कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन स्तरों में विभाजित किया, प्रत्येक स्तर में दो अवस्थाएँ हैं। स्तर आत्म (Self) तथा प्रत्याशाओं (Expectations) के संबंध को दर्शाते हैं।
1. प्राक्-रूढ़िगत स्तर / पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-Conventional Level)
नियम बाहरी होते हैं, पुरस्कार-दंड पर आधारित। सही-गलत का कोई आंतरिक विचार नहीं।
- दंड एवं आज्ञाकारिता उन्मुखता (Punishment and Obedience Orientation): दंड से बचने के लिए नियमों का पालन। बड़े लोगों की आज्ञा मानना।
उदाहरण: बच्चा चोरी नहीं करता क्योंकि पकड़े जाने पर मार पड़ेगी।
- साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता (Instrumental Relativist Orientation): पुरस्कार पाने या विनिमय के लिए व्यवहार। "तू मेरी मदद कर, मैं तेरी"।
उदाहरण: बच्चा मदद करता है ताकि बदले में कुछ मिले।
2. परंपरागत स्तर / रूढ़िगत स्तर (Conventional Level)
नियम आंतरिकीकृत होते हैं। समाज की अपेक्षाओं और कानून पर जोर।
- परस्पर एकरूप अभिमुखता / अच्छा लड़का-अच्छी लड़की उन्मुखता (Good Boy-Good Girl Orientation): समाज से अनुमोदन पाने के लिए अच्छा व्यवहार। अच्छा दिखना।
उदाहरण: बच्चा झूठ नहीं बोलता क्योंकि "अच्छे बच्चे झूठ नहीं बोलते"।
- अधिकार संरक्षण अभिमुखता / कानून एवं व्यवस्था उन्मुखता (Law and Order Orientation): सामाजिक एवं कानूनी नियमों का पालन। समाज की व्यवस्था बनाए रखना।
उदाहरण: "कानून तोड़ना गलत है, चाहे कोई देखे या न देखे"।
3. उत्तर-रूढ़िगत स्तर / उत्तर-परंपरागत स्तर (Post-Conventional Level)
नैतिकता स्वतंत्र, सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित। उच्चतम स्तर।
- सामाजिक अनुबंध उन्मुखता (Social Contract Orientation): नियम लोकतांत्रिक समझौते से, बहुसंख्यक कल्याण पर जोर।
उदाहरण: कानून बदल सकते हैं यदि वे न्यायपूर्ण न हों।
- सार्वभौमिक नीतिपरक उन्मुखता (Universal Ethical Principle Orientation): सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (जैसे न्याय, मानवाधिकार)। स्वयं की अंतरात्मा।
उदाहरण: गाँधी या मार्टिन लूथर किंग जैसे लोग - सिद्धांतों के लिए कानून तोड़ना।