उल्काएँ जलकर नष्ट हो जाती हैं। इस परत में तापमान अत्यधिक कम हो जाता है। इसकी ऊपरी सीमा को मध्यसीमा (Mesopause) कहते हैं।
तापमण्डल (Thermosphere) अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित परत है, जहाँ तापमान बहुत अधिक होता है। इसी परत में आयनमण्डल शामिल होता है, जहाँ रेडियो तरंगों का परावर्तन होता है तथा ध्रुवीय प्रकाश (Aurora) दिखाई देता है।
बहिर्मण्डल (Exosphere) वायुमण्डल की सबसे बाहरी परत है, जहाँ गैसें अत्यन्त विरल होती हैं। कृत्रिम उपग्रह इसी परत में परिक्रमा करते हैं और यह परत धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है।