सीखने की प्रक्रिया में पठार एक प्रमुख विशेषता है, जो उस अवधि को व्यक्त करता है, जब सीखने की क्रिया में कोई उन्नति नहीं होती।
सीखने के पठार तब आते हैं, जब व्यक्ति सीखने की एक अवस्था पर रुक जाता है और दूसरी अवस्था में प्रवेश नहीं कर पाता।
सीखने की अवधि में पठार साधारणतया कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों या कुछ महीनों तक रहते हैं।
यदि किसी जटिल कार्य के केवल एक पक्ष पर ध्यान दिया जाता है और दूसरे पक्षों की उपेक्षा की जाती है, तो पठार बन जाता है।
प्रत्येक कार्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति में अधिकतम कुशलता होती है, जिससे आगे वह नहीं बढ़ सकता। इसे शारीरिक सीमा कहते हैं। जब व्यक्ति इस सीमा पर पहुँच जाता है, तब उसके सीखने में पठार बन जाता है।
शायद ऐसी कोई विधि नहीं है, जिससे पठारों को बिल्कुल समाप्त किया जा सके, पर उनकी संख्या और अवधि को कम किया जा सकता है।