सामाजिक अधिगम सिद्धांत

Albert Bandura

अल्बर्ट बान्डुरा

अल्बर्ट बान्डुरा (Albert Bandura)

प्रतिपादक एवं विवरण

प्रतिपादक: अल्बर्ट बान्डुरा (Albert Bandura)

निवासी: कनाडा

सन्: 1977

प्रयोग: बोबो डॉल (Bobo Doll) और जीवित जोकर पर (फिल्म के माध्यम से)

बान्डुरा का प्रयोग (बोबो डॉल प्रयोग)

अल्बर्ट बान्डुरा ने बच्चों पर बोबो डॉल (एक inflatable गुड़िया) प्रयोग किया।

प्रक्रिया:

बच्चों को तीन प्रकार की फिल्में दिखाई गईं:

  1. पहली फिल्म: सामाजिक मूल्यों पर आधारित, जिसमें बोबो डॉल के साथ सामाजिक और सकारात्मक व्यवहार दिखाया गया।
    परिणाम: बच्चा बोबो डॉल के साथ सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करता है।
  2. दूसरी फिल्म: प्रेम और स्नेह पर आधारित।
    परिणाम: बच्चा बोबो डॉल के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार करता है।
  3. तीसरी फिल्म: हिंसात्मक दृश्यों युक्त, जिसमें बोबो डॉल के साथ हिंसक व्यवहार दिखाया गया।
    परिणाम: बच्चा बोबो डॉल की गर्दन तोड़ने जैसे हिंसक व्यवहार करता है।
प्रयोग डायग्राम

बोबो डॉल प्रयोग का चित्रण

निष्कर्ष

बान्डुरा ने निष्कर्ष निकाला कि छोटे बच्चे यह नहीं जानते कि उन्हें क्या सीखना चाहिए और क्या नहीं।

बच्चों के सामने हमेशा आदर्श व्यवहार और सकारात्मक प्रतिमान (Role Models) प्रस्तुत करने चाहिए।

अधिगम अनुकरण (Imitation) और अवलोकन (Observation) के माध्यम से होता है।

शैक्षिक महत्व

व्यक्तित्व विकास: सामाजिक अधिगम सिद्धांत बच्चों के व्यक्तित्व विकास में सबसे महत्वपूर्ण है।

आदर्श मॉडल: बच्चों के सामने सकारात्मक और आदर्श मॉडल प्रस्तुत करने चाहिए।

सकारात्मक गुणों का विकास: यदि नेतृत्व और अच्छे गुणों वाले व्यवहार प्रदर्शित किए जाएँ, तो बच्चों में सकारात्मक गुण विकसित किए जा सकते हैं।

अनुकरण का आधार: सामाजिक अधिगम का आधार अनुकरण है, जो बच्चों को व्यवहार सीखने में मदद करता है।

सामाजिक अधिगम के चार उपाय (प्रक्रियाएँ)

  1. ध्यान या अवधान (Attention):
    अधिगम के लिए विषयवस्तु को आकर्षक और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करना।
    यदि विषयवस्तु ध्यान आकर्षित नहीं करती, तो अधिगम प्रभावी नहीं होगा।
  2. अवधारणा या धारण (Retention):
    प्रस्तुत विषयवस्तु को कितना और कैसे स्मृति में रखा गया, यह धारण कहलाता है।
    यह अधिगम की स्थायित्व के लिए महत्वपूर्ण है।
  3. पुनः प्रस्तुतीकरण (Reproduction):
    यदि अधिगम कम प्रभावशाली हो, तो विषयवस्तु को पुनः प्रस्तुत करना चाहिए।
    यह व्यवहार को दोहराने और सुदृढ़ करने में मदद करता है।
  4. पुनर्बलन (Reinforcement):
    विषयवस्तु के पुनः प्रस्तुतीकरण के बाद, यदि बालक सही प्रतिक्रिया देता है, तो उसे प्रतिपुष्टि (Feedback) दी जाती है, जो पुनर्बलन कहलाती है।
    यह अधिगम को प्रोत्साहित और स्थायी बनाता है।

सामाजिक अधिगम के कारक

  • अभिप्रेरणा (Motivation): अधिगम के लिए आंतरिक और बाह्य प्रेरणा।
  • स्वनियंत्रण (Self-Regulation): व्यवहार को नियंत्रित करने की क्षमता।
  • स्वविवेक (Self-Efficacy): स्वयं की क्षमता में विश्वास।
  • स्व निर्णय (Self-Determination): स्वयं निर्णय लेने की क्षमता।
  • स्व-उद्घाटन (Self-Initiation): स्वयं पहल करने की प्रवृत्ति।

टिप्पणी

सामाजिक अधिगम का महत्व: यह सिद्धांत व्यवहारवादी और संज्ञानात्मक दृष्टिकोण को जोड़ता है, जिसमें अवलोकन, अनुकरण, और प्रेरणा महत्वपूर्ण हैं।

अन्य सिद्धांतों से तुलना:

यह सिद्धांत पावलोव और स्किनर के सिद्धांतों से भिन्न है, क्योंकि यह अनुकरण और सामाजिक संदर्भ पर जोर देता है।

गेस्टाल्ट और टॉलमैन के सिद्धांतों की तरह, यह संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को भी महत्व देता है।

नोट: सामाजिक अधिगम सिद्धांत को व्यवहारवाद और संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धांतों के बीच की योजक कड़ी कहा जाता है, क्योंकि यह ध्यान (Attention), स्मृति (Retention), और प्रेरणा (Motivation) को संयोजित करता है।

अल्बर्ट बान्डुरा: उन्हें प्रथम संज्ञानात्मक व्यवहारवादी (First Cognitive Behaviorist) कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने व्यवहारवादी और संज्ञानात्मक दृष्टिकोण को एकीकृत किया।