Cognitive Development Theory : Jean Piaget
जीन पियाजे (Jean Piaget)
प्रतिपादक: जीन पियाजे (स्विस)
जन्म-मृत्यु: 1896–1980
प्रमुख पुस्तकें:
1. The Psychology of Intelligence
2. The Origins of Intelligence in Children
3. The Language and Thought of the Child
4. Judgment and Reasoning in the Child
5. The Moral Judgement of the child
जीन प्याजे स्विस मनोवैज्ञानिक है। मूल रूप से पियाजे जीव वैज्ञानिक थे।.
संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त को भौतिक विकास का सिद्धान्त भी कहते है।.
मुख्य विचार: बालकों में वास्तविकता के स्वरूप के बारे में चितन करने तथा खोज करने की
शक्ति न तो सिर्फ बालकों के परिपक्वता स्तर पर न ही उसके अनुभव पर निर्भर करता है बल्कि इन दोनों की
अंतः क्रिया द्वारा निर्धारित होता है।
बच्चे सक्रिय रूप से ज्ञान का निर्माण करते हैं
(Constructivism)।
विकास
सार्वभौमिक (Universal), क्रमिक (Invariant Sequence) और चरणबद्ध (Stage-based) है।
पियाजे की संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएँ (Infographic)
शिक्षण प्रक्रिया को बच्चे की मानसिक परिपक्वता और विकासात्मक अवस्था के अनुसार आयोजित किया जाना चाहिए। इसे Readiness-based teaching कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि शिक्षक को यह समझना चाहिए कि बच्चा किस स्तर पर सीखने के लिए तैयार है और उसी के अनुसार शिक्षण गतिविधियाँ निर्धारित करनी चाहिए।
इस सिद्धांत के अनुसार बच्चों को केवल सुनने या रटने तक सीमित न रखकर उन्हें स्वयं खोज करने के अवसर दिए जाने चाहिए। इसे Discovery Learning कहा जाता है, जिसमें बच्चे प्रयोग करते हैं, वस्तुओं को छूते हैं, देखते हैं और अनुभव के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार का Hands-on learning बच्चों की समझ को अधिक स्थायी बनाता है।
भारतीय कक्षा-कक्षों में भी इस सिद्धांत का व्यावहारिक उपयोग किया जा सकता है। प्री-ऑपरेशनल अवस्था में बच्चों को खेल-आधारित शिक्षण (Play-way method) द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए, जबकि कंक्रीट ऑपरेशनल अवस्था में गणित और विज्ञान जैसे विषयों को समझाने के लिए मैनिपुलेटिव्स जैसे ब्लॉक्स, चार्ट और मॉडल का प्रयोग किया जाना चाहिए।
आधुनिक शैक्षिक परिवेश में यह देखा गया है कि बच्चे पहले की तुलना में अधिक जल्दी अमूर्त सोच (Abstract Thinking) विकसित कर रहे हैं। उदाहरण के रूप में, ओलंपियाड परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी कम आयु में ही जटिल अवधारणाओं को समझने लगते हैं। इसलिए आज के शिक्षण तरीकों में नवाचार और लचीलापन आवश्यक हो गया है।